प्रवीण दुबे
अमित शाह के भोपाल दौरे के दौरान लिखी पटकथा के प्रारंभिक पेज का खुलासा हो गया है ,नरेंद्र तोमर को पार्टी आलाकमान ने मध्यप्रदेश चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक घोषित कर दिया है। इससे पूर्व पार्टी ने केंद्रीय मंत्री द्वय भूपेंद्र सिंह और अश्वनि वैष्णव को चुनाव प्रभारी घोषित किया था।
मध्यप्रदेश को लेकर अमित शाह की सक्रियता और तीन केंद्रीय मंत्रियों को चुनाव संबंधी बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने के बाद इतना तो स्पष्ट हो ही गया है कि मध्यप्रदेश में चुनावी निर्णय को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज की दखलंदाजी को केंद्र ने पूरी तरह से समाप्त कर दिया है।
इतना ही नहीं यह संदेश भी दे दिया गया है कि पर्दे के पीछे से पूरी की पूरी चुनावी बागडोर अमित शाह के हाथ रहेगी।
मतलब साफ है प्रधानमंत्री मोदी अपने खासमखास केंद्रीय मंत्रियों जिसमे नरेंद्र सिंह का नाम प्रमुख है के साथ अमित शाह के माध्यम से सारी चुनावी रणनीति पर पैनी नजर रखेंगे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि विधानसभा चुनाव में क्या मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का चेहरा केवल मुखौटा बनकर रह जाएगा ? क्या चुनाव प्रबंधन से लेकर जनता के बीच जाने की रणनीति में शिवराज की भूमिका गौण रहेगी ?
इन सवालों को लेकर प्रदेश के तमाम राजनीतिक विश्लेषकों की राय भिन्न भिन्न कही जा सकती है। अधिकांश लोगों का यह मानना है कि मध्यप्रदेश में भाजपा की अंदरूनी राजनीति और प्रदेश की जनता के चुनावी मूड को देखते हुए भाजपा आलाकमान ने जो निर्णय लिया है वो बहुत अच्छा कदम कहा जा सकता है।
ऐसा इसलिए क्यों की मध्यप्रदेश में भाजपा कई गुटों में बंटी नजर आ रही है। विशेषकर ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद पार्टी में उनके व्यक्तिनिष्ठ नेताओं की संख्या बढ़ गई है ।
इसके अतिरिक्त कई अन्य बड़े नेताओं की खेमेबंदी भी सर चढ़कर बोल रही है। इसने कार्यकर्ताओं और निष्पक्ष होकर पार्टी हित में काम करने वालों की मुसीबत तो बढ़ाई ही है साथ ही पार्टी आलाकमान के लिये भी निर्णय न लेने की समस्या पैदा हो गई है।
दूसरा बीस वषों से लगातार शिवराज के रूप में एक ही चेहरा और उस वजह से निर्मित एंटी इनकंबेंसी की स्थिति बेहद भयावह हो चली है। पार्टी के भीतर और जनता के बीच दोनों ही जगह से शिवराज की जगह नए चेहरे को लाने की बात सामने आई है। इसकी जानकारी शीर्ष नेतृत्व को लगातार मिलती रही है।
लेकिन इसके साथ ही आलाकमान के सामने यह संकट भी खड़ा है कि शिवराज की राजनीतिक चतुरता,प्रशासन में उनकी पकड़ और जनता के एक बड़े वर्ग खासकर ओबीसी वोटों पर उनकी पकड़ का आखिर विकल्प क्या है ?
मध्यप्रदेश में भले ही शिवराज को लेकर एंटी इनकंबेंसी सिर चढ़कर बोल रही है लेकिन क्या चुनाव से ठीक पहले उन्हें हटाना आत्मघाती निर्णय जैसा कदम नहीं होगा ।
यदि शिवराज नाराज होकर उदासीन होते हैं तो भाजपा के लिए परेशानी अवश्य बन सकते हैं। अतः एक तरफ कुआ और दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति है। साफ है शिवराज को हटाना संभव नहीं और चुनाव में सीधे उनके नेतृत्व मैं लड़ना या फिर सक्रिय भूमिका भी नुकसानदायक हो सकती है,उन्हे रखना भी जरूरी है और चुनाव में बड़ी भूमिका से विलग रखना भी पार्टी के लिए आवश्यक होगा।
यही वजह है कि मोदी ने अपने चाणक्य अमित शाह को मध्यप्रदेश की चुनावी कमान सौंप दी है और अभी चाणक्य के तरकश से चुनाव प्रभारी ,और चुनाव प्रबंधन संयोजक के रूप में दो तीर ही बाहर आए हैं “अभी आगे आगे देखिए होता है क्या” ?