प्रवीण दुबे
किसी भी लोकतांत्रिक देश में मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसी स्थिति में देश में घटित तमाम घटनाओं को लेकर मीडिया की जिम्मेदारी भी बहुत बढ़ जाती है। पिछले 48 घंटे की बात की जाए तो देश के तमाम बड़े इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा माफिया डॉन अतीक अहमद को गुजरात से उत्तर प्रदेश के प्रयागराज लाए जाने का लाइव मीडिया प्रसारण लगातार जारी है। सबसे बड़ा सवाल यह है की क्या मीडिया को किसी अंडरवर्ल्ड किसी माफिया डॉन से जुड़ी अति संवेदनशील खबर को लगातार लाइव प्रसारित करना जरूरी है ? क्या देश के तमाम जिम्मेदार मीडिया को इस तरह का लाइव प्रसारण करने से पहले अनेक बिंदुओं पर विचार नहीं किया जाना चाहिए ? सर्वविदित है की मुंबई हमले के दौरान मीडिया द्वारा लगातार दिखाई जा रही लाइव कवरेज के सहारे ही देश और देश के बाहर दुश्मन मुल्क मैं बैठे आतंकवादियों के आकाओं ने अपनी रणनीति को अंजाम दिया था जिसका खामियाजा देश को भुगतना पड़ा था। इतना ही नहीं देश की सुरक्षा विशेषकर सैन्य क्षेत्र से जुड़ी जानकारी मीडिया के माध्यम से लीक होने के बाद देश को समस्याओं का सामना करने की खबरें भी समय-समय पर आती रही हैं।
जहां तक माफिया डॉन अतीक अहमद के गुजरात से उत्तर प्रदेश लाए जाने की लाइव मीडिया प्रसारण की बात है यह कितना जरूरी है ? क्या संक्षिप्त जानकारी देकर लोगों तक यह खबर नहीं पहुंचाई जा सकती थी? क्या देश की बहुत सारी बड़ी खबरों की अनदेखी करके लगातार एक मुजरिम का सीधा प्रसारण दिखाना उचित है ? ऐसे ही कई सवाल हैं जिन पर आज देश के बड़े पत्रकारों और खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हाउस से जुड़े कर्ता धर्ताओं को सोचने मंथन करने की आवश्यकता है।
निसंदेह उत्तर प्रदेश का उमेश पाल हत्याकांड एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है और देश इसको लेकर चल रही कानूनी प्रक्रिया की जानकारी जानने का लगातार इच्छुक है ऐसी स्थिति में इससे जुड़ी खबरें मीडिया के लिए बेहद अहम भी कहीं जा सकती हैं लेकिन किसी भी हाई प्रोफाइल घटनाक्रम से जुड़ी खबरों को टीआरपी बढ़ाने के लिए सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत करना और इसके लिए होने वाले नुकसान तक को नजरअंदाज करना कहां तक सही कहा जा सकता है अतीक अहमद को न्यायालय के निर्देश पर प्रयागराज से लगभग 13 सौ किलोमीटर दूर साबरमती जेल से कड़ी सुरक्षा मैं लाए जाने की खबर का लगातार लाइव प्रसारण को देखकर बाहुबली और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त माफिया डॉन अतीक अहमद से जुड़े गुर्गे व अन्य सहयोगी सुरक्षा को चुनौती दे सकते हैं यह बात भी बेहद विचारणीय कही जा सकती है इसको नजरंदाज किया गया। इस लाइव प्रसारण के दौरान किसी माफिया डॉन से लगातार बात करने की कोशिश और उसके द्वारा दिए वक्तव्य को हाईलाइट करके प्रसारित करना भी किसी भी जिम्मेदार मीडिया के लिए ठीक नहीं कहा जा सकता इतना ही नहीं डॉन माफिया की बहन से बातचीत उसके अन्य शुभचिंतकों से बातचीत भी लगातार लाइव प्रसारण के द्वारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा दिखाया जाना भी बेहद अफसोस जनक बात कही जा सकती है चिंता की बात है मीडिया आखिर एक माफिया डॉन जिसे की कड़ी सुरक्षा में पुलिस ले जा रही है उसकी बात को देश के सामने प्रस्तुत करके आखिर क्या संदेश देना चाहता है? मीडिया द्वारा माफिया डॉन अतीक को यह कहते दिखाना कि मुझे किस बात का डर ,मेरी हत्या कराना चाहते हैं। उसकी बहन द्वारा अतीक को चार बार का विधायक और एक बार का सांसद बताते हुए निर्दोष निरूपित बताते हाईलाइट करना किसी भी दृष्टि से सही नहीं कहा जा सकता । इस बात का विचार करने की आवश्यकता है कि सुरक्षा काफिले के बीच घुसकर सम्पूर्ण घटनाक्रम को लेकर हो हल्ला मचाने से सुरक्षा में लगे कर्मियों की मानसिकता पर आखिर कितना विपरीत प्रभाव पड़ता है। उनका ध्यान भटकने के साथ मानसिक दबाव बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा
सकता अब समय आ गया है कि देश में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को रेगुलेट करने वाली एसोसिएशन आदि को यह विचार करने की आवश्यकता है की देश की सुरक्षा व अतीक अहमद जैसे माफिया डॉन से जुड़ी खबरों को लाइव प्रसारित करने से पहले यह तय किया जाए कि उन्हें कितना महत्व देना है इसके लिए नियमों का निर्धारण भी किया जाए।
टीआरपी की यह होड़ ही सभी समस्याओं की जड़ है। अब आवश्यकता है कि टीआरपी की इस अंधी दौड़ को छोड़कर न्यूज चैनलों का उद्देश्य दर्शकों तक जरूरी खबरें और सूचनाएं पहुंचाना होना चाहिए, न कि मनमर्जी की खबरें दिखाना और ये खबरें रिसर्च और ग्राउंड रिपोर्टिंग पर आधारित होनी चाहिए, यही वास्तविक पत्रकारिता का सच्चा धर्म और उद्देश्य है।