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आज ही के दिन नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को दी गई थी फांसी

आज का इतिहास :बात 30 जनवरी 1948 की है। भारत को आजादी मिले 6 महीने हुए थे। शाम हो चुकी थी और घड़ी में बज रहे थे सवा पांच। महात्मा गांधी बिड़ला हाउस के प्रार्थना सभा की ओर जा रहे थे। उनके साथ एक शख्स थे गुरबचन सिंह। जिन्होंने गांधी जी से कहा था कि बापू आज आपको थोड़ी देर हो गई है। गांधी जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था कि जो लोग देर करते हैं, उन्हें सजा मिलती है। इस बात को कुछ मिनट ही हुए थे कि एक शख्स सामने आया और एक-एक कर तीन गोलियां महात्मा गांधी के सीने में उतार दीं। महात्मा गांधी की हत्या हो गई थी। गोली मारने वाला शख्स था नाथूराम गोडसे।

गोडसे तो पहले ही महात्मा गांधी की हत्या कर देता। उसने हत्या की साजिश दिल्ली रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में रची थी, लेकिन उस वक्त गोडसे का मन बदल गया था। 8 महीने तक गांधी जी की हत्या का केस लालकिले में बनी ट्रायल कोर्ट में चला। इस दौरान 149 चश्मदीद गवाह और अन्य गवाह शामिल रहे। 10 फरवरी 1949 को जज आत्मचरण की अदालत ने नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे को फांसी की सजा दी। बाकी 5 लोग विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, शंकर किस्तैया, गोपाल गोडसे और दत्ता परचुरे को उम्रकैद की सजा सुनाई गई। विनायक दामोदर सावरकर को बरी कर दिया गया। हाईकोर्ट ने किस्तैया और परचुरे को भी बाद में रिहा कर दिया।

फांसी वाले दिन गोडसे से मिलने उसके परिजन भी अंबाला जेल पहुंचे थे। 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे और नारायण  आपटे को फांसी दी गई। जिस दिन दोनों को फांसी की सजा सुनाई जा रही थी, उस दिन गोडसे के एक हाथ में गीता, अखंड भारत का नक्शा था और दूसरे हाथ में भगवा रंग का झंडा।

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