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“सांची कहौं” – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार क्या केवल कुछ ख़ास लोगों को ही प्राप्त है ?

      राज चड्डा

                   

किसी भी व्यक्ति द्वारा अभद्र भाषा का प्रयोग कतई स्वीकार्य नहीं है!मैं सदैव उसका विरोध करता आया हूँ।किन्तु जिस देश में भगवान राम और कृष्ण आलोचना से नहीं बच पाए, वहां गांधी जी से असहमति अक्षम्य अपराध कैसे हो सकती है?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार क्या केवल भारतमाता को “डायन” या “भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह!” कहने वालों को ही प्राप्त है?
हमें यदि गांधी जी को महात्मा मानने का अधिकार है तो किसी को उन्हें महात्मा न मानने के अधिकार को तो गांधी जी भी स्वीकार करते।
आवश्यक नहीं कि गांधी जी की कुछ बातों से असहमति का अर्थ गोडसे को महात्मा मानना होता है।जो कि आजकल वामपंथियों द्वारा योजनापूर्वक कहा जाता है।
व्यक्तिगत रूप से मैं गांधी जी को स्वतंत्रता संग्राम का महान यौद्धा मानता हूं,पर इसका अर्थ क्रांतिकारियों के योगदान और बलिदान की उपेक्षा करना या कम करके आंकना भी नहीं है।मैं देश विभाजन को रोकने के लिए गांधी जी के प्रयासों को पर्याप्त नहीं मानता।सत्ता प्राप्ति की लालसा में कांग्रेस द्वारा जिन्ना के आगे घुटने टेकने को वे रोक नहीं सके।स्वतंत्रता प्राप्ति के श्रेय पर पूर्ण अधिकार मानने वाले विभाजन के पाप से इनकार कैसे कर सकते हैं।20 लाख हिंदुओं के संहार के बाद भी कहना कि आजादी बिना रक्तपात के मिली है, समझ से परे है।
इसी कालखंड में अंग्रेजों ने 54 से अधिक देशों से अपनी मजबूरी के चलते पलायन किया।इंग्लैंड की बिगड़ती आर्थिक स्थिति और द्वितीय विश्व युद्ध से हुई हानि इसका मुख्य कारण थी।भारत में तो सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था।इसे तो तत्कालीन ब्रटिश प्राइम मिनिस्टर चर्चिल ने अपनी संसद में भी स्वीकार किया था।
फिर भी मैं कथित संत कालीचरण द्वारा धर्म सम्मेलन में प्रकट विचारों और भाषा से अपनी पूर्णतः असहमति प्रकट करता हूँ और उसे घोर आपत्तिजनक मानता हूं।

लेखक वरिष्ठ समाजसेवी व व्यंग्यकार हैं

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