त्रिदेवों का स्वरूप और संतुलित जीवन का संदेश : प्रकृति और प्रत्येक प्राणी के स्वभाव से सीख लेने का अद्भुत संदेश
–रमेश शर्मा
भगवान दत्तात्रेय एक मात्र ऐसे अवतार हैं जिन्हें ब्रह्मा विष्णु और शिव की संयुक्त ऊर्जा का स्वरूप माना गया है। वे श्रीविद्या के अविष्कारक हैं। जीवन की शांत संतुलित शैली और प्रकृति के सभी स्वरूपों एवं जीवों से सीख लेने का संदेश उन्हीं ने दिया। चौबीस अवतारों में उनका क्रम छठवाँ और उनके चौबीस गुरु होने का वर्णन भी पुराणों में है।
भगवान दत्तात्रेयजी के संसार में अवतार लेने की तिथि मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा है जो इस वर्ष चार दिसंबर को पड़ रही है। अवतार परंपरा के दशावतार गणना में भगवान दत्तात्रेय का नाम नहीं है। लेकिन चौबीस अवतार क्रम में उनका अवतार छठवें क्रम पर माना जाता है।
भारतीय वाड्मय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ जीवन को आदर्श बनाने एवं प्रकृति से सीख समन्वय बनाने का संदेश दोनों प्रकार से है। ईश्वर ने स्वर से भी संदेश दिया और अवतार लेकर संसार के अन्य प्राणियों की भाँति जीवन जीकर भी समझाया। वेदों और गीता को अपौरुषेय माना गया है। उनके संदेश कालजयी हैं। तो पुराण कथाओं में ईश्वर के अवतार और उनके द्वारा सामान्य मनुष्य की भाँति जीवन जीकर आदर्श शैली का संदेश भी दिया है। पुराण कथाओं में वर्णित भगवान दत्तात्रेय का जीवनगाथा भी ऐसी ही है। मनुष्य जीवन की सार्थकता संतुलित और शांत जीवन में है। सीखने और समझने की कोई आयु नहीं होती। जीवन का प्रत्येक पल सिखाता है। प्रकृति एवं प्रकृति के सभी प्राणियों में कोई न कोई ऐसी विशेषता होती है जिसे समझकर मनुष्य अपना जीवन और उन्नत बना सकता है। यही संदेश भगवान दत्तात्रेय के अवतार का है। उनके तीन मुख हैं जिन्हें त्रिदेवों का प्रतीक माना गया है। एक मुख ब्रह्माजी का प्रतीक जो सृष्टि के निर्माणकर्ता हैं, दूसरा मुख भगवान विष्णु का प्रतीक जो सृष्टि के पालनहार हैं और तीसरा मुख भगवान शिव का प्रतीक जो जो सृष्टि के समापन के प्रतीक हैं। भगवान दत्तात्रेय जी को इन शक्तियों का ऊर्जा अंश माना गया है। उनके स्वरूप में तीन शिश के साथ छै हाथ भी हैं। इन हाथों में भी त्रिदेव के चिन्ह हैं। एक हाथ में माला, एक में कमंडल ब्रह्मा जी की प्रतीक, एक हाथों में शंख, एक हाथ में चक्र भगवान विष्णु के प्रतीक और एक हाथ में त्रिशूल भगवान शिव का प्रतीक है। इनके अतिरिक्त एक हाथ संसार को आशीर्वाद देते हुये है। इस अवतार में उनके पिता महर्षि अत्रि और माता अनुसूइया हैं। उनकी पत्नि का नाम देवी अनघा हैं। देवी अनघा भी त्रिदेवियों अर्थात लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की संयुक्त ऊर्जा स्वरूप मानी जाती हैं। भगवान दत्तात्रेय के शिष्यों में भगवान परशुराम, महा प्रतापी सहस्रार्जुन और भक्त प्रह्लाद भी हैं। भगवान दत्तात्रेय का प्रसंग लगभग सभी पुराणों में है। नारायण के लगभग सभी अवतारों द्वारा उनकी पूजन का भी वर्णन है। इनमें भगवान परशुराम जी, भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण जी भी है। ऋषि परंपरा में भी लगभग सभी ऋषियों द्वारा उनकी उपासना के मंत्र विभिन्न पुराणों में मिलते हैं। इसी क्रम में आदि शंकराचार्य जी द्वारा उनकी आराधना का मंत्र भी है। आधुनिक समाज जीवन में यही मंत्र प्रचलित है-
