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आजादी का अमृत महोत्सव : अब आईसीएचआर के पोस्टर व सही इतिहास देख कांग्रेस व वामपंथियो ने खड़ा किया विवाद

स्वतंत्रता के 75 वर्ष पर देशभर में मनाए जा रहे आजादी के अमृत महोत्सव को लेकर किये जा रहे आयोजनों व उससे जुड़ी सामग्री को लेकर भी अब कांग्रेस व वामपंथियों ने विवाद प्रारम्भ कर दिया है। उन्हें यह बात कतई पसंद नहीं आ रही है कि विगत 75 वर्षों में देश की आजादी और उससे जुड़े इतिहास के बारे में उन्होंने जो कुछ बताया समझाया या लिखा है उसमें किसी भी प्रकार का कोई अनुसंधान किया जाए या फिर जो सही इतिहास देशवासियों से छुपाया गया उसकी जगह सच सामने लाया जाए। यह कार्य जब भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) द्वारा शुरू किया गया और इसके प्रारंभ में आजादी से जुड़ा एक पोस्टर जारी किया तो कांग्रेस ने उसपर विवाद खड़ा कर दिया है। इसी प्रकार केरल के सीएम पिनाराई विजयन (Pinarayi Vijayan) ने भी एक अन्य विषय पर विरोध करके माहौल को गंदा करने का कार्य प्रारंभ कर दिया है अब इसको लेकर विवाद शुरू हो गया है।

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) द्वारा जारी ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के पोस्टर पर विवाद खड़ा हो गया. पोस्टर पर नेहरू की तस्वीर न होने को लेकर कई कांग्रेस नेताओं ने आपत्ति जताई है.

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने आईसीएचआर की वेबसाइट का एक स्क्रीन शॉट शेयर किया है. इसमें एक पोस्टर पर महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, बीआर आंबेडकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मदन मोहन मालवीय और वीर सावरकर की तस्वीरें हैं.लेकिन इस पोस्टर में नेहरू की तस्वीर नहीं है.

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने एक ट्वीट कर लिखा, “ये सिर्फ़ निंदनीय नहीं, बल्कि इतिहास के ख़िलाफ़ भी है कि आज़ादी का जश्न भारतीय आज़ादी की महत्वपूर्ण आवाज़ रहे जवाहरलाल नेहरू को हटाकर मनाया जाए. एक बार फिर, आईसीएचआर ने खुद का नाम ख़राब किया है. ये एक आदत बनती जा रही है!”

कांग्रेस नेता जयराम रमेश में ने भी थरूर के ट्विट को रिट्विट कर सरकार की आलोचना की.

कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने लिखा, “देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का आज़ादी का अमृत महोत्सव में नाम नहीं होने से उनकी शख़्सियत कमज़ोर नहीं हो जाती. ये बस बताता है कि पीएम और बीजेपी नेहरू की विरासत से कितना डरते और घबराते हैं. इस तरह की असुरक्षा की भावना पीएम को शोभा नहीं देती.”

कांग्रेस प्रवक्ता गौरव गोगोई ने लिखा, “कौन सा दूसरा ऐसा देश होगा जो आज़ादी की लड़ाई से जुड़ी वेबसाइट से देश के पहले प्रमुख को हटा देगा. आईसीएचआर का पंडित नेहरू और अबुल कलाम आज़ाद की तस्वीरों को हटाना, छोटी सोच और अन्याय है. भारत ये नहीं भूलेगा कि आरएसएस ने आज़ादी की लड़ाई से दूर रहने का फ़ैसला किया था.”

दूसरी विपक्षी पार्टियों ने भी निशाना साधा
दूसरी विपक्षी पार्टियों ने भी इस मामले में पीएम मोदी और बीजेपी पर निशाना साधा है.

तृणमूल कांग्रेस के साकेत गोखले ने लिखा, “नरेंद्र मोदी को पता है कि वो कोई विरासत छोड़कर नहीं जाएंगे. इतिहास उन्हें एक कमज़ोर, अहंकारी व्यक्ति की तरह याद रखेगा, जिन्होंने अपने फ़ायदे के लिए देश को बेचने और बर्बाद करने की कोशिश की. नेहरू और मौलाना आज़ाद को मिटाने के लिए मोदी बहुत छोटे हैं.”

ट्विटर पर कई लोगों ने कांग्रेस के समर्थन में ट्वीट किया तो कई लोगों ने आलोचनाओं का जवाब देते हुए याद दिलाया कि पीएम मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को याद किया था.

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने लिखा, “आईसीएचआर के पोस्टर से नेहरू की तस्वीर हटाई जा सकती है लेकिन न तो आज़ादी के आंदोलन में उनके योगदान को भुलाया जा सकता है और न ही आधुनिक भारत के निर्मता के तौर पर उनकी छवि को मिटाया जा सकता है.”

ऋचा वृक्ष नाम के एक ट्विटर यूज़र ने लिखा, “आईसीएचआर को बीच में देश के प्रथम प्रधानमंत्री की तस्वीर लगानी थी. इतिहास पर शोध करने वालों से ऐसी ग़लती.”

कुनाल जाधव नाम के एक ट्विटर यूज़र ने लिखा, “केवल इसलिए कि पोस्टर में नेहरू की तस्वीर नहीं है और सावरकर की है, लोग बीजेपी सरकार की तुलना तालिबान से कर रहे हैं.”

इस बारे में आईसीएचआर के अध्यक्ष ओम जी उपाध्याय ने टीवी चैनल टाइम्स नाऊ से हुई बातचीत में कहा, “उनकी संस्था का इरादा किसी को कमतर साबित करने का नहीं है. लेकिन ये ज़रूर है कि हमने उन व्यक्तित्वों को पोस्टर में जगह दी है, जिनके योगदान को अब तक ख़ास महत्व नहीं मिला.”

उन्होंने यह भी कहा कि “अभी केवल आठ ही चेहरों को पोस्टर में जगह मिली है, जब 16 या 24 चेहरे सामने आएंगे तो उसमें नेहरू हो सकते हैं.”

वहीं, आईसीएचआर की प्रतिक्रिया सामने आने के बाद भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री वी मुरलीधरन ने शशि थरूर पर हमला बोला है. उन्होंने कहा, “थरूर को कुछ बातें भूलने की बीमारी है. अभी 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने जवाहरलाल नेहरू के योगदान की चर्चा की थी. वे शायद ये मानते हैं कि किसी को याद करने का एकमात्र तरीका पोस्टर ही

उधर केरल के सीएम पिनाराई विजयन (Pinarayi Vijayan) ने स्वतंत्रता सेनानियों की सूची ( Freedom Fighters List) से मालाबार विद्रोह के नेताओं का नाम हटाने को लेकर केंद्र की आलोचना की है। सीएम विजयन ने कहा, ‘वरियामकुनाथ कुंजाहमद हाजी विद्रोह के नेता थे। इनके साथ ही अन्‍य लोग जो इस आंदोलन का हिस्‍सा थे, उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मान्यता प्राप्त थी।’

बता दें कि यह विवाद स्वतंत्रता सेनानियों की सूची से 1921 के मालाबार विद्रोह में भाग लेने वाले लोगों के नाम हटाने पर शुरू हुआ था।सीएम पिनाराई विजयन ने कहा, “इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि 1921 का विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ था और बाद में यह  अंग्रेजों की मदद करने वाले जमींदारों के खिलाफ शुरू हो गया। यह सच है कि कुछ लोगों ने स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश की।

भाजपा और आरएसएस द्वारा विद्रोह को तालिबानी मानसिकता कहे जाने को लेकर मुख्यमंत्री ने जवाब दिया कि वरियामकुनाथ और अन्य को स्वतंत्रता सेनानियों के रूप में मान्यता दी गई थी। स्वतंत्रता संग्राम सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, किसान आंदोलन और सशस्त्र विरोध जैसे कई आंदोलन हुए। उन्होंने कहा कि सभी का उद्देश्य अंग्रेजों को बाहर करना था। विजयन ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि अंग्रेजों को हटाने के बाद शासन व्यवस्था पर उनकी अलग राय थी, इसका मतलब यह नहीं है कि वे स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा नहीं थे।’

आपको बता दें कि भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के तीन सदस्यीय पैनल ने वरियामकुनाथ और अली मुसलियार सहित 387 शहीदों को स्वतंत्रता संग्राम की लिस्‍ट से हटाने की मांग की थी। गौरतलब है कि हिंदू दक्षिणपंथी समूहों का दावा है कि वह कट्टरपंथियों के नेता थे जिन्होंने 1921 में दक्षिण मालाबार के एरानाडु और वल्लुवनाडु तालुकों में हिंदुओं को निशाना बनाया था।

नेहरू पर बवाल मचाने वाले धैर्यपूर्वक चिंतन करें हर विषय पर राजनीति ठीक नहीं : डॉ रत्नम

इस पोस्टर पर सवाल उठाने वाले और राजनीतिक बयानबाजी करने वाले लोगों को जवाब देते हुए आई सी एच आर के सचिव प्रोफेसर डॉ कुमार रत्नम ने जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसे तो इस पोस्टर में भगतसिंह को जगह दी है पर चंद्रशेखर आजाद नहीं हैं पर इसका अर्थ यह नहीं की उनके कद को कम किया है। किसी भी कोशिश में यह नेहरू के कद को कम करने की बात नहीं है वैसे भी किसी भी एक पोस्टर में किसी का चित्र न होने से उसका कद कम नहीं हो जाता । डॉ रत्नम ने कहा कि जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं उन्हें धैर्यपूर्वक इसको देखना चाहिए शोध के नजरिये से जो कुछ सामने आया है वह व्यक्त किया गया है क्रमागत इतिहास पर आगे का इंतजार धैर्य से करना चाहिए इसे राजनीतिक नजरिए से देखने की जरूतर नहीं है। वीर सावरकर को पोस्टर में जगह देने के सवाल पर रत्नम ने कहा कि सावरकर जी ने देश की आजादी के लिए लंबी लड़ाई लड़ी अतः उनके योगदान को दृष्टिगत रखते हुए ऐसा किया गया है।

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