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आतंकवाद पर पश्चिमी मीडिया की दोहरी ज़ुबान: शब्द भी चुनिंदा और संवेदना भी

सुदेश गौड़

आतंकवाद की परिभाषा क्या होती है—यह पश्चिमी मीडिया को तब पूरी तरह याद आ जाती है, जब हमला न्यूयॉर्क, लंदन या सिडनी में होता है। लेकिन वही हिंसा जब भारत की धरती पर होती है, तो शब्दकोश अचानक बदल जाता है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सोची-समझी प्रवृत्ति है।

पहलगाम में इसी साल 22 अप्रैल को पाकिस्तानी आतंकियों ने 26 निर्दोष नागरिकों की नृशंस हत्या की थी जो कश्मीर में घूमने आए थे। यह हमला पूरी तरह आतंकवादी था—डर पैदा करने, संदेश देने और अस्थिरता फैलाने के इरादे से किया गया। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया के प्रतिष्ठित अख़बार Daily Telegraph ने अपनी शुरुआती रिपोर्टिंग में इस घटना को सीधे “terror attack” कहने के बजाय “deadly attack” और “gunmen attack” जैसे शब्दों में प्रस्तुत किया। फोकस आतंकियों की विचारधारा या नेटवर्क पर नहीं, बल्कि “टूरिस्ट्स के भागने” और “क्षेत्र में तनाव” पर रहा। Daily Telegraph, 23 April 2025 का शीर्षक था “Tourists flee Pahalgam after deadly attack in India’s Kashmir”.

इसके ठीक उलट, सिडनी में हुई हिंसक घटना के बाद यही Daily Telegraph बिना किसी हिचक के ‘terrorist’, ‘extremist violence’ और ‘attack on Australian values’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है। इतना ही नहीं और शीर्षक भी दिया ‘You Bastards’.
इस घटना की रिपोर्टिंग में न कोई संदर्भ खोजा गया, न सामाजिक पृष्ठभूमि की व्याख्या, न ही यह कहा गया कि “मामला जटिल है”। क्योंकि तब पीड़ित पश्चिमी थे।
यह दोहरा मापदंड सिर्फ Daily Telegraph तक सीमित नहीं है।ब्रिटेन के BBC की रिपोर्टिंग में अक्सर भारत में हुए आतंकी हमलों को “militant attack” या “insurgency-related violence” कहा जाता है, जबकि ब्रिटेन या यूरोप में इसी तरह की घटनाओं पर वह खुलकर “terrorism” शब्द का प्रयोग करता है।
अमेरिकी अख़बार New York Times भारत में हुए हमलों को बार-बार “disputed region” और “long-running conflict” के फ्रेम में रखता है—मानो बंदूक उठाकर निर्दोषों को मार देना किसी राजनीतिक बहस का स्वाभाविक परिणाम हो।
Al Jazeera जैसे चैनल तो कई बार हमलावरों की पहचान और मकसद पर इतना “संतुलन” साधते हैं कि पीड़ित हाशिये पर चले जाते हैं।

यह भाषा सिर्फ पत्रकारिता की लापरवाही नहीं है; यह एक खतरनाक नैरेटिव है। जब आतंकवाद को सॉफ्ट शब्दों में ढका जाता है, तो अपराध की क्रूरता कम नहीं होती—बल्कि उसे वैचारिक छूट मिलती है। यह पीड़ितों के साथ दूसरा अन्याय है।

सवाल सीधा है—
अगर सिडनी में निर्दोषों की हत्या आतंकवाद है,अगर लंदन में चाकू से हमला “टेरर” है,
तो फिर पहलगाम में गोलियों से मारे गए लोग किस अपराध के शिकार थे?क्या आतंकवाद की पहचान पासपोर्ट देखकर तय की जाएगी?

भारत दशकों से आतंकवाद झेल रहा है। यह हमारे लिए कोई “ब्रेकिंग न्यूज़” नहीं, बल्कि रोज़ की सच्चाई है। लेकिन जब पश्चिमी मीडिया शब्दों में हेरफेर करता है, तो वह केवल भारत को नहीं, बल्कि वैश्विक आतंकवाद-विरोधी संघर्ष को कमजोर करता है।

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई ईमानदार तभी होगी, जब शब्दों में भी ईमानदारी होगी। वरना इतिहास यही कहेगा कि पश्चिमी मीडिया ने आतंकवाद को तब तक आतंकवाद नहीं माना, जब तक उसकी आग खुद उनके घर तक नहीं पहुँची।

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