Homeप्रमुख खबरें7 मई- 1931 में आज ही अमर हुए थे भगत सिंह के...

7 मई- 1931 में आज ही अमर हुए थे भगत सिंह के साथी जगदीश, ठीक चन्द्रशेखर आज़ाद की तरह लड़ कर

क्या हम जानते हैं किसी जगदीश नाम के क्रन्तिकारी को .. क्या किसी ने कभी उनकी कोई तस्वीर देखी है ? शायद नहीं .. क्योकि एक सोची समझी साजिश के चलते इन महावीरों का पूरा त्याग मिटाने के हर सम्भव उस हरे रंग की स्याही से किये गये जो केवल एक ही परिवार के गुण को गाती रही और आज़ादी के युद्ध में तीर , तलवार और बन्दूको के योगदान को एक सिरे से नकारती रही.. जनता को संदेश भी वही दिया उन्होंने जो वो चाहते थे .

सरदार भगत सिंह जब भी लाहौर कि यात्रा पर होते थे तो उनके साथ एक क्रांतिकारी हुआ करता था . उसका नाम था जगदीश . जगदीश नाम का ये क्रांतिवीर 3 मई को अपने एक साथी के साथ लाहौर के शालीमार बाग़ में एक बड़ी योजना को बनाने में व्यस्त था .. जगदीश पूरे नाम के रूप में जगदीश चन्द्र राय के रूप में जाने जाते थे जो डेरा इस्माइल खान क्षेत्र के निवासी थे . घर में कोई कमी नही थी और उनके पिता खुद ही अंग्रेजो के काल में एक बड़े पद के सरकारी कर्मचारी थे लेकिन उनके मन में भारत को उन गोरों से मुक्त करवाने की जिद थी जिसने उन्हें आज़ादी के परवाने भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद से मिलवाया .

बलिदान होने के समय इस महायोद्धा की उम्र अधिकतम २२ साल की थी . ये अपने मित्र के साथ लाहौर के शालीमार बाग़ में बैठे थे , एक बार फिर से अपनों ने ही की थी गद्दारी और किसी जयचंद ने सटीक सूचना अपने आकाओं को दे दी . अंग्रजो की इतनी सेना ने वो शालीमार बाग़ घेरा था जैसे वो कोई बहुत बड़ा युद्ध लड़ने आये हों . हर तरफ सिर्फ पुलिस के जवान .. इसमें खास कर वो थे जो भारतीय थे और मात्र वेतन और मेडल के लालच में खड़े हो कर अंग्रेजो की तरफ से भारत को मुक्त करवाने की ठान चुके क्रान्तिकारियो का खून बहा कर बहुत खुश हो रहे थे … ये दुर्भाग्य ही था भारत का .

सरकारी नौकरी मात्र २२ साल में पा कर उसको देश के लिए छोड़ देने वाले अमर बलिदानी जगीश को पहले अंग्रेजो ने ललकारा जिसके बाद जगदीश ने किसी भी हाल में सरेंडर करने से मना कर दिया था .. फिर अपनी पिस्तौल से अंग्रेजो का काल बन कर टूट पड़ा . इस फायर के बाद अंग्रेजी सैनिको ने अपने हथियारों के मुह खोल दिए और जगदीश ने सदा सदा के लिए अमरता प्राप्त कर ली .. २२ साल का वो महावीर भारत माता की गोद में सदा सदा के लिए सो गया .. आज उस महान पराक्रमी के बलिदान दिवस पर उन्हें बारम्बार नमन करते हुए आज़ादी के नकली ठेकेदारों और बिके कलमकारों से सवाल है कि ऐसे महायोद्धा का इतिहास के पन्नो में स्थान क्यों नहीं और स्थान तो दूर की बात है , इस वीर बलिदानी का राष्ट्र के पास एक धरोहर के रूप में एक भी फोटो क्यों नहीं ?

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments