Homeलेखजनता चाहती है साकार हो मोदी दादा का शोनार बांग्ला का स्वप्न

जनता चाहती है साकार हो मोदी दादा का शोनार बांग्ला का स्वप्न

 

 

कैलाश विजयवर्गीय

बंगाली कहावत है “सोरसे मोद्हे भूत , तहाले भूत केमोन भाग्बे”
यानि सरसों की जड़ में सरसों का भूत है, तो भूत भागेगा कैसे? यानि समस्या के मूल में अन्य समस्या है. इसे हम इस प्रकार भी कह सकतें हैं की पश्चिम बंगाल में वामपंथ की पुरानी समस्या के जड़ में ममता बनर्जी की तृण मूल नामक समस्या पहुँच गई है. गुंडागर्दी, रक्तरंजित राजनीति, अपहरण, लूटमार, दादागिरी, हफ्तावसूली, कटमनी आदि आदि सब इस तृणमूल वाली समस्या के ही भाग हैं. इस स्थिति में  किसी ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी जिसे लोकतंत्र में अगाध श्रद्धा हो, जिसमें जनता से प्रेम करने की क्षमता हो, जिसे लोगों की संवेदनाओं को जागृत करते आता हो, जो स्वयं कलाकार होकर बंगाल की कलाप्रेमी जनता के साथ तादात्म्य बैठा सके और साथ ही साथ जो वामपंथ प्रेरित और तृण मूल द्वारा अग्रेषित हिंसा का दमन करना भी जानता हो. ऐसे ही व्यक्ति के रूप में हमें श्रीमान नरेंद्र मोदी मिले हैं. हमारे प्रधानमंत्री जी यूं तो समूचे भारत के प्रति संवेदनशील व प्रेमभाव से ओत प्रोत हैं किंतु बंगाल के प्रति निश्चित ही उनमें कुछ अधिक श्रद्धा भाव है. बंगाल के प्रति मोदी जी का यह अतिरिक्त प्रेमभाव संभवतः स्वामी विवेकानंद जी के प्रति उनके आदर का प्रतीक है. बंगभूमि के प्रति प्रधानमंत्री जी का यह आदर भाव कविवर रविंद्रनाथ टैगोर की कविताओं के मर्म की समझ का प्रतीक भी है. राष्ट्रीय स्वयं संघ परिवार व भाजपा के पूर्ववर्ती संगठन भारतीय जनसंघ के शलाका पुरुष पंडित श्यामाप्रसाद मुखर्जी का बंगाल पुत्र होना भी मोदी जी के बंगाल प्रेम का प्रमुख कारण है और स्वर्गीय अटलबिहारी वाजपेयी जी की वह कविता भी उनके बंगाल प्रेम का कारण है जिसमें अटलजी ने बंगाल को भारत की भुजा की संज्ञा दी थी, इससे भी आगे बढ़कर बंगाल को भारत का सांस्कृतिक द्वार कहा था. कदाचित बंगाल की यही ध्वस्त हो गई छवि प्रधानमंत्री जी को व्यथित व भाव विव्हल करती होंगी. इन्ही ध्वस्त छवियों के पुनर्निर्माण व पुनर्स्थापना व बंगाल को भारत की सांस्कृतिक, साहित्यिक राजधानी बनाने हेतु मोदी जी कृतसंकल्पित हैं.
पिछले 50 वर्ष का शासन बंगाल के भद्रलोक के लिए एक बुरे स्वप्न की तरह रहा है. इस आधी सदी के पहले पांच वर्षों में देश में आपातकाल के सूत्रधार सिद्धार्थ शंकर रे का आततायी शासन. बाद के 35 वर्षों में वामपंथ का ऐसा शासन जिसे राष्ट्रप्रेम, धर्म, संस्कार, परंपराओं को ध्वस्त, नष्ट व कुचलने में बड़ा आनंद आता था और इसके बाद 10 वर्षों का ममता दीदी का शासन जो वामपंथियों के कुशासन से भी कहीं अधिक दमनकारी व राजनीति के अपराधीकरण की पराकाष्ठा वाला सिद्ध हुआ. दीदी की सत्ता ने बंगाल में न केवल सतत हिंदू विरोधी खेल खेले बल्कि बेशर्मी व अराजकता की हद तक खेले. मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के शीर्ष केंद्र के रूप में यदि किसी राज्य को देखा और गिना जाएगा तो उसमें बंगाल सर्वोच्च स्थान पर होगा. अपने नागरिकों और स्थानीय मूल निवासियों के मूंह का निवाला छीन कर पड़ोसी देशों से बंगाल में घुस आये अवैध घुसपैठियों को खिलाने का कोई अवसर ममता दीदी ने छोड़ा नहीं. बंगाल में मदरसे बढ़ रहे हैं, मौलवियों को वेतन और वेतनवृद्धि दी जा रही है, पुजारियों को हतोत्साहित व भयभीत किया जा रहा है, मूल बंगालियों के साथ हिंसा, मारकाट, दबाव, भयभीत करने, अपहरण, फिरौतियों की घटनाएं हो रही हैं. हिंदू त्यौहार, उत्सव, पर्व तो जैसे उपेक्षा व उपहास का केंद्रबिंदु बन गए. पिछले वर्षों में सैकड़ों निरपराधों की राजनैतिक हत्याएं देखी हैं बंगाल के भद्रलोक ने. पहले रक्त पिपासु  वामपंथ ने और बाद में अहंकारी और तुष्टिकरण की पुरोधा ममता बनर्जी ने बंगाल में राजनीति और हिंसा को एक दूसरे का  पर्याय बना दिया है. पिछले लगभग 50 वर्षों के इस क्रम से देश भर में बंगाल को अपराधियों के राज्य जैसी घृणित संज्ञा मिलने लगी है.
