प्रवीण दुबे
सिंधिया के साथ नहीं दिखे तोमर-भारत सिंह, फिर उठे संगठन पर सवाल; भाजपा की अंदरूनी सियासत सड़कों तक आने लगी?
ग्वालियर21 सितंबर 2026/ग्वालियर के विकास की तस्वीर बदलने वाली बड़ी-बड़ी परियोजनाओं पर काम चल रहा है, लेकिन इन परियोजनाओं के साथ शहर की राजनीति की एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई देने लगी है। सवाल यह है कि क्या ग्वालियर के विकास की राजनीति अलग-अलग राजनीतिक खेमों में बंटती जा रही है?
इसे ग्वालियर का दुर्भाग्य कहा जाए या राजनीतिक संयोग, शहर में जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया विकास कार्यों का निरीक्षण करने निकलते हैं तो उनके साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर और स्थानीय सांसद भारत सिंह कुशवाह दिखाई नहीं देते। दूसरी ओर, जब स्थानीय सांसद भारत सिंह अपने स्तर पर क्षेत्रीय मुद्दों और विकास कार्यों को लेकर सक्रिय नजर आते हैं, तब सिंधिया अथवा उनके निकट माने जाने वाले मंत्री-विधायकों की मौजूदगी उसी अनुपात में नजर नहीं आती।
यह महज संयोग है या इसके पीछे ग्वालियर भाजपा की अंदरूनी राजनीति का कोई बड़ा समीकरण काम कर रहा है—यह सवाल अब राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ आम शहरवासियों के बीच भी चर्चा का विषय बन रहा है।
आज फिर दिखा अलग-अलग चलने का दृश्य
सोमवार को केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर में दिनभर विभिन्न विकास परियोजनाओं के निरीक्षण और कार्यक्रमों में सक्रिय नजर आए। उन्होंने महाराज बाड़े पर निर्माणाधीन मल्टीलेवल पार्किंग का निरीक्षण किया। बेसमेंट में लगातार जमा हो रहे पानी को लेकर उन्होंने प्रशासन और निर्माण कंपनी से पूरी स्टडी के बाद ही निर्णय लेने की बात कही। पार्किंग को फरवरी-मार्च तक पूरा करने का लक्ष्य बताया गया है।
इसके बाद सिंधिया ने ग्वालियर की महत्वपूर्ण चंबल-कोतवाल जल परियोजना का भी निरीक्षण किया। परियोजना के विभिन्न हिस्सों की प्रगति देखने के दौरान वे निर्माणाधीन पाइपलाइन के अंदर तक पहुंचे और काम की गुणवत्ता तथा मजबूती का जायजा लिया।
एलिवेटेड रोड के दूसरे चरण का निरीक्षण भी उनके कार्यक्रम का हिस्सा रहा। इस परियोजना को ग्वालियर के यातायात दबाव को कम करने वाली महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जा रहा है।
लेकिन इतने बड़े विकास कार्यक्रमों के बीच राजनीतिक रूप से जो बात चर्चा में रही, वह थी—ग्वालियर की राजनीति के दूसरे बड़े चेहरों की गैरमौजूदगी।
सवाल सिर्फ मौजूदगी का नहीं, संदेश का भी है
राजनीति में किसी नेता का किसी कार्यक्रम में मौजूद होना या नहीं होना अपने आप में किसी गुटबाजी का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। कार्यक्रमों की व्यस्तता, प्रशासनिक प्रोटोकॉल, विभागीय जिम्मेदारियां और अलग-अलग राजनीतिक कार्यक्रम भी इसके कारण हो सकते हैं।
लेकिन जब यही स्थिति बार-बार अलग-अलग मौकों पर दिखाई देती है तो सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं।
ग्वालियर में भाजपा के पास एक साथ कई बड़े राजनीतिक चेहरे हैं—केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और स्थानीय सांसद भारत सिंह कुशवाह। इसके अलावा राज्य सरकार और संगठन में भी ग्वालियर से जुड़े कई प्रभावशाली नेता हैं।
ऐसे में आम शहरवासी यह जानना चाहता है कि जब शहर के भविष्य से जुड़ी बड़ी परियोजनाओं की समीक्षा हो रही हो, तब क्या इन सभी नेताओं की सामूहिक मौजूदगी शहर के लिए बेहतर संदेश नहीं दे सकती?
क्या ग्वालियर भाजपा में चल रही है वर्चस्व की राजनीति?
ग्वालियर की राजनीति में अलग-अलग नेताओं के प्रभाव क्षेत्र और समर्थक समूहों की चर्चा लंबे समय से होती रही है। लेकिन किसी नेता के समर्थकों की मौजूदगी अथवा गैरमौजूदगी के आधार पर अंदरूनी मतभेद को निश्चित तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा।
फिर भी मौजूदा घटनाक्रम ने एक पुराना सवाल फिर सामने ला दिया है—क्या ग्वालियर भाजपा में राजनीतिक वर्चस्व को लेकर अलग-अलग ध्रुव सक्रिय हैं?