“आदौ ब्रह्मा मध्ये विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः
मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेयाय नमोस्तु ते।
ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले
प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेयाय नमोस्तु ते।।”
अर्थात “जो आदि में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा अन्त में सदाशिव है, उन भगवान दत्तात्रेय को बारम्बार नमस्कार है। ब्रह्मज्ञान जिनकी मुद्रा है, आकाश और भूतल जिनके वस्त्र है तथा जो साकार प्रज्ञानघन स्वरूप है, उन भगवान दत्तात्रेय को बारम्बार नमस्कार है।”
दत्तात्रेयजी की जन्मकथा में माता की सतीत्व शक्ति का संदेश
पुराणों में भगवान दत्तात्रेय के जन्म की कथा सामान्य नहीं है। इसमें माता के सतीत्व शक्ति का अद्भुत संदेश है। पुराण कथाओं के अनुसार नारद जी के कहने पर त्रिदेव देवी अनुसूइया की परीक्षा लेने पहुँचे। उन्होंने माता का संबोधन तो दिया लेकिन कहा हमें माता के दुग्ध अमृत का पान करना है। देवी ने पलभर विचार किया और अपनी सतीत्व शक्ति से तीनों को शिशु बना दिया और फिर दुग्ध पान कराया। वे तीनों शिशु आगे चलकर भगवान दत्तात्रेय, चन्द्रमा और महर्षि दुर्वासा बने। यह माता अनुसूइया द्वारा संस्कार और शिक्षा से इन तीनों शिशुओं का पालन है कि पुराण कथाओं में तीनों की अपनी अपनी गाथाएँ हैं। भगवान दत्तात्रेय की इस जन्म कथा में माता की आंतरिक ऊर्जा, सत्य के सामर्थ्य और मातृत्व की अनंत क्षमता का चित्रण है। माता के सत्य और लक्ष्य की एकाग्रता से ही संतान यशस्वी बनती है। माता के रूप में नारी की आंतरिक और अलौकिक सामर्थ्य की केवल यही एक कथा नहीं है। पुराण कथाओं में ऐसे अनेक प्रसंगों का तवर्णन है। इनमें वृदा द्वारा नारायण को पाषाण बनाने और सावित्री द्वारा मृत्यु के देवता यम को पराजित करने की कथाएँ भी हैं। यही संदेश देवी अनुसूइया और भगवान दत्तात्रेय की जन्म कथा में है। देवी अनुइया अध्ययन और ज्ञान में भी विलक्षण थीं। आगे चलकर रामजी के वनवास काल में उन्होंने ही एकाग्रता की यही सीख माता सीता को दी थी। इसका वर्णन बाल्मीकि रामायण में भी है और बाबा तुलसी के रामचरितमानस में भी है। इन तीनों बालकों को शिक्षा और संस्कार देने का कार्य देवी अनुसूइया ने ही किया। नारदजी के परामर्श से उन्होंने दत्तात्रेय जी को त्रिदेवों के प्रतीक त्रिगुणों अर्थात सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के समन्वय की सीखा दी। नारद जी सुझाव पर ही उनका नाम दत्तात्रेय रखा गया। इस नाम का भी अपना विशिष्ट अर्थ है। दत्त शब्द का अर्थ दान करना या प्रदान करना होता है। जब इसमें “आकार” के साथ त्रेय शब्द की संधि होती है तब शब्द “दत्तात्रेय” बनता है। तब इसका अर्थ हुआ “त्रितरंग दाता” ये तरंगे तीनों प्रकार के पुरुषार्थ की होती हैं।
