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शैवाल सत्यार्थी की साक्षात्कार कृति ” बातें मुलाकातें ” : साक्षात्कार नहीं, दर्शन हैं ये, साहित्य के शुद्ध वन्दन हैं ये

व्याप्ति उमड़ेकर

 

वरिष्ठ साहित्यकार  श्री शैवाल सत्यार्थी  की साक्षात्कार कृति ” बातें मुलाकातें ” पर  समीक्षात्मक आलेख,यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए संदर्भ ग्रन्थ है और साहित्यप्रेमियों के लिए एक श्रद्धा-पूर्ण यात्रा

 

 

साक्षात्कार नहीं, दर्शन है ये,
साहित्य के शुद्ध वन्दन है ये।
‘बातें’ जहाँ अंतर्मन बोल उठे,
‘मुलाक़ातें’ जहाँ जीवन खोल उठे।

धूसर कैनवास पर हिंदी साहित्याकाश के प्रमुख हस्ताक्षरों के प्रत्यभिज्ञा चिन्हों के मध्य महाकवि बच्चन के धर्मपुत्र एवं पुस्तक के लेखक श्री शैवाल सत्यार्थी जी के उभरते छायाचित्र के नीचे छायावाद के प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत द्वारा प्रदत्त शीर्षक “बातें मुलाकातें”…

यह “बातें मुलाकातें” आपकी मुलाकात कराती हैं राम की शक्ति पूजा के साधक महाप्राण निराला से, झूठा सच के यशपाल से, सुमित्रानंदन पंत, हरिवंश राय बच्चन,नीरज उपेंद्रनाथ अश्क, डॉ रामकुमार वर्मा सहित हिंदी साहित्य के 22 रत्नों से। यूं तो ये शैवाल जी की साक्षात्कार कृति है, जिसे लेखक ने अनुक्रमणिका में अंतर्व्यूह कहा और अंतर्व्यूह कितना सटीक शब्द है, ये भूमिका की इस पंक्ति को पढ़कर मैंने समझा– ” ‘अंतर्व्यूह’ भाव यह है कि इंटरव्यू के द्वारा हम सामने वाले के अंतर में,एक व्यूह रचना रचते हैं। मतलब यह कि दूसरा उसे न बचा सके, जो उससे हम पाना चाहते हैं। यह एक तरह का युद्ध है, और इंटरव्यू हमारी रणनीति स्ट्रेटजी, व्यूह रचना है।”

“बातें मुलाकातें” ऐसी ही व्यूह रचना का प्रतिफल है जहां सवाल– जवाब का दस्तावेज नहीं है। जहां एक ही बैठक में तय प्रश्नों को पूछ साक्षात्कार की औपचारिकता मात्र पूर्ण नहीं की गई है । सच तो यह है कि ये अंतर्व्यूह ही है, जिज्ञासा है, श्रद्धा है। जहां प्रश्न टकराते नहीं बल्कि धैर्य और संवेदना से फुसफुसाते हैं। ये बातें मुलाकातें किसी एक बंद कमरे में दो कुर्सियां डालकर नहीं हुई बल्कि ये हुई हैं कभी किसी बगीचे में फ़ूल को निहारते, खोए हुए लेखक से तो कभी क्षुधापूर्ति के पश्चात दालान में पड़े तख्त पर तो कभी झांसी के किले पर घूमते हुए। सब कुछ इतना सजीव है कि मानो एक पल ये साक्षात्कार प्रतीत होता है तो दूसरे ही पल कोई कहानी । भाषा ना तो कृत्रिम अलंकरणों से बोझिल है ना ही नीरस है। ये तो वह भाषा है जो हृदय तक जाती है, और वहाँ मौन की तरह टिक जाती है। इसके शब्द ही नहीं, परिवेश भी बोलता है, सब कुछ इतना सजीव है कि किताब पढ़ते हुए ये बातें किसी नदियां की धार सी कल –कल की ध्वनि गाती हुई बहती है किसी तीरे।

पुस्तक में महाप्राण निराला जी के साक्षात्कार को पढ़कर आप सिर्फ निराला जी के व्यक्तित्व से ही नहीं मिलते बल्कि मिलते हैं उनके साथ कई दफ़े कवि सम्मेलन में साथ चलने वाले इक्केवाले से, गलियों से लेकर घर की सीढ़ियों तक से। शैवाल जी का उनके धर्मपिता हरिवंशराय बच्चन जी से हुआ साक्षात्कार तो सीधा –सीधा पिता पुत्र के मध्य हुआ बेहद प्रिय संवाद है, जहां पिता अपने पुत्र से अतीत के उन पृष्ठों के विषय में भी चर्चा करते हैं जो संभवतः गुपित है और फिर भी पुत्र के अगर ऐसा होता तो कैसा होता??… जैसे प्रश्नों के जवाब भी देते हुए वे मिलते हैं।