यदि ऐसा है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि शहर के विकास से जुड़े समन्वय का हो सकता है।
क्योंकि विकास परियोजनाएं किसी एक नेता की निजी उपलब्धि नहीं होतीं। उनमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन, नगर निगम, जनप्रतिनिधियों और संगठन—सभी की भूमिका होती है।
भाजपा जैसे अनुशासित संगठन के सामने बड़ा सवाल
भाजपा स्वयं को अनुशासित और संगठन आधारित राजनीतिक दल के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे में ग्वालियर जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र में यदि बड़े नेताओं के बीच दूरी का संदेश लगातार जनता तक पहुंचता है तो यह संगठन के लिए भी सवाल खड़ा करता है।
क्या संगठन ने सभी नेताओं को एक मंच पर लाने की पर्याप्त कोशिश नहीं की?
क्या संगठन के स्तर पर कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसके माध्यम से ग्वालियर के विकास से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में सभी प्रमुख जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर समन्वय बनाया जा सके?
या फिर ऐसा कोई गंभीर मतभेद है ही नहीं और जो कुछ दिखाई दे रहा है वह अलग-अलग कार्यक्रमों की सामान्य राजनीतिक व्यस्तता मात्र है?
इन सवालों का जवाब भाजपा संगठन के वरिष्ठ नेताओं को देना चाहिए, क्योंकि राजनीतिक दलों के भीतर होने वाली खींचतान यदि जनता को दिखाई देने लगे तो उसका असर संगठन की छवि पर भी पड़ता है।
विकास के मुद्दे पर एक साथ क्यों नहीं दिखते बड़े नेता?
ग्वालियर आज कई बड़ी परियोजनाओं के दौर से गुजर रहा है। चंबल-कोतवाल जल परियोजना, एलिवेटेड रोड, महाराज बाड़े की मल्टीलेवल पार्किंग और प्रस्तावित टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन जैसी योजनाएं शहर के भविष्य से सीधे जुड़ी हैं। टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन के लिए लगभग 5,500 करोड़ रुपये के निवेश और 18 हजार से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार की संभावना बताई गई है।
ऐसे समय में ग्वालियर के सभी बड़े भाजपा नेताओं को एक साथ खड़े होकर यह संदेश देना चाहिए कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन शहर का विकास सर्वोपरि है।
क्योंकि जनता यह नहीं देखना चाहती कि किस नेता का प्रभाव कितना है। वह यह देखना चाहती है कि सड़क कब बनेगी, पानी की समस्या कब दूर होगी, यातायात कब सुधरेगा और शहर को रोजगार के नए अवसर कब मिलेंगे।
सिंधिया की सक्रियता और उससे पैदा हुआ राजनीतिक सवाल
पिछले दो दिनों में सिंधिया की ग्वालियर क्षेत्र में सक्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई दी है। उन्होंने टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग जोन से लेकर चंबल-कोतवाल जल परियोजना और एलिवेटेड रोड तक विभिन्न परियोजनाओं का निरीक्षण किया है।
लेकिन जितनी चर्चा इन परियोजनाओं की हो रही है, उतनी ही चर्चा इस बात की भी हो रही है कि इन मौकों पर ग्वालियर भाजपा के सभी बड़े चेहरे एक साथ क्यों नजर नहीं आते।
यही वह बिंदु है जहां विकास और राजनीति एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।
क्या संगठन हस्तक्षेप करेगा?
सबसे बड़ा सवाल अब भाजपा संगठन की भूमिका को लेकर है।
यदि वास्तव में नेताओं के बीच किसी प्रकार की राजनीतिक दूरी है तो उसे समय रहते दूर करना संगठन की जिम्मेदारी है। और यदि कोई मतभेद नहीं है तो संगठन और नेताओं को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जनता के बीच ऐसा संदेश न जाए कि ग्वालियर भाजपा अलग-अलग खेमों में बंटी हुई है।
क्योंकि शहर में यह धारणा मजबूत होना किसी के लिए भी लाभदायक नहीं होगी।
ग्वालियर को ऐसे नेताओं की जरूरत है जो विकास के सवाल पर एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई दें—चाहे राजनीतिक मंच अलग हों।
आज जरूरत इस बात की है कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, सांसद भारत सिंह कुशवाह और ग्वालियर से जुड़े अन्य भाजपा नेता व्यक्तिगत या राजनीतिक समीकरणों से ऊपर उठकर शहर के विकास के मुद्दों पर एक साझा मंच तैयार करें।
आखिरकार जनता ने नेताओं को आपस में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई देखने के लिए नहीं, बल्कि ग्वालियर के विकास के लिए चुना है।
सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि कौन किसके साथ खड़ा है। बड़ा सवाल यह है कि ग्वालियर के लिए ये सभी बड़े नेता कब एक साथ खड़े दिखाई देंगे?
Praveen dubey @shabd shakti news. in