प्रवीण दुबे
यही रात अंतिम यही रात भारी
बस एक रात की है कहानी ये सारी
लोकतंत्र में चुनाव किसी रणांगन से कम नहीं होते और इस राजनीतिक समर में फैसले से पूर्व की अंतिम रात्रि को कालरात्रि की संज्ञा दी जाए तो अतिश्योक्ति नहीं कही जाना चाहिए। आखिर वह घड़ी आ ही गई चन्द घण्टों बाद समय यह तय कर देगा कि लोकतंत्र के समर का विजयी मुकुट किसके सिर सजने वाला है, मध्यप्रदेश में कमल फिर खिलेगा या कमलनाथ सत्ता के सिंहासन को सुशोभित करेंगे।
निःसन्देह आज की रात्रि प्रदेश में 15 वर्षों से सत्ता की बागडोर सम्हालने वाले शिवराज के लिए बेहद बेचैनी भरी होगी , ऐसा नहीं कि शिवराज के सामने इस तरह की घड़ी पहली बार आई है वे फैसले की घड़ी से पूर्व की रात्रि का अपने जीवन में एक नहीं दो नहीं तीन बार सामना कर चुके हैं लेकिन इसबार की यह रात्रि अलग हटकर नजर आ रही है निःसंदेह यह उनके लिए कड़ी अग्निपरीक्षा से कम नहीं शायद यही वजह है कि फैसले की घड़ी से पूर्व आज की रात्रि के बचे चन्द घण्टों की घड़ियां उन्हें किसी साल से कम नजर नहीं आ रही होंगी। यही हाल उनकी सेना के अन्य योद्धाओं का भी होगा। उनके सामने खतरे की घण्टी बजाते एग्जिट पोल हैं तो दूसरी ओर लगातार 15 वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद परिवर्तन का भय उन्हें सता रहा होगा ऐसे समय बड़े से बड़े योद्धा को भी खुद को संतुलित रख पाना बेहद कठिन कहा जा सकता है।
इस चुनावी समर के दूसरे योद्धा की बात की जाए तो उसके लिए भी परिणाम के पूर्व की यह रात्रि बेहद परेशान और अधीर करने वाली कही जा सकती है। 15 वर्ष के वनवास के बाद आशा की किरण मन को प्रफुल्लित कर रही है तो दूसरी ओर मध्यप्रदेश में जनता के बीच लगातार घटता जनाधार , 15 वर्ष पूर्व सत्ता पर काबिज रहने के दौरान खराब इतिहास , गुटबाजी और अपने शीर्ष नेतृत्व की पप्पू छाप छवि , भ्र्ष्टाचार व एक परिवार का पार्टी पर लगातार आधिपत्य के दुष्प्रभाव अनहोनी तथा परिणामों की पुरानी कहानी को दोहराने का भय निश्चित ही सता रहा होगा। ऐसे समय अंतिम रात्रि में धैर्य रखना उनके लिए भी किसी कड़ी परीक्षा से कम नहीं होगा।
लोकतंत्र में प्रतिद्वंद्वीओं की बात हो और जनता का ज़िक्र न हो तो कुछ अधूरा सा लगता है। लोकतंत्र में जनता को जनार्दन की संज्ञा दी जाती है। क्योंकि सिंहासन का ताज किसके सिर बंधेगा यह जनता ही तय करती है। यूं तो जनता ने 28 नवम्बर को ही वोट की चोट से इसका निर्णय कर दिया लेकिन फैसला आने की अंतिम रात्रि उसे भी परेशान किये हुए है , जनता जनार्दन में से बदलाव की मानसिकता विजयी होगी या फिर 15 वर्षों के कामकाज की सराहना करने वालों को सफलता मिलेगी यह अंतर्द्वंद आज की रात्रि पूरे चरम पर रहेगा। तो आइए भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती का सांस रोककर साहस के साथ मजा लीजिए पर जरा सम्भलकर क्योंकि यह फैसला आने के पूर्व की अंतिम रात्रि है।