यद्दपि चुनाव आयोग के  व्यवस्थित चुनाव प्रबंधन के कारण   पिछले लोकसभा चुनाव की अपेक्षा  वर्तमान विधानसभा चुनाव के संपन्न हो चुके  छः चरणों में कम हिंसा देखने को मिली है; तथापि हिंसा करने के प्रयासों में तो तृणमूल ने तमाम प्रयास अवश्य किये हैं. यही कारण था की ममता दीदी बार बार चुनाव को आठ चरण में कराये जाने का सतत विरोध करती रही हैं. पिछले वर्षों में पश्चिम बंगाल की इस सांस्कृतिक भूमि को ममता दीदी के गुंडों ने संघ के स्वयंसेवकों, भाजपा के कार्यकर्ताओं व भोलीभाली निरीह जनता के रक्त से रक्तरंजित कर देने में कोई कसर नहीं छोड़ा है. देश विभाजन के समय मुस्लिम पक्ष द्वारा घोषित डायरेक्ट एक्शन डे जैसे वातावरण को छोड़ दें तो पश्चिम बंगाल मे आज जैसा जहरीला, मार काट वाला व तनिक सी भी वैचारिक या राजनैतिक असहमति पर हत्या कर दिये जाने वाला वातावरण इसके पूर्व कभी नहीं देखा गया. राजनैतिक मतभेद के कारण मासूम बच्चों, युवाओं, गर्भवती महिलाओं तक की हत्याओं के घटनाक्रम यहां हमने सतत देखे हैं.
अभी हाल ही में ममता सरकार के मंत्री बाबी हकीम ने भाजपा के कार्यकर्ताओं व केन्द्रीय सुरक्षा बल के लोगों को सूअर कहा है. क्या बंगाल का भद्रलोक इस प्रकार की रक्तरंजित राजनीति व शाब्दिक बदतमीजी को सहन कर सकता है? बाबी हकीम अपने मुस्लिम बहुल क्षेत्र की जनता से खुल्लमखुल्ला आव्हान करते हैं की भाजपा व crpf के लोग सूअर के बच्चें हैं, इन्हें मार डालो. पिछले ही वर्ष की बात है जब बाबी हकीम ने कोलकाता को मिनी पाकिस्तान कहा था. ऐसा उन्होंने पाकिस्तान के प्रमुख अखबार “द डान” को दिये हुये साक्षात्कार मे कहा था। द डान को हकीम ने यह भी कहा था कि मुस्लिम समाज के लिए पाकिस्तान से भी अधिक मुफीद और सुरक्षित स्थान कोलकाता का मिनी पाकिस्तान है। यद्दपि बाबी हकीम की इस बात से अंशतः असहमत हूं क्योंकि कोलकाता का यह क्षेत्र अकेला मिनी पाकिस्तान नहीं है, बंगाल की मुख्यमंत्री रहते हुए ममता दीदी ने पूरे बंगाल मे जगह जगह कई मिनी पाकिस्तान विकसित कर दिये हैं. केवल और केवल वोट बैंक की राजनीति करते हुये ममता बनर्जी ने पूरे बंगाल मे मुस्लिम तुष्टिकरण के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर डाले हैं.
कोलकाता के जिस क्षेत्र को ममता दीदी के खासमखास बाबी हकीम ने मिनी पाकिस्तान कहा था वहां के नगर निगम पार्षद रहमत अंसारी पर दो-तीन हत्याओं सहित बीसियों मुकदमे चल रहें हैं और वे हिंदू दमन के लिए बड़े कुख्यात रहें हैं. इस पूरे क्षेत्र के हिंदुओं को अत्याचार से, दमन से, डरा-धमकाकर, बहू बेटी की इज्जत पर हाथ डालकर भगा देने और इसे मिनी पाकिस्तान बना देने का श्रेय ममता बनर्जी की और से रहमत अंसारी को मिलने वाली शह व प्रश्रय को ही है. रहमत अंसारी और बाबी हकीम के मामलों को ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक स्वयं डायरेक्ट डील करते हैं व अंसारी की करतूतों के लिए उसके ट्रबल शूटर बने रहते हैं.
निश्चित ही बंगाल की जनता ने मोदी जी के इस शोनार बांग्ला के स्वप्न को बंगाल का भद्रलोक आशीर्वाद दे रहा है और आगे भी देगा.

लेखक भाजपा के वरिष्ठ नेता व राष्ट्रीय महासचिव तथा  प्रदेश प्रभारी पश्चिम बंगाल हैं

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments