प्रवीण दुबे
मध्यप्रदेश की सियासत पर दिल्ली की नजर, मोदी ने संभाला मोर्चा; दतिया से लेकर सरकार की कार्यशैली तक पर मंथन
नई दिल्ली/भोपाल। मध्यप्रदेश की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर दिल्ली में बेचैनी बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। दतिया उपचुनाव में टिकट को लेकर मचे विवाद, भाजपा की हार, सरकार की कार्यशैली और जनता से मिल रहे कथित नकारात्मक फीडबैक के बीच अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्यप्रदेश के मामलों पर सीधे फोकस बढ़ा दिया है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आमतौर पर मध्यप्रदेश जैसे संगठनात्मक और राजनीतिक मामलों में भाजपा के नंबर दो माने जाने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं, लेकिन पिछले करीब एक सप्ताह में प्रधानमंत्री मोदी की मध्यप्रदेश के प्रमुख नेताओं के साथ हुई अलग-अलग मुलाकातों और बातचीत ने सियासी हलकों का ध्यान खींचा है। मोदी ने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर सहित मध्यप्रदेश से जुड़े प्रमुख नेताओं से संवाद किया है।
दतिया के घटनाक्रम ने बढ़ाई चिंता
मध्यप्रदेश भाजपा में हालिया घटनाक्रम की शुरुआत दतिया विधानसभा सीट पर टिकट को लेकर पैदा हुए विवाद से जोड़कर देखी जा रही है। पूर्व मंत्री एवं दतिया के कद्दावर नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने के बाद पार्टी के भीतर उठे सवाल और इसके बाद हुए उपचुनाव में भाजपा की हार ने प्रदेश संगठन और सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर नए सिरे से मंथन की स्थिति पैदा कर दी है।
दतिया प्रकरण के साथ ही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से जुड़े उज्जैन के जमीन संबंधी मामलों पर एक बड़े अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट ने भी राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया। इसके अलावा प्रदेश की उच्च नौकरशाही पर सरकार की कथित अत्यधिक निर्भरता, विकास कार्यों के समय पर पूरा नहीं होने और जनता के बीच सरकार को लेकर मिल रहे कथित नकारात्मक फीडबैक जैसे मुद्दे भी दिल्ली के राजनीतिक विमर्श में शामिल बताए जा रहे हैं।
नरोत्तम मिश्रा को लेकर भी समीकरण चर्चा में
भाजपा के भीतर यह चर्चा भी है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और डॉ. नरोत्तम मिश्रा के बीच समय-समय पर निकटता के राजनीतिक संकेत दिखाई देते रहे हैं। ऐसे में दतिया से मिश्रा का टिकट कटना और इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका को लेकर पार्टी के भीतर पैदा हुई चर्चाओं ने कई सवाल खड़े किए हैं।
हालांकि इन चर्चाओं को लेकर पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे फिलहाल भाजपा के अंदरूनी राजनीतिक समीकरणों और संभावित रणनीतिक मंथन के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
क्या नेतृत्व परिवर्तन की आहट है?
प्रधानमंत्री मोदी के मध्यप्रदेश से जुड़े नेताओं के साथ लगातार संवाद के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की जमीन तैयार हो रही है?
फिलहाल ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा। भाजपा में बड़े राजनीतिक फैसले अचानक नहीं लिए जाते। संगठन और सरकार के प्रदर्शन, चुनावी संभावनाओं, जनधारणा, नेताओं के आपसी समीकरण और भविष्य के राजनीतिक नफा-नुकसान का व्यापक आकलन करने के बाद ही कोई बड़ा निर्णय सामने आता है।
इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की सक्रियता को तत्काल नेतृत्व परिवर्तन का संकेत मानना उचित नहीं होगा। इतना जरूर है कि मध्यप्रदेश को लेकर दिल्ली में राजनीतिक मंथन का दौर तेज दिखाई दे रहा है और प्रदेश की सरकार तथा संगठन के प्रदर्शन पर शीर्ष नेतृत्व की नजर पहले से अधिक केंद्रित है।
फिलहाल तस्वीर इतनी ही है—फैसला नहीं, मंथन का दौर है। भाजपा में नफा-नुकसान के पूरे आंकलन के बाद ही अगला कदम उठाया जाता है। ऐसे में मध्यप्रदेश की सियासत में आगे क्या होता है, इस पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।