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क्या मध्यप्रदेश में कुछ बड़ा होने वाला है ?दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी की नरेंद्र सिंह तोमर से चर्चा और भोपाल में मोहन यादव की राजभवन दौड़ ने बढ़ाई सियासी हलचल

प्रवीण दुबे

मध्यप्रदेश में कुछ बड़ा होने वाला है? मोदी की मध्यप्रदेश के दिग्गजों से लगातार मुलाकातें, दिल्ली में नरेंद्र सिंह तोमर से चर्चा और भोपाल में मोहन यादव की राजभवन दौड़ ने बढ़ाई सियासी हलचल
भोपाल/नई दिल्ली/मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों घटनाक्रम तेजी से करवट लेता दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा और अब विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकातों ने प्रदेश की सियासत में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये मुलाकातें ऐसे समय हो रही हैं, जब दतिया उपचुनाव में भाजपा की हार, टिकट वितरण को लेकर उठे सवाल, पार्टी के भीतर गुटबाजी और आरोप-प्रत्यारोप सार्वजनिक रूप से सामने आ चुके हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा मध्यप्रदेश के प्रमुख नेताओं से लगातार संवाद को महज सामान्य राजनीतिक मुलाकात मानना आसान नहीं है।

संसद भवन में नरेंद्र सिंह तोमर की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात

मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने मंगलवार को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। यह मुलाकात संसद भवन स्थित प्रधानमंत्री के कक्ष में हुई।
बताया जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच मध्यप्रदेश के मौजूदा राजनीतिक हालात सहित विभिन्न विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई।

नरेंद्र सिंह तोमर मध्यप्रदेश भाजपा के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। वे केंद्रीय मंत्री, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं।

वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका राजनीतिक रूप से भले ही अपेक्षाकृत तटस्थ दिखाई देती हो, लेकिन प्रदेश की भाजपा राजनीति में उनके अनुभव और प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

इससे पहले शिवराज और वीडी शर्मा से भी संवाद
नरेंद्र सिंह तोमर की मुलाकात से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा से भी मुलाकात कर चुके हैं।

एक के बाद एक मध्यप्रदेश के प्रभावशाली नेताओं के साथ प्रधानमंत्री का संवाद ऐसे समय हुआ है, जब प्रदेश भाजपा के भीतर कई घटनाक्रम तेजी से बदल रहे हैं।

सवाल यही है कि क्या यह केवल नियमित राजनीतिक संवाद है या फिर भाजपा नेतृत्व मध्यप्रदेश की मौजूदा परिस्थितियों का व्यापक फीडबैक ले रहा है?

यदि यह सामान्य मुलाकातों की श्रृंखला है तो भी इनका समय महत्वपूर्ण है। और यदि इन मुलाकातों के पीछे प्रदेश की राजनीति को लेकर कोई रणनीतिक समीक्षा चल रही है, तो आने वाले दिनों में इसके राजनीतिक परिणाम दिखाई दे सकते हैं।

उधर भोपाल में मुख्यमंत्री मोहन यादव राजभवन पहुंचे

राजभवन से निकलने के बाद पत्रकारों से चर्चा करते मुख्यमंत्री डॉ यादव 

दिल्ली में नरेंद्र सिंह तोमर की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की खबर के बीच भोपाल में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का राज्यपाल से मिलने राजभवन पहुंचना भी राजनीतिक चर्चाओं का विषय बन गया।
एक तरफ दिल्ली में प्रधानमंत्री मध्यप्रदेश के वरिष्ठ नेताओं से संवाद कर रहे हैं और दूसरी तरफ भोपाल में मुख्यमंत्री राज्यपाल से मुलाकात कर रहे हैं।

दोनों घटनाएं अपने-आप में सामान्य संवैधानिक और राजनीतिक गतिविधियां हो सकती हैं, लेकिन राजनीतिक घटनाओं का समय और उनका क्रम हमेशा महत्वपूर्ण होता है।
इसी वजह से मध्यप्रदेश के राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा नेतृत्व प्रदेश से संबंधित किसी बड़े राजनीतिक या संगठनात्मक निर्णय की तैयारी कर रहा है?

