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स्वयंसेवकों ने किया वीरांगना को नमन कृष्णा रावत बोलीं स्त्री अबला नहीं, सबला है

ग्वालियर18 जून 2026/वीरांगना लक्ष्मीबाई के बलिदान को केवल याद करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारना भी आवश्यक है। कई महिलाएं कुछ कार्यों को पुरुषों का क्षेत्र मानती हैं, जबकि झांसी की रानी हर महिला के लिए साहस, आत्मविश्वास और नेतृत्व का अद्वितीय उदाहरण हैं। लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र को पीठ पर बांधकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
यह बात कथा वाचक कृष्णा रावत ने लक्ष्मीबाई समाधि के सामने गुरुवार को लक्ष्मीबाई के जीवन पर प्रकाश डालते हुए मुख्य वक्ता की आसंदी से कही।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महानगर ग्वालियर के तत्वावधान में वीरांगना लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में ग्वालियर विभाग संघचालक प्रहलाद सबनानी मंचासीन रहे। इस अवसर पर संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ.मनमोहन वैद्य भी विशेषरूप से उपस्थित रहे। इस मौके पर स्वयंसेवकों ने झांसी की रानी को प्रणाम किया। मुख्य वक्ता सुश्री रावत ने रानी लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्त्री अबला नहीं सबला है। लक्ष्मीबाई इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं। उन्होंने परिवार के साथ समाज और देशहित में काम किया। रानी लक्ष्मीबाई का जीवन जोश, जज्बा और राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण था। वे बचपन से ही घुड़सवारी और तलवारबाजी में निपुण थीं। जब अंग्रेजों ने दामोदर राव को दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार करने से इंकार करते हुए झांसी को अंग्रेजी शासन में मिलाने की घोषणा की, तब उन्होंने दृढ़ता से कहा था, ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।’ इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ वीरतापूर्वक संघर्ष किया। कृष्णा रावत ने कहा कि लक्ष्मीबाई केवल पराक्रमी योद्धा ही नहीं, बल्कि कुशल संगठक और दयालु व्यक्तित्व की धनी भी थीं। उनका संपूर्ण जीवन समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित रहा तथा आज भी सभी के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है। अबला नहीं, सबला है; लक्ष्मीबाई इसका सर्वोत्तम उदाहरण : कृष्णा रावत
-स्वयंसेवकों ने किया वीरांगना को प्रणाम
ग्वालियर। वीरांगना लक्ष्मीबाई के बलिदान को केवल याद करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारना भी आवश्यक है। कई महिलाएं कुछ कार्यों को पुरुषों का क्षेत्र मानती हैं, जबकि झांसी की रानी हर महिला के लिए साहस, आत्मविश्वास और नेतृत्व का अद्वितीय उदाहरण हैं। लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र को पीठ पर बांधकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
यह बात कथा वाचक कृष्णा रावत ने लक्ष्मीबाई समाधि के सामने गुरुवार को लक्ष्मीबाई के जीवन पर प्रकाश डालते हुए मुख्य वक्ता की आसंदी से कही। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ महानगर ग्वालियर के तत्वावधान में वीरांगना लक्ष्मीबाई के बलिदान दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में ग्वालियर विभाग संघचालक प्रहलाद सबनानी मंचासीन रहे। इस अवसर पर संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ.मनमोहन वैद्य भी विशेषरूप से उपस्थित रहे। इस मौके पर स्वयंसेवकों ने झांसी की रानी को प्रणाम किया। मुख्य वक्ता सुश्री रावत ने रानी लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्त्री अबला नहीं सबला है। लक्ष्मीबाई इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं। उन्होंने परिवार के साथ समाज और देशहित में काम किया। रानी लक्ष्मीबाई का जीवन जोश, जज्बा और राष्ट्रभक्ति से परिपूर्ण था। वे बचपन से ही घुड़सवारी और तलवारबाजी में निपुण थीं। जब अंग्रेजों ने दामोदर राव को दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार करने से इंकार करते हुए झांसी को अंग्रेजी शासन में मिलाने की घोषणा की, तब उन्होंने दृढ़ता से कहा था, ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।’ इसके बाद उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ वीरतापूर्वक संघर्ष किया। कृष्णा रावत ने कहा कि लक्ष्मीबाई केवल पराक्रमी योद्धा ही नहीं, बल्कि कुशल संगठक और दयालु व्यक्तित्व की धनी भी थीं। उनका संपूर्ण जीवन समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित रहा तथा आज भी सभी के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।

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