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सनसनीखेज रहस्योद्घाटन : जिस कांग्रेस ने सब कुछ दिया उसी कांग्रेस को तोड़कर नया कम्युनिस्ट राजनीतिक दल बनाना चाहते थे नेहरू

क्या जिस नेहरू गांधी परिवार को कांग्रेस ने सब कुछ दिया उसी परिवार के सबसे प्रमुख सदस्य व देश के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उसी कांग्रेस को तोड़कर अपना नया कम्युनिस्ट विचारों वाला राजनीतिक दल बनाना चाहते थे ?   वरिष्ठ पत्रकार व प्रसिद्ध लेखक संदीप देव ने अपनी पुस्तक “कहानी कम्युनिस्टों की” में यह रहस्योद्घाटन किया है।  यह खुलासा उन्होंने यूं ही नहीं किया इसके लिए श्री देव ने  सी आई ए का वह दस्तावेज भी उजागर किया है जिसमें यह सनसनीखेज तथ्य परिभाषित होता है।

संदीप देव ने अपनी पुस्तक कहानी कम्युनिस्टों की के खंड “प्रधानमंत्री नेहरू की वामनीति और उनके सिपहसलार” के पृष्ठ क्रमांक 263 में लिखा हैं की प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने ही उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार पटेल को सांप्रदायिक मानते थे। कांग्रेस में सरदार पटेल की मजबूत पकड़ को देखते हुएऔर उनके कार्यों को करप्ट प्रेक्टिस मानते हुए कांग्रेस से अलग होकर नेहरू वामपंथी विचारधारा वाली अपनी नई पार्टी भी बनाना चाहते थे। सी. आई. ए का दस्तावेज यह दर्शाता है की प्रधानमंत्री पंडित नेहरू एक तो कांग्रेस संगठन पर सरदार पटेल की पकड़ से दुखी थे दूसरे वह सरदार पटेल की राजनीति को सांप्रदायिक व भृष्ट मानते थे और तीसरे वह कांग्रेस तोड़कर अपनी वामपंथी विचारधारा वाली अपनी नई पार्टी बनाना चाहते थे।
सी . आई. ए के 10 नवम्बर 1950 के इस गोपनीय दस्तावेज का शीर्षक है एस्टेब्लिशमेंट ऑफ ए डेमोक्रेटिक ग्रुप ऑफ इंडियन कांग्रेसमेन सिर्फ एक पन्ने के इस दस्तावेज के काफी बड़े हिस्से को सी आई ए ने डीलिट कर दिया है लेकिन जो भी हिस्सा जारी किया है वह प्रधानमंत्री नेहरू द्वारा कांग्रेस को तोड़कर वाम विचारधारा वाली अपनी नई पार्टी बनाने की योजना का खुलासा कर देता है।यह दस्तावेज 1950 में सरदार पटेल के उम्मीदवार पुरषोत्तमदास टंडन और जवाहरलाल नेहरू के उम्मीदवार आचार्य जे बी कृपलानी के बीच हुए अध्यक्ष पद के चुनाव के बाद का है। वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने अपनी पुस्तक ” शाश्वत विद्रोही राजनेता आचार्य जे बी कृपलानी’ में उस चुनाव का जिक्र किया है। रामबहादुर राय लिखते हैं – कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिये 1950 में जे बी कृपलानी उम्मीदवार थे। उनका समर्थन जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे मुकाबला सरदार बल्लभभाई पटेल के उम्मीदवार पुरुषोत्तमदास टंडन से था । कांग्रेस के लिए वह निर्णायक मोड़ था । पूर्वी पाकिस्तान ( आज का बांग्लादेश) में दंगे हो रहे थे। वहां से बड़ी संख्या में हिंदू वापस आ रहे थे। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष ता तब कसौटी पर थी। सरदार पटेल का कांग्रेस संगठन पर प्रभाव ज्यादा था। सन 1950 में पाकिस्तान से संबंध के सवाल पर दोनों के मतभेद बढ़ गए थे। कांग्रेस के नासिक अधिवेशन में सरदार पटेल ने पुरुषोतम दास टंडन का साथ दिया । टंडन की छवि हिंदी और हिन्दू संस्कृति के पोषक की थी चुनाव में पुरुषोतमदास टंडन को 1306 वोट मिले । कृपलानी को 1092 वोट प्राप्त हुए । कृपलानी की हार को पटेल की जीत और नेहरू की हार माना गया।
पुस्तक में स्पष्ट किया गया है की इस प्रसंग का ज़िक्र इसलिए किया गया क्योंकि इस आलोक में ही सी आई ए का वह दस्तावेज ठीक से समझ में आ सकता है। लेखक आगे लिखते हैं की पुरषोत्तमदास टंडन की जीत और कृपलानी की हार से पंडित नेहरु बेहद आहत थे। जिसकी वजह से उन्होंने पहले कांग्रेस के भीतर ही श्री पटेल के खिलाफ एक समूह का निर्माण कराया  इससे भी जब बात नहीं बनी तो पंडित नेहरु कांग्रेस तोड़कर बिल्कुल ही वामपंथी विचारधारा वाली अपनी पार्टी के निर्माण की सोचने लगे थे, जिसकी पुष्टि सी आई ए के दस्तावेज से होती है। सी आई ए की रिपोर्ट में लिखा है। कलकत्ता का एक चीनी व्यसायी जो दिल्ली के दौरे पर आया था उसने इसकी पुष्टि की कि नेहरू प्रगतिशील लोकतांत्रिक समाजवादी विचारधारा आधारित अपनी पार्टी का निर्माण करना चाहते थे । दिसंबर 1950 में सरदार पटेल की आकस्मिक मृत्यु के कारण शायद नेहरू के मार्ग का कांटा निकल गया। कांग्रेस पर अब उनकी पकड़ मजबूत थी संभवतः इसलिए उन्होंने कांग्रेस तोड़कर अपनी वामपंथी विचारधारा की पार्टी बनाने की योजना को। त्याग दिया।
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