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कई दिग्गजों को धूल चटा चुके अनूप पर भाजपा के अटूट विस्वास की अग्निपरीक्षा

भारतीय जनता पार्टी ने ग्वालियर की भितरवार विधानसभा सीट से एकबार पुनः अनूप मिश्रा पर विश्वास करके राजनीतिक पंडितों को चोंका दिया है। पार्टी का यह निर्णय कई मायनों में कुछ अलग कहा जा सकता है। पहला तो यह कि पार्टी ने  ऐसे समय जब तमाम मंत्रियों विधायकों के टिकट काटकर नए चेहरों पर विश्वास किया है उस दौरान भितरवार से पिछला चुनाव हारने वाले अनूप मिश्रा को पुनः मैदान में उतारकर आश्चर्यजनक निर्णय लिया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि श्री मिश्रा वर्तमान में मुरैना से सांसद हैं पार्टी ने उन्हें विधायक का टिकट देकर संकेत दिए हैं कि उनकी दिल्ली की जगह भोपाल की राजनीति में ज्यादा जरूरत है। 

वैसे अनूप मिश्रा के राजनीतिक सफर पर नजर दौड़ाई जाए तो उनके विधानसभा में पहुंचने की शुरुआत  1990 में तत्कालीन गिर्द विधानसभा क्षेत्र से ही होती है। यह वही विधानसभा सीट है जो नए परसीमन के बाद आज की भितरवार विधानसभा सीट बन गई है। इस प्रकार अनूप मिश्रा के लिए यह विधानसभा सीट नई नहीं  कही जा सकती है।

अपनी ओपनिंग के अलावा श्री मिश्रा ने अब तक कुल तीन बार इस ग्रामीण इलाके से ताल ठोंकी और बालेंदु शुक्ल जैसे कद्दावर कांग्रेसी नेता  को हराया ।  हलांकि अनूप मिश्रा को एकबार गिर्द से हार का मुंह भी देखना पड़ा था। इतना ही नही अनूप मिश्रा ने एकबार लश्कर पश्चिम जो अब दक्षिण विधानसभा  कहलाती है वहां से भी एक और धुरन्धर कांग्रेसी नेता भगवान सिंह यादव को पटखनी देने का काम भी किया। अनूप मिश्रा को लश्कर पूर्व की सीट से भी दो कि चुनाव लड़ने का अनुभव रहा है, उन्होंने यहां से  2003 में क् रमेश अग्रवाल और 2008 में मुन्नालाल गोयल को हराकर जीत का वरण किया।

पिछले चुनाव की बात की जाए तो यह लिखने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि मध्यप्रदेश भाजपा का ये कद्दावर नेता पार्टी की अंदरूनी राजनीति को नहीं समझ सका और पार्टी के ही एक बागी प्रत्याशी को मैदान में उतरने के कारण चुनाव हार गया।

 

इस हार के कारण श्री मिश्रा का मध्यप्रदेश की राजनीति में सीधा दखल जरूर कम हो गया लेकिन उन्होंने मुरैना जैसे लोकसभा क्षेत्र से सारे राजनीतिक समीकरणों को उलटकर धमाकेदार जीत हासिल कर अपने राजनीतिक विरोधियों के षड़यंत्र को असफल कर दिया।

 

अब एकबार पुनः पार्टी को मध्यप्रदेश में इस कद्दावर नेता की जरूरत महसूस हुई है ,उन्हें पुनः उसी भितरवार से प्रत्याशी बनाया गया है जहां से वे पिछला चुनाव हार गए थे। इसबार भी बृजेंद्र तिवारी के मैदान में ताल ठोंकने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसा इसलिए क्यों कि बृजेंद्र तिवारी का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि वे आदतन हर चुनाव लड़ने के आदी रहे हैं,इसबार भी उन्हें उम्मीद थी कि भाजपा उनकी पूछपरख कर टिकट देगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ अतः आदत के मुताबिक अब श्री तिवारी फिर चुनाव में उतर सकते हैं। निःसन्देह यह स्थिति श्री मिश्रा के लिए तनावकारक होगी। 

बावजूद इसके  भितरवार की जनता के मूड और माहौल को देखकर साफतौर यह कहा जा सकता है कि बृजेंद्र तिवारी के किसान नेता की छवि अब धूमिल हो चुकी। जनता यह भली प्रकार समझ चुकी है कि श्री तिवारी चुनाव जीतने के लिए नहीं लड़ते उनका उद्देश्य केवल भाजपा के वोट काटना मात्र रहता है। अतः भितरवार की जनता अब बृजेन्द्र तिवारी जैसे नेताओं के इशारे पर अपना वोट बर्बाद करने के मूड में कतई नजर  नहीं आती दिख रही है। बावजूद इसके श्री मिश्रा को फूँक फूँक कर कदम रखने की जरूरत होगी।

 

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