प्रवीण दुबे
अब परीक्षा संगठन, रणनीति और सियासी प्रतिष्ठा की
दतिया। दतिया विधानसभा उपचुनाव के लिए मंगलवार शाम प्रचार का शोर थम गया। अब सभी की निगाहें 30 जुलाई को होने वाले मतदान और उसके बाद आने वाले जनादेश पर टिक गई हैं। यह उपचुनाव केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं रह गया, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों के लिए अपनी-अपनी राजनीतिक रणनीति की परीक्षा बन चुका है।
सबसे अधिक चर्चा भाजपा के चुनाव अभियान की रही। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश प्रभारी सहित अनेक मंत्री, विधायक और संगठन के पदाधिकारी लगातार दतिया की गलियों, मोहल्लों और चौराहों तक पहुंचे। पार्टी ने बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने में पूरी ताकत झोंक दी। इससे स्पष्ट है कि भाजपा ने इस सीट को अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रचार के दौरान दिखाई देने वाली भीड़ क्या मतदान के दिन वोट में बदल पाएगी? किसी भी चुनाव में अंतिम सफलता इसी कसौटी पर तय होती है।
इस चुनाव का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा से जुड़ा रहा। टिकट वितरण के बाद उत्पन्न परिस्थितियों को संभालने के लिए भाजपा ने लगातार डैमेज कंट्रोल की रणनीति अपनाई। वरिष्ठ नेताओं की सक्रियता और संगठन की मेहनत से माहौल को संतुलित करने का प्रयास किया गया। लेकिन मतदान के दिन ही स्पष्ट होगा कि कार्यकर्ताओं और परंपरागत मतदाताओं की संभावित नाराजगी पूरी तरह समाप्त हुई या उसका कुछ असर अब भी शेष है।
दूसरी ओर कांग्रेस ने भी चुनाव को हल्के में नहीं लिया। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आक्रामक प्रचार किया और भाजपा पर लगातार राजनीतिक हमले किए। हालांकि कांग्रेस ने भाजपा की तरह अपने बड़े राष्ट्रीय नेतृत्व को व्यापक रूप से चुनाव मैदान में नहीं उतारा। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को छोड़कर पार्टी का कोई बड़ा राष्ट्रीय चेहरा प्रचार में विशेष रूप से दिखाई नहीं दिया। इससे यह संदेश भी गया कि कांग्रेस ने चुनाव को गंभीरता से तो लिया, लेकिन भाजपा जैसी व्यापक संसाधन-आधारित लड़ाई नहीं लड़ी।
कांग्रेस के सामने एक और चुनौती दामोदर यादव के चुनाव मैदान में होने को लेकर भी मानी जा रही है। यदि वे कांग्रेस के संभावित मतों में सेंध लगाने में सफल होते हैं, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है। वहीं कांग्रेस प्रत्याशी का दतिया राज परिवार से जुड़ा होना निश्चित रूप से एक सकारात्मक पहलू माना जा रहा है। हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि यह सामाजिक और पारिवारिक पहचान मतदान में कितनी प्रभावी साबित होती है।
कुल मिलाकर दतिया उपचुनाव में मुकाबला केवल दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि संगठन की ताकत, नेतृत्व की विश्वसनीयता, स्थानीय समीकरण और कार्यकर्ताओं की सक्रियता की भी परीक्षा है। प्रचार समाप्त हो चुका है, अब फैसला मतदाता के हाथ में है। 30 जुलाई को होने वाला मतदान बताएगा कि क्या भाजपा अपनी पूरी ताकत झोंकने का राजनीतिक लाभ उठा पाती है या कांग्रेस सीमित संसाधनों के बावजूद सत्ता पक्ष को कड़ी चुनौती देने में सफल होती है। यह उपचुनाव आने वाले समय की मध्य प्रदेश की राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देने वाला साबित हो सकता है।
यह विश्लेषण उपलब्ध राजनीतिक तथ्यों और चुनावी गतिविधियों पर आधारित है। अंतिम निष्कर्ष मतदान और मतगणना के बाद ही स्पष्ट होंगे।