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क्या भाजपा नेता व कार्यकर्ता कुछ सीख लेंगे अपने इस इतिहास से

प्रवीण दुबे
 भारत ही नहीं दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में अपना विजयी परचम लहराने वाली भारतीय जनता पार्टी आज अपना स्थापना दिवस मना रही है। इस राजनीतिक दल की आज तमाम प्रदेशों सहित देश में मजबूत सरकार है। इस दल का कार्यकर्ता होना अपने आप में गौरव की बात है। सत्ता हो या संगठन इस राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं का सदैव यह सपना रहता है कि उन्हें कोई बड़ा पद प्राप्त हो। इसके लिए तमाम नेताओं के बीच गलाकाट स्पर्धा भी देखने को निलती है। लेकिन स्थापना दिवस के अवसर पर जब इस पार्टी के इतिहास को खंगाला और उसमें गोते लगाने की कोशिश की तो कुछ प्रसंग ऐसे भी सामने आए जिन्हें पढ़कर मन आश्चर्य में डूब गया । ऐसा इसलिए कि जिस पार्टी में सत्ता और संगठन का पद प्राप्त करने आजकल उसके नेता व कार्यकर्ता कुछ भी करने तैयार  दिखाई देते हैं वहां एक ऐसा समय भी था जब पद नहीं कार्य के प्रति अत्यधिक समर्पण का भाव नजर आता था।  पार्टी  को अपनी मेहनत से खड़ा करने वाले एक दो नहीं बल्कि चार चार ऐसे नेता हुए जिन्होंने सत्ता और संगठन में मंत्री से लेकर अध्यक्ष तक का पद लेने से इंकार कर दिया था। यह नेता थे नाना जी देशमुख,अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवानी और राजमाता विजयाराजे सिंधिया। 
राजमाता ने जनसंघ की सदस्यता 1971 में ग्रहण की थी। 1972 में नए अध्यक्ष के लिए चर्चा शुरू हो गई। लाल कृष्ण आडवाणी की किताब माई कंट्री माई लाइफ में इस बात का जिक्र है कि उस समय अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि मैं चार साल अध्यक्ष रह चुका हूं, अब आगे नहीं रहना चाहता हूं। अटल जी ने लालकृष्ण आडवाणी से अध्यक्ष बनने के लिए कहा। इस पर लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि मैं सभाओं में अच्छे नहीं बोल पाता हूं, अध्यक्ष कैसे बन सकता हूं। अटल जी ने कई उदाहरण भी दिए, मगर लालकृष्ण आडवाणी ने अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया। इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी ने राजमाता का नाम सुझाया।
लालकृष्ण आडवाणी के सुझाए नाम पर अटल बिहारी वाजपेयी तैयार हो गए। इसके बाद दोनों इस प्रस्ताव को लेकर ग्वालियर पहुंचे। दोनों ने अपनी बात राजमाता विजया राजे सिंधिया के सामने रखी। वह भी शुरुआती दौर में तैयार नहीं हुईं, काफी समझाने के बाद शर्तों के साथ अध्यक्ष बनने के लिए तैयार हुईं। उनकी शर्त यह थी कि अगर मेरे गुरु इसके लिए हां कर देंगे तो ही पार्टी अध्यक्ष का पद स्वीकारूंगी।
राजमाता विजया राजे सिंधिया के आध्यात्मकि गुरु दतिया में पीतांबरा पीठ के स्वामी थे। अटल-आडवामी के प्रस्ताव पर उनके गुरु उन्हें अध्यक्ष पद नहीं स्वीकारने की सलाह दी। इसके बाद राजमाता विजयराजे सिंधिया कभी जनसंघ की अध्यक्ष नहीं बनीं। हमेशा वह उपाध्यक्ष ही बनीं रहीं। वह पार्टी की प्रमुख फाइनेंसर भी रहीं।
उधर भारतीय जनसंघ की स्थापना में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने नानाजी को संगठन विस्तार के लिए उत्तर प्रदेश भेजा गया. अपनी सांगठनिक क्षमता सिद्ध करते हुए नानाजी ने 1957 तक उत्तर प्रदेश के हर जिले में जनसंघ की इकाइयां स्थापित कर दीं. जनसंघ उत्तरप्रदेश की प्रमुख राजनीतिक शक्ति का केंद्रबिंदु बन गया. नानाजी राम मनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय की कुशल रणनीति से जनसंघ और समाजवादी विचारधारा ने कांग्रेस के लिए मुश्किल खड़ी कर दी. उत्तर प्रदेश की पहली गैर कॉंग्रेसी सरकार के गठन में विभिन्न राजनीतिक दलों को एकजुट करने में नानाजी का महत्वपूर्ण योगदान रहा.जेपी आंदोलन के समय जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण के ऊपर पुलिस का लाठीचार्ज हुआ तब नानाजी ने साहस का परिचय देते हुए जयप्रकाश नारायण(जेपी) को सुरक्षित बाहर निकाल लिया. जनता पार्टी के संस्थापकों में नानाजी प्रमुख थे. कांग्रेस को सत्ता से मुक्त कर अस्तित्व में आई जनता पार्टी . आपातकाल हटने के बाद जब चुनाव हुआ तो नानाजी देशमुख यूपी के बलरामपुर से लोकसभा सांसद चुने गए और उन्हें मोरारजी मन्त्रीमण्डल में शामिल होने का न्योता दिया गया लेकिन नानाजी देशमुख ने यह कहकर प्रस्ताव ठुकरा दिया कि 60 वर्ष की उम्र के बाद सांसद राजनीति से दूर रहकर सामाजिक  सांगठनिक कार्य करें,युवाओं को मौका दें। निःसंदेह आज के दिन यह प्रसंग बेहद प्रेरणादायक कहे जा सकते हैं।
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