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19 अक्टूबर मनुष्य गौरव दिवस विशेष पांडुरंग शास्त्री आठवले आत्मबोध से सामाजिक परिवर्तन की विरासत

 

अभिषेक पवन तिवारी

19 अक्टूबर को मनुष्य गौरव दिवस मनाया जाता है, उस महापुरुष की स्मृति में जिन्होंने करोड़ों लोगों को यह अनुभूति कराई कि मनुष्य मात्र शरीर नहीं, बल्कि ईश्वर का अंश है। स्वाध्याय आंदोलन के प्रणेता, आर्षदृष्टा और युगान्तकारी चिंतक पांडुरंग शास्त्री ‘दादा’ आठवले जी ने गीता, उपनिषद तथा भारतीय दर्शन को जीवन का व्यावहारिक मार्ग बनाकर समाज में एक शांत क्रांति आरंभ की।

1920 में मुंबई के पास जन्मे दादा ने वेद-शास्त्रों के गहन अध्ययन के बाद यह मार्ग चुना कि धर्म केवल मंदिरों और पुस्तकालयों में नहीं रहना चाहिए, बल्कि समाज के व्यवहार में उतरना चाहिए। स्वाध्याय आंदोलन की शुरुआत इसी समझ से हुई “ईश्वर मेरे भीतर है” इस अनुभूति को उन्होंने व्यक्ति के जीवन, परिवार, समाज और गाँवों की संस्कृति से जोड़ा। धर्म उनके लिए कर्म का पथ था, दान नहीं बल्कि आत्मबोध से उपजा कर्तव्य था।

पूरे देश मे विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से नगरों और गाँवों में स्वाध्याय ने जीवन बदल दिए। मछुआरे श्लोक गाते हुए समुद्र में उतरने लगे और अपनी मछलियों का एक अंश स्वेच्छा से गरीबों के लिए अलग रखने लगे। किसानों ने योगेश्वर कृषि, सामूहिक वृक्षारोपण और भक्ति से प्रेरित स्वावलंबी गाँवों की कल्पना साकार की। मंदिर केवल भवन नहीं रहे, नावें, खेत और वृक्ष तक ईश्वर के निवास बन गए। जाति-पात का भेद मिटने लगा, एक ही कुएँ, मंदिर और सामूहिक गीता-पाठ ने समाज को आत्मीयता के सूत्र में बाँधा।

मैं स्वयं इस आंदोलन का साक्षी हूँ। मेरी माताजी के माध्यम से हमारा परिवार भी स्वाध्याय से जुड़ा। मुझे कम उम्र में भाव-फेरी के माध्यम से गाँव-गाँव जाने का अवसर मिला। इन यात्राओं में मैंने देखा कि स्वाध्याय केवल उपदेश नहीं था, बल्कि जीवन की दिशा बदलने वाली चेतना थी। लोग नशा, जुआ छोड़ते गए, परिवारों में कलह शांत होने लगे और ईश्वर से जुड़कर एक-दूसरे से जुड़ने की संस्कृति पनपी।

दादा आठवले जी के 80वें जन्मदिन पर वर्ष 2000 में भरूच में आयोजित अशीति-वंदना में दस लाख से अधिक लोग केवल श्रद्धांजलि देने नहीं, बल्कि अपना जीवन बदलने वाले ‘दादा’ के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने आए। मेरे माता-पिता उस विराट दृश्य के साक्षी बने। दादा को बाद में पद्मविभूषण, मैग्सेसे और टेम्पलटन जैसे सम्मान मिले, किंतु उनका असली गौरव वह लाखों परिवर्तित जीवन थे।

25 अक्टूबर 2003 को यह दिव्य आत्मा अनंत में विलीन हुई, पर उनका संदेश आज भी उतना ही प्रकाशमान है, मनुष्य ईश्वर का प्रतिनिधि है, उसका गौरव उसके भीतर की भक्ति, आत्मबोध और समाज के प्रति उत्तरदायित्व में है। इसलिए मनुष्य गौरव दिवस केवल स्मरण नहीं, बल्कि संकल्प लेने का अवसर है कि हम भी स्वयं में ईश्वर को खोजें और अपने समाज को बेहतर बनाने में उसे प्रकट करें।

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