दतिया उपचुनाव ने खोली पार्टी के अंदरूनी विवाद की परतें
मध्यप्रदेश भाजपा के लिए दतिया उपचुनाव का परिणाम केवल एक चुनावी हार तक सीमित नहीं रहा। परिणाम के बाद पार्टी के अंदर से ही भीतरघात, टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व के बीच मतभेदों की चर्चाएं सामने आईं।

खास तौर पर पूर्व मंत्री और पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने के फैसले को लेकर राजनीतिक बहस तेज हुई।

दतिया जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में भाजपा की हार के बाद पार्टी के भीतर जिम्मेदारी तय करने और चुनावी रणनीति की समीक्षा की मांग उठना स्वाभाविक था।
इसके बाद प्रदेश भाजपा नेतृत्व की ओर से जांच समिति गठित किए जाने और मुख्यमंत्री स्तर पर समीक्षा बैठक किए जाने ने मामले को और गंभीर बना दिया।

दतिया की घटना ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या प्रदेश भाजपा के भीतर सब कुछ उतना सहज है, जितना बाहर से दिखाई देता है?

मुख्यमंत्री मोहन यादव को लेकर भी सवाल

इन तमाम घटनाक्रमों के बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को लेकर भी राजनीतिक विवाद बढ़ा है।
दतिया उपचुनाव के बाद मुख्यमंत्री की भूमिका और सरकार की कार्यशैली को लेकर पार्टी के भीतर और बाहर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि इन राजनीतिक आरोपों को अंतिम सत्य मानने के बजाय इन्हें राजनीतिक दावों और आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

इसी बीच इंडियन एक्सप्रेस में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से जुड़े जमीन संबंधी आरोपों पर प्रकाशित रिपोर्ट ने भी प्रदेश की राजनीति में नया विवाद पैदा किया है। सरकार और मुख्यमंत्री की ओर से इस संबंध में जो भी आधिकारिक स्पष्टीकरण या जवाब सामने आया है, उसे भी इस पूरे मामले के साथ देखा जाना जरूरी है।

यानी मुख्यमंत्री के सामने एक साथ राजनीतिक और सार्वजनिक धारणा से जुड़े कई मोर्चे दिखाई दे रहे हैं।
क्या भाजपा हाईकमान ले रहा है मध्यप्रदेश का फीडबैक?
यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रदेश के अलग-अलग प्रभावशाली नेताओं से संवाद क्या संकेत देता है?

संभावनाएं कई हो सकती हैं।

पहली संभावना—प्रदेश की राजनीतिक स्थिति की समीक्षा।
दतिया उपचुनाव और उसके बाद सामने आए मतभेदों को लेकर केंद्रीय नेतृत्व प्रदेश संगठन और सरकार की स्थिति का फीडबैक ले सकता है।
दूसरी संभावना—2028 विधानसभा चुनाव की शुरुआती तैयारी।
भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व चुनावी राज्यों में काफी पहले से राजनीतिक और संगठनात्मक समीकरणों की समीक्षा करता रहा है। मध्यप्रदेश में भी अगले विधानसभा चुनाव के लिए संगठन को मजबूत करने और सरकार की छवि को लेकर समीक्षा संभव है।
तीसरी संभावना—पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन।
शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर और वीडी शर्मा जैसे नेताओं का अपना लंबा राजनीतिक अनुभव और संगठनात्मक प्रभाव है। इन नेताओं से संवाद को प्रदेश की राजनीति में शक्ति संतुलन और भविष्य की रणनीति के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।
चौथी संभावना—सरकार और संगठन के बीच तालमेल।
यदि प्रदेश भाजपा में सरकार और संगठन के बीच किसी स्तर पर मतभेद या असंतोष है, तो केंद्रीय नेतृत्व उससे संबंधित फीडबैक ले सकता है।

क्या नेतृत्व परिवर्तन की आहट है?

