टी.एन.मनीष
मैं भारत बोल रहा हूँ
ख़ामोश तूफ़ानों में
75 साल का अमृत
मौन हो घोल रहा हूँ !!!
(टी.एन.मनीष)
आज़ादी के अमृत महोत्सव के बीच दिल्ली से दो बड़ी घोषणाओं ने अपनी आमद दर्ज कराई हैं… पहली तो मोदी जी के मुखारविंद से आई..जिसमें हर साल चौदह अगस्त का दिन ” विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस ” के रूप में मनाए जाने की घोषणा शामिल हैं..जिससे विभाजन का दर्द झेल चुके भारतीयों को सम्मान के साथ याद किया जा सके। तो दूसरी दिल्ली सरकार की अद्भुत..अनूठी..असरकारक वो घोषणा हैं जिसके तहत दिल्ली के स्कूलों में देशभक्ति पाठ्यक्रम लागू हुआ है। अब ये दोनों ही सरकारें आज़ादी के 75 वें वर्ष को अमृतमयी बनाना चाहती है, खुद को सरोकार से जोड़े रखना चाहती हैं।
इस कवायद में आम आदमी की पैरोकार केजरीवाल सरकार ने स्कूलों में देशभक्ति का पाठ समय की मांग पर जोड़ा हैं.. लेकिन आप सरकार ये भूल रही हैं कि किसी भी भक्ति की पहली सीढ़ी चरित्र निर्माण है.. और देशभक्ति तो चरित्र की बुनियाद पर ही हिलोरें मारती हैं…सरफ़रोशी की तमन्ना वाले क्रांतिवीर रामप्रसाद बिस्मिल की कलम आज़ादी के तराने चरित्र की ठोस स्याही से ही उकेर पाई..ऐसे अनेक उदाहरण है कि हमारी आज़ादी इंक़लाब ज़िंदाबाद चरित्र के चलचित्र के बिना क्रांति दलों के दिलों पर बलिदान गाथा नहीं लिख पाती।
वतन के लिये हंसते हुए फांसी के फ़ंदों पर झूलने वाली पुण्यात्माएं आज के हालात पर उस वक्त सिसकती होगी.. जिस वक्त “लेके रहेंगे आज़ादी” के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में “भारत तेरे टुकड़े होंगे ” और ” अफ़ज़ल हम शर्मिंदा हैं ” जैसे बुलंद नारे हमारी संवैधानिक लचीलेपन का लाभ उठाकर सरेआम गूंजते हैं !!
हमारी मानसिक आज़ादी आज भी नैतिकता के पतन का शिकार है। हम व्यवहारिक तौर पर खुले आसमान के तले सांस ले रहे है.. हम जैसे चाहे वैसा जी रहे है.. हम गर्व से आज़ादी का हर वो मज़ा लूट रहे है, जिसमें नैतिकता को कोई स्थान नहीं देना चाहते.. हम अपने शब्दकोष से संस्कृति.. संस्कार.. समानता.. सामूहिकता.. सामाजिकता जैसे शब्दों को सियासी मानते हुए हटाते जा रहे हैं… हमनें वेद..पुराण.. ऋचाओं और तमाम वैदिक ग्रथों पर भी सियासत का तमगा लगा दिया हैं। हम उस सियासत के वाहक बनते जा रहे हैं जो हर स्तर पर पहले बांटती हैं.. फिर छांटती हैं.. उसके बाद झपटती हैं… और हम ठगे जाने के बाद उसे कोसते हुए मन मसोसकर खुद को जनार्दन मान इतराते है !!!!
अब केंद्र ने हमें दिवसों से भरे देश में एक और दिवस “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” मनाने का मौक़ा दिया है.. जिसमें प्रधानमंत्री जी हर साल 14 अगस्त को लोगों के त्याग और बलिदान को याद करना चाहते हैं। दावा हैं कि ये हमें भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना के जहर को खत्म करने की न केवल याद दिलाएगा, बल्कि इससे एकता, सामाजिक सद्भाव और मानव सशक्तिकरण की भावना भी और मज़बूत होगी” ।
ये पहल स्वागतयोग्य हैं…सराहनीय भी हैं… लेकिन कितना ही अच्छा होता कि हमारी सरकार को समाज में बिखरे पड़े ऐसे तमाम विभाजन दिखाई दे जाते.. जो जाति..धर्म.. संप्रदाय..पंथ..अगड़ा.. पिछड़ा..शोषित.. दमित.. अमीर .. ग़रीब..जैसे नामों के बीच संविधान की मूल भावनाएं कुचल अपनी प्रगति कर रहा हैं… क्योंकि ये सभी हमारी सियासत के पसंदीदा चारे में शुमार हैं !!!
हमारे लिये ये भी सोचनीय हैं कि देश को चलाने वाली दिल्ली में अति आधुनिकवाद ने बच्चों को देशभक्ति का सरकारी पाठ पढ़ाने पर दिल्ली सरकार को बाध्य कर दिया हैं… नैतिक पतन के बीच अब दिल्ली में नाबालिगों के द्वारा हत्या तक के अपराध हो रहे हैं..क्योंकि उन्हें नैतिक और अनैतिक का संस्कार न तो पैसे के पीछे भागते परिवार दे पा रहे हैं.. और न ही हाय..हैलो सुपर सेलो से घिरे अंग्रेज़ीदां शिक्षकों ने कभी इसकी ज़रूरत समझी !! दावा हैं कि स्कूलों में देशभक्ति की पढ़ाई बच्चों को अच्छा नागरिक बनने की शिक्षा देगी…पर चरित्र निर्माण के बिना ये संभव नहीं। जबकि कहा जाता हैं कि बच्चे कल के नागरिक हैं।
हमारी सरकार आज़ादी के पचहत्तर वर्षों को अमृत महोत्सव के रूप में जन भागीदारी के साथ मना रही हैं तो हमें उम्मीद हैं कि इन आयोजनों की माला में चरित्र निर्माण और नैतिक शिक्षा की लगातार सिमटती जा रही अलख भी शामिल की जाकर जगाई जाए…ताकि हम सभी कह सके मेरा भारत महान था..महान हैं.. चिरकाल तक महान ही रहेगा !! जय ग्वालिपा… जय ग्वालियर ।।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं सम्बंधित आलेख आपके वेब न्यूज़ पोर्टल जनसारथी से साभार
