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मान गए उस्ताद : कट्टरवादी मुस्लिमों को अमजद अली की तान ने दिया संदेश सबसे बड़ा है देश

प्रवीण दुबे

कोई मुस्लिम अगर वन्देमातरम और राजाराम सीताराम के स्वर बिखेरे तो वर्तमान के इस दौर में आश्चर्य होता है,लेकिन तानसेन समारोह के अंतराष्ट्रीय मंच से विश्वप्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतकार अमजद अली खान ने अपने सरोद से वन्देमातरम और रघुपति राघव राजा राम पतीत पावन सीताराम के स्वर गुंजायमान करके देश के लगभग 25 करोड़ मुस्लिमों को बहुत बड़ा संदेश देने की कोशिश की है।

ग्वालियर के सपूत खान साहब की इसके लिए जितनी तारीफ की जाए कम है।

सर्वविदित है कि हमारा देश इस समय अपने राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम की 150 वीं वर्षगांठ मना रहा है संसद के चल रहे शीतकालीन सत्र में वन्देमातरम पर विशेष चर्चा भी की गई थी
इस चर्चा के दौरान मुस्लिम धर्म से जुड़े कुछ सांसदों जैसे कि कांग्रेस के इमरान मसूद नेशनल कॉन्फ्रेंस के आगा सैयद मेहंदी सपा के शफीकुर रहमान बर्क जैसे तमाम मुस्लिम नाम वन्देमातरम न गाने की बात करते रहे हैं।

राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम का विरोध करने वाले मुस्लिमों की संख्या देश में बहुत बड़ी बताई जाती है। वे वन्देमातरम न गाते हुए तथा इसके गायन के वक़्त सम्मान स्वरुप खड़े होने तक की अशिष्टता करते रहे हैं।

इसके पीछे उनका तर्क है कि वन्दे मातरम के मूल छंद में देश को “माँ” के रूप में सर्वस्व रूप से सम्मानित करने वाले शब्द हैं, जिन्हें कुछ मुस्लिम नेताओं ने धार्मिक आस्था के विपरीत माना है।
ऐसा इसलिए क्यों कि इस्लाम में केवल एक ईश्वर (अल्लाह) की पूजा का सिद्धांत है, और वन्दे मातरम को पूजा या आराधना जैसा प्रतीत होने का तर्क दिया गया है।
यहां बताना उपयुक्त होगा कि भारत का संविधान किसी भी नागरिक को वन्दे मातरम् गाने या बोलने के लिए बाध्य नहीं करता।

यह राष्ट्रीय गीत है, जबकि राष्ट्रीय गान जन गण मन है — और उसमें भी गाना अनिवार्य नहीं, लेकिन उसके प्रति सम्मान दिखाना अनिवार्य है। यह सिद्धांत अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) से जुड़ा है।
बावजूद इसके
स्पष्ट है कि राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम के प्रति संविधान सम्मान की अपेक्षा जरूर करता है,और एक देशभक्त नागरिक होने के नाते चाहे वह किसी भी धर्म का हो वन्देमातरम का सम्मान करना ही चाहिए।

विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान ने शास्त्रीय संगीत के सबसे बड़े मंच तानसेन समारोह से वन्देमातरम की स्वर लहरियां छेड़कर राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान का संदेश दिया है

इतना ही नहीं उन्होंने इस देश की आत्मा कहे जाने वाले भगवान श्री राम से जुड़ा भजन रघुपति राघव राजा राम….तथा गांधी जी के प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिये को गुंजायमान करके पूरे देश के मुसलमानो को बहुत बड़ा संदेश दिया है।
धर्म के प्रति श्रद्धा तो स्वीकार है लेकिन कट्टरता और कटुता के साथ राष्ट्रीय मान बिन्दुओं के अपमान की मानसिकता ठीक नहीं इसे बदलना बहुत जरुरी है।

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