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व्यक्ति समाप्त होता है, विचार नहीं, महानाट्य ‘युगप्रवर्तक’ में जीवंत हुई डॉ.हेडगेवार की गाथा

-क्रांतिकारी चिंतन ने संघ स्थापना तक दर्शकों ने देखी इतिहास की यात्रा
-अटल बिहारी वाजपेयी सभागृह में 45 कलाकारों ने 40 से अधिक भूमिकाओं में किया प्रभावशाली अभिनय
ग्वालियर 22 जून 2026/राष्ट्रभक्ति, संगठन, त्याग और विचारों की शक्ति को केंद्र में रखकर प्रस्तुत किए गए महानाट्य ‘युगप्रवर्तक’ ने सोमवार को दर्शकों को भावविभोर कर दिया। जीवाजी विश्वविद्यालय स्थित अटल बिहारी वाजपेयी सभागृह में नादब्रह्म नागपुर के 45 कलाकारों द्वारा प्रस्तुत इस भव्य महानाट्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन, संघर्ष, राष्ट्रचिंतन और संगठन निर्माण की यात्रा को प्रभावशाली ढंग से मंचित किया गया। लगभग दो घंटे तक चले इस नाट्य प्रदर्शन ने दर्शकों को इतिहास के उन महत्वपूर्ण प्रसंगों से परिचित कराया, जिन्होंने एक संगठन और विचारधारा की नींव रखी।
संस्कार भारती द्वारा मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह व्यवस्था प्रमुख अनिल ओक, मध्य भारत प्रांत के प्रांत संघचालक अशोक पांडे, प्रांत सह कार्यवाह विजय दीक्षित, प्रांत सह संपर्क प्रमुख नवल शुक्ला, कुटुंब प्रबोधन के प्रांत संयोजक अशोक पाठक, ग्वालियर विभाग संघचालक प्रहलाद सबनानी  सहित अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
महानाट्य की शुरुआत वर्ष 1916 के कलकत्ता से होती है, जहां युवा केशव बलिराम हेडगेवार अनुशीलन समिति के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय दिखाई देते हैं। देश की स्वतंत्रता के लिए उनके भीतर जल रही राष्ट्रभक्ति की अग्नि और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प प्रारंभिक दृश्यों में प्रभावी रूप से उभरकर सामने आता है। डॉक्टर बनने के बाद भी उन्होंने व्यक्तिगत जीवन की सुरक्षा और सुविधा को त्यागकर राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना।
नाटक में नागपुर लौटने के बाद डॉ.बीएस मुंजे के सान्निध्य में उनके व्यक्तित्व के विकास और राष्ट्रजीवन के प्रति उनकी बढ़ती चिंता को दर्शाया गया। इसके साथ ही लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, योगी अरविंद और स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर के विचारों से उनके प्रभावित होने तथा इन महापुरुषों से प्राप्त प्रेरणा को भी प्रभावशाली ढंग से मंचित किया गया। तिलक से कर्मयोग, अरविंद से संगठन की आध्यात्मिक दृष्टि और सावरकर से प्रखर राष्ट्रभक्ति का संदेश प्राप्त करने के प्रसंग दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहे।
नाटक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक दिशा पर केंद्रित रहा। इसमें कांग्रेस के भीतर चल रहे विचार-विमर्श, पूर्ण स्वराज्य की
मांग, महात्मा गांधी से डॉ. हेडगेवार की भेंट तथा विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर उनके दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया। नाट्य प्रस्तुति में यह दर्शाया गया कि डॉ. हेडगेवार का मानना था कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति संगठन में निहित होती है और समाज की स्थायी उन्नति के लिए अनुशासित एवं संगठित शक्ति का निर्माण आवश्यक है।
हेडगेवार के ओजस्वी भाषणों और राष्ट्रवादी विचारों से ब्रिटिश शासन के चिंतित होने तथा उन पर लगाए गए राजद्रोह के अभियोग का मंचन भी प्रभावशाली रहा। उनके भाषणों पर प्रतिबंध लगाए जाने और जेल जाने के प्रसंगों ने दर्शकों को स्वतंत्रता आंदोलन के संघर्षपूर्ण दौर की याद दिलाई।
महानाट्य में 27 सितंबर 1925, विजयादशमी के दिन नागपुर के मोहिते के बाड़े में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना का दृश्य विशेष रूप से प्रभावशाली रहा। इस अवसर पर डॉ. हेडगेवार द्वारा युवाओं को संबोधित करते हुए संगठन, अनुशासन और राष्ट्र समर्पण का संदेश दिया जाता है। नाटक में यह भी दिखाया गया कि किस प्रकार उन्होंने देशभर में युवाओं से संवाद स्थापित कर समाज को संगठित करने का प्रयास किया।
प्रस्तुति के दौरान श्री गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर से उनकी मुलाकात और संगठन विस्तार की योजना को भी प्रभावी रूप में प्रस्तुत किया गया। वहीं 1935 के बाद बिगड़ते स्वास्थ्य के बावजूद संगठन कार्य के प्रति उनका समर्पण दर्शकों को भावुक कर गया। बीमारी की अवस्था में भी संघ कार्य की जानकारी लेते रहना और अंतिम समय तक राष्ट्रकार्य के प्रति समर्पित रहना उनके व्यक्तित्व की विशेषता के रूप में सामने आया।
नाटक का अंतिम भाग अत्यंत भावुक रहा, जब वर्ष 1940 में 51 वर्ष की आयु में डॉ. हेडगेवार के निधन का दृश्य मंचित किया गया। इस दौरान स्वयंसेवकों द्वारा व्यक्त किए गए भाव- ‘व्यक्ति समाप्त हो सकता है, लेकिन विचार नहीं’-ने पूरे सभागार को भावुक कर दिया। यह संदेश नाटक का केंद्रीय भाव बनकर उभरा कि किसी भी महान व्यक्तित्व की वास्तविक विरासत उसके विचार और आदर्श होते हैं।
अभिनय की दृष्टि से सतीश खेकाले ने डॉ. हेडगेवार की भूमिका को जीवंत कर दिया। उनके संवाद, भाव-भंगिमा और मंचीय उपस्थिति ने दर्शकों को प्रभावित किया। श्री गुरुजी की भूमिका में अमोल तेलपांडे, महात्मा गांधी की भूमिका में प्रशांत मांगडे तथा लोकमान्य तिलक की भूमिका में मंगेश बावसे ने भी उत्कृष्ट अभिनय का प्रदर्शन किया। नाटक का निर्देशन सुबोध सुरजीकर ने किया, जबकि लेखन डॉ. अजय प्रधान का रहा। निर्माता पद्माकर धानोरकर के निर्देशन में तैयार इस भव्य प्रस्तुति को दर्शकों ने भरपूर सराहना दी।
महानाट्य ‘युगप्रवर्तक’ केवल एक नाट्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि राष्ट्रचिंतन, संगठन, त्याग और समर्पण की एक प्रेरक यात्रा बनकर सामने आया, जिसने दर्शकों को इतिहास, विचार और राष्ट्रनिर्माण के मूल्यों से जोडऩे का कार्य किया।

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