मुझे सर्वाधिक यशपाल और बाबू वृंदावन लाल वर्मा का अंतर्व्यूह मोहक लगा । उपन्यासकार यशपाल के संग हुआ साक्षात्कार तो मानो यूं लगता है जैसे कोई चलचित्र चल रहा है, उनका बगीचा निश्चित ही बेहद खूबसूरत होगा, जहां पुष्प के सौंदर्य में कभी डूबे हुए यशपाल की तंद्रा भंग करते हुए शैवाल जी प्रश्न करते हैं तो कभी उन्हीं की पुस्तकों की अलमारी से झूठा सच उपन्यास उठाते हुए पूछ लेते हैं कि सबसे ज़्यादा संतोष क्या लिखकर हुआ ?? वहीं बाबू वृंदावन लाल वर्मा का साक्षात्कार भी बड़ा मोहक है। झांसी के किले पर पेड़ की छाया के नीचे बैठ चलता साक्षात्कार हो, या लेखन की शुरुआत के विषय में पूछने पर बाबू वृंदावन लाल का अपनी कविता “जाड़ा आया” की ऐसी प्रस्तुति देना हो कि घर के सारे बाल गोपाल नाचने लगे हों। सब कुछ ऐसा प्रतीत होता है कि कोई कहानी चल रही है, और सुन्दर दृश्य प्रकट हो रहे हैं। ये वाकई लेखक की लेखनी का ही कमाल है कि साक्षात्कार बोझिल नहीं लगते बल्कि पाठक को पुस्तक पूरा पढ़ने के लिए बाध्य करते हैं।

लेखक इतने सहज हैं कि औपचारिकता से कोसों दूर वे सामने वाले से एक ऐसा रिश्ता जोड़ लेते हैं जहां जवाब देने वाला शायद ये भूल ही जाता है कि वो कोई साक्षात्कार दे रहा है या अपना मन एक मित्र के समक्ष हल्का कर रहा है। इन तमाम साक्षात्कारों की सूची में लेखक अपने एक साक्षात्कार से संतुष्ट दिखाई नहीं देते किंतु पाठक वहां भी संतुष्ट होता है जब वो देखता है कि ये साक्षात्कार भले ही अपनी पूर्णता की और अग्रसर ना भी हुआ हो लेकिन परोक्ष रूप से लेखक का साक्षात्कार भी इसमें जोड़ देता है। वो साक्षात्कार यदि इस श्रृंखला में सम्मिलित न होता तो हम कृष्णस्वरूप जी से परिचित कैसे होते। अब कृष्णस्वरूप जी से परिचित होने के लिए तो आपको बातें मुलाकातें से मुलाकात करनी पड़ेगी।

पुस्तक में निहित कुल 22 साक्षात्कार केवल लेख नहीं अपितु आत्मीय संवाद हैं जो केवल प्रश्नों में उलझकर उत्तरों में नहीं सिमटते। यह उन मनीषी साहित्यकारों से संवाद है जिनका जीवन स्वयं में ग्रंथ है। शैवाल जी स्वयं प्रश्नकर्ता नहीं लगते अपितु एक साथी के समान प्रतीत होते हैं, उन्होंने कहीं भी अपनी विद्वता का प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि विनम्रता और जिज्ञासा से संवादों को जीवंत कर दिया। उनके यही अपनत्व से परिपूर्ण साक्षात्कार पुस्तक के शीर्षक “बातें मुलाकातें” को सार्थक करता है साथ ही उनका कृतित्व यह सिद्ध करता है कि साक्षात्कार लेना केवल कला नहीं, साधना है।

बातें मुलाकातें मात्र साहित्यिक साक्षात्कार नहीं है, यह साहित्य की एक दर्पण-दीर्घा है। जहाँ हम शब्दों को नहीं, विचारों को चलते हुए देखते हैं…यह संवादों की एक ऐसी वीणा है, जिसकी हर तार पर हिंदी साहित्य के युगपुरुषों का स्वर गुंजित होता है। ये वो कैनवास है जिस पर साहित्य के उत्तुंग शिखरों के चित्र चित्रित है। यह पुस्तक शोधार्थियों के लिए संदर्भ ग्रन्थ है और साहित्यप्रेमियों के लिए एक श्रद्धा-पूर्ण यात्रा।

 

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