शांत समन्वय जीवन और चौबीस गुरु होने का संदेश
भारतीय पुराणों वर्णित सभी अवतारों और विलक्षण विभूतियों में केवल भगवान दत्तात्रेय अवतार ऐसा है जिन्होंने कभी कोप या रोष की अभिव्यक्ति कभी नहीं की। सदैव शाँत रहे। लेकिन यह शाँति शक्ति और सामर्थ्य के साथ रही। उनके हाथ में त्रिशूल और चक्र यदि शक्ति का प्रतीक है तो शंख उनकी आभा का। अपने व्यक्तित्व का अहंकार न हो, लेकिन अस्तित्व रक्षा के लिये शक्ति और सामर्थ्य भी आवश्यक है। त्रिदेवों के संयुक्त स्वरूप का संदेश भी समाज के सभी समूहों से समन्वय बनाकर चलने में है। ठीक इसी प्रकार का संदेश उनके चौबीस गुरूओं में है। उनके गुरु समूह में धरती, आकाश,अग्नि जल और वायु से लेकर जलचर, नभचर और धरती पर विचरण करने वाले प्राणी भी प्रतीक रूप में है। पृथ्वी से सहनशीलता और धैर्य, जल से निर्मलता और शांति, वायु से अनासक्ति, अग्नि से पवित्रता और समदृष्टि, आकाश से व्यापकता, सूर्य से संस्र को प्रकाशमान करना अर्थात ज्ञान से प्रकाशित करना। चंद्रमा से मन को सदैव शीतल रखना, समुद्र से महानता और गहराई, अजगर से संतोष और निष्क्रियता, कबूतर से सावधानी, पतंग सदैव लोभ और आकर्षण में अपने प्राण खोता है, इसलिये आकर्षण से दूर रहना, मछली से इच्छाओं का नियमन, हिरण से एकाग्रता, हाथी से विशालता और परिवार समन्वय, मधुमक्खी से रस और ज्ञान की खोज लेकिन दाता को भी लाभ हो, मधुमख्खी के पराग रसपान से पुष्प में सुगंध बढ़ती है। नाग से एकांत जीवन,
पिंगला वैश्या से एकाग्रता और कार्य के प्रति तल्लीनता, मकड़ी से सृष्टि की रचना और वापस लेने की क्षमता, भृंगी कीट से इच्छानुसार निर्माण और भौंरा से ध्यान की एकाग्रता का संदेश है।
वस्तुतः भगवान दत्तात्रेय में त्रिदेवों का अंश माना गया है। उनकी केन्द्रीभूत चेतना देवी अनघा हैं। तब उन्हें किसी वाह्य प्रतीक से सीखने और समझने की आवश्यकता नहीं है। वे स्वयं पूर्ण हैं फिर भी यदि उन्होंने चौबीस गुरु बनाने की लीला की है, प्रेरणा दी है यह केवल संसार को संदेश देने के लिये है। जीवन की सार्थकता केवल अपने विचार तक सीमित होने में नहीं है। सृष्टि का सिद्धांत शून्य से सृष्टि की व्यापक यात्रा में है। यह तभी संभव है जब व्यक्ति सतत सीखने समझने और सामर्थ्य वृद्धि के अभियान में रहे। भगवान दत्तात्रेय के चौबीस गुरु होने की कथा में दोनों संदेश हैं। एक तो सतत सीखने का और दूसरा एक से अधिक गुरू बनाकर सीखने का। एक से अधिक गुरू बनाने का यह प्रसंग अकेला नहीं है। भगवान परशुराम जी के भी सात गुरू थे। उनमें एक गुरु भगवान दत्तात्रेय जी भी थे। भगवान दत्तात्रेय जी से उन्होंने श्रीविद्या का ज्ञान लिया और संसार को दिया था। भगवान दत्तात्रेय के दूसरे शिष्य सहस्रार्जुन थे। उन्हें नारायण के सुदर्शन का अवतार माना गया है। सहस्रार्जुन जी की जो भी अलौकिक सामर्थ्य थी वह दत्तात्रेय जी के वरदान से ही प्राप्त हुई थी।