यही वह सवाल है, जो फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा में है।
क्या मध्यप्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन होने वाला है?
अभी इसका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है।
प्रधानमंत्री से मुलाकात, किसी वरिष्ठ नेता का दिल्ली जाना अथवा मुख्यमंत्री का राज्यपाल से मिलना अपने-आप में नेतृत्व परिवर्तन का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
लेकिन राजनीति में कई बार बड़े फैसलों से पहले घटनाओं का एक क्रम बनता है और उसी क्रम को देखकर संभावनाओं पर चर्चा शुरू होती है।
मध्यप्रदेश में फिलहाल ऐसा ही एक क्रम दिखाई दे रहा है—दतिया उपचुनाव की हार, पार्टी के अंदर आरोप-प्रत्यारोप, गुटबाजी की सार्वजनिक चर्चा, मुख्यमंत्री को लेकर विवाद, केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता और वरिष्ठ नेताओं से प्रधानमंत्री का संवाद।

कुछ बड़ा’ आखिर क्या हो सकता है?

यदि वास्तव में भाजपा नेतृत्व मध्यप्रदेश को लेकर कोई बड़ा फैसला करता है, तो उसके कई रूप हो सकते हैं।
प्रदेश भाजपा संगठन में बदलाव
सरकार और संगठन में फेरबदल
मंत्रिमंडल में परिवर्तन
कुछ नेताओं को नई जिम्मेदारी
संगठन में शक्ति संतुलन बदलना
2028 की रणनीति के लिए नई राजनीतिक व्यवस्था
या फिर केवल मौजूदा सरकार और संगठन की व्यापक समीक्षा
इसलिए फिलहाल किसी एक संभावना को अंतिम निष्कर्ष मानना जल्दबाजी होगी।
लेकिन घटनाओं का क्रम सवाल जरूर खड़ा करता है
मध्यप्रदेश की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण चीज इस समय कोई एक मुलाकात नहीं बल्कि मुलाकातों का क्रम है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मध्यप्रदेश के प्रभावशाली नेताओं का संवाद, दतिया उपचुनाव के बाद पैदा हुई राजनीतिक परिस्थितियां, भाजपा के अंदरूनी मतभेदों का खुलकर सामने आना और उसी दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का राज्यपाल से मिलना—इन घटनाओं ने निश्चित रूप से राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है।

यह भी संभव है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व केवल स्थिति का फीडबैक लेकर मौजूदा व्यवस्था को और मजबूत करने की रणनीति बनाए। यह भी संभव है कि आने वाले दिनों में संगठन या सरकार से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण निर्णय सामने आएं।
फिलहाल सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यही है कि मध्यप्रदेश भाजपा में मंथन का दौर चल रहा है।
और यदि दिल्ली में चल रही बैठकों और भोपाल में हो रही राजनीतिक गतिविधियों का यह सिलसिला आगे भी जारी रहता है, तो आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश की राजनीति में किसी बड़े फैसले की तस्वीर और साफ हो सकती है।
सवाल इसलिए सिर्फ यह नहीं है कि नरेंद्र सिंह तोमर ने प्रधानमंत्री मोदी से क्या चर्चा की?
सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी इस समय मध्यप्रदेश के अलग-अलग शक्ति केंद्रों से लगातार संवाद क्यों कर रहे हैं?
और शायद इससे भी बड़ा सवाल—
क्या मध्यप्रदेश की राजनीति में किसी बड़े बदलाव की पटकथा लिखी जा रही है?
फिलहाल जवाब दिल्ली और भोपाल की अगली कुछ राजनीतिक गतिविधियों में छिपा है।

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