प्रवीण दुबे
ऐसी स्मार्टनेस से भगवान बचाए इसे स्मार्ट नहीं भट्ट गंवार कहा जाए तो ज्यादा उपयुक्त होगा जनाब आप सोच रहे होंगे आखिर हम कहना क्या चाहते हैं ?
तो हम आपको बता दें कि यहां हम चर्चा कर रहे हैं राजा महाराजाओं बॉस और दादाओं के शहर ग्वालियर की जिसके बारे में स्मार्ट सिटी, स्मार्ट सिटी सुन सुनकर कान पक गए लेकिन कभी भी स्मार्टनेस देखने को नहीं मिली हमेशा ढोल में पोल ही नजर आया।
हाल ही की बात करें तो शहर के महाराज बाड़ा से सटे दौलतगंज के एक रिहायशी मकान में हुए अग्निकांड में जो कुछ देखने को मिला उसने जिला प्रशासन सहित ग्वालियर के स्मार्ट सिटी होने के ढिढोरे की पोल खोलकर रख दी है।
शर्मनाक सिस्टम और उसे प्रदेश सरकार से लेकर नगर सरकार तक प्राप्त एव्रीथिंग राइट के सर्टिफिकेट की सच्चाई धरातल पर कितनी झूठी है यह सबने देख लिया है।
इससे ज्यादा शर्मनाक नाकारापन और क्या होगा कि एक ओर भभकती आग के बीच जिंदगी असहाय हो चीख रही थी तो दूसरी ओर घटना स्थल पर पहुँची फायर ब्रिगेड की गाड़ियों के होजरील (पाइप) में कई छेदों की वजह से पानी का प्रेशर कम हो गया और आग पर समय रहते काबू नहीं पाया जा सका परिणाम मौत जीत गई जिंदगी हार गई।
इतना ही नहीं दमकल की गाड़ियाँ घटनास्थल पर देरी से पहुँचीं और इस विलंब के कारण आग ने विकराल रूप धारण किया और जनहानि हुई।
भीड़ भरे महाराज बाड़ा दौलतगंज क्षेत्र में चोतरफा अतिक्रमण भी फायर ब्रिगेड के समय रहते दुर्घटना स्थल तक पहुंचने में बाधक बना और असहाय पुलिस वाले सीटी बजाते इधर उधर भागते दिखाई दिए।
सबसे बड़ा सवाल चार पहियों की लग्जरी गाड़ियों में बैठकर दौलतगंज से बाड़ा सराफा होकर रोजाना गुजरने वाले बेशर्म नौकरशाहों को इन बाजारों में पसरा अतिक्रमण दिखाई नहीं देता क्या ?
शुक्र है भगवान का कि अभी तक दानाओली दहीमंडी टोपी बाजार नजरबाग सुभाष मार्केट जैसी सैकड़ों कंजस्टेड स्थानों पर कोई अग्निकांड नहीं हुआ भगवान न करे कभी ऐसा हो,
अफ़सोस की बात है कि पिछले वर्षों में मोचीओली इंदरगंज में हुए भीषण अग्निकाडों जिनमें बड़ी जनहानि हुईं लेकिन हमारे नौकरशाहों और जन प्रतिनिधियों ने कोई सबक नहीं सीखा है, ये लोग पिछली बरसात में सड़कों की दुर्दशा के कारण राष्ट्रीय स्तर पर ग्वालियर की नककटी कराने के बावजूद नहीं सुधरे हैं,
और हमारे प्रभारी मंत्री का तो कहना ही क्या शहर में आग लगे , सड़कें तालाब बने या खंदक उनको तो सिर्फ महाराज से ही मतलब है मीडिया सवाल करे तो भड़क उठते हैं,वर्तमान के विषय पर भी उनका यहां आना तो दूर फोन पर सम्पर्क करना भी मुश्किल है
इन सबकी इन्ही हरकतों के कारण ही ग्वालियर पचास वर्ष से भी पीछे जा चुका है और यहां की जनता का जीवन खतरे में पड़ गया है।