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क्रिकेट में स्तरहीन भाषा और भ्रांति से आहत हैं हिंदी कमेंट्री के पुरोधा पद्मश्री सुशील दोशी

कहा क्रिकेट खेलते हुए व इस पर बोलते हुए अपनी भाषा का भी सम्मान करें 

चर्चामंडल व केन्द्रीय पुस्तकालय ने ‘ क्रिकेट का आंखों देखा हाल ‘ विषय पर किया कार्यक्रम आयोजित

ग्वालियर/ पद्मश्री से अलंकृत हिन्दी क्रिकेट कमेंट्री के पुरोधा सुशील दोशी ने कहा है कि हमें भाषा का सम्मान करना है और किसी भी स्थिति में भाषा को बिगड़ने नहीं देना है। आज क्रिकेट में जितनी क्रांति आयी है, स्तरहीन भाषा से उतनी ही भ्रांति भी आ रही है।
श्री दोशी मंगलवार को ग्वालियर के महाराज बाड़ा स्थित केन्द्रीय पुस्तकालय में ‘ क्रिकेट का आंखों देखा हाल ‘ विषय पर केन्द्रित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। मूर्धन्य सम्पादक स्वर्गीय प्रभाष जोशी जी के क्रिकेट खिलाड़ी – लेखक सुपुत्र सन्दीप जोशी कार्यक्रम में विद्वान – वक्ता के रूप में उपस्थित थे। अध्यक्षता आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर के सम- कुलाधिपति डॉ दौलत सिंह चौहान ने की। इस आयोजन में मंच पर क्षेत्रीय ग्रंथपाल श्री राकेश कुमार शर्मा व ग्रंथपाल श्री विवेक सोनी भी उपस्थित थे।आयोजन चर्चामंडल व संभागीय केन्द्रीय पुस्तकालय ग्वालियर के संयुक्त तत्वावधान में हुआ।‌

इस अवसर पर इतिहासविद प्रोफ़ेसर संजय स्वर्णकार, क्रिकेट कमेंटेटर नवीन श्रीवास्तव, साहित्यकार माताप्रसाद शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार संजय मजूमदार, मुरैना के साहित्यकार देवेन्द्र तोमर व रामवरन शर्मा, क्रिकेट के अंपायर सुनील राजौरिया, केन्द्रीय पुस्तकालय की सहायक ग्रंथपाल पूजा साहू, हीरेन्द्र गौतम व मनोज गौड़ सहित ग्वालियर के गणमान्य खेलप्रेमी विद्वान व युवा विशेष रूप से उपस्थित रहे।
श्री दोशी ने कहा कि साल 1968 के बाद जब उन्होंने हिन्दी में क्रिकेट की कमेंटरी करना शुरू किया तो प्रारंभ में बहुत उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाएं नहीं आयी थीं, लेकिन बाद में जब बौबी तलयार खान व धर्मवीर भारती जैसे दिग्गजों ने उनकी भाषा की भूरि – भूरि प्रशंसा की तो प्रशंसक तेजी से बढ़े। हम किसी की नकल करने के बजाय अपनी मौलिकता पर भरोसा करते हैं तो अलग पहचान बनती है, भले इसमें थोड़ी देर लगे।
श्री दोशी ने हिन्दी में क्रिकेट – समाचार व विश्लेषण की मौलिक भाषा गढ़ने में प्रभाष जोशी जी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि टीआरपी से अच्छी भाषा का कोई संबंध नहीं है। जो नायक होते हैं वे लोकप्रियता की चिंता किए बिना हमेशा श्रेष्ठ उदाहरण पेश करते हैं। श्री दोशी ने बताया कि हिन्दी की गरिमा को ध्यान में रखते हुए ही उन्होंने क्रिकेट में बाउंड्री के लिए ‘सीमारेखा’ व कारीडोर आफ़ अनसर्टेनिटी के लिए ‘ शंका का गलियारा ‘ जैसा शब्द गढ़ा। क्रिकेट जैसे खेल को भारतीय समाज के मानस के अनुरूप बनाने के लिए भाषा में बहुत मौलिक शब्द ढूंढ़े गए, अन्यथा लोगों को यह विश्वास नहीं था कि फुट- पाउंड – सेकंड पद्धति की अंग्रेजी को हिन्दी में कैसे सुंदर ढंग से ढाला जा सकता है।
क्रिकेटर सन्दीप जोशी ने महात्मा गांधी और क्रिकेट पर अपना वक्तव्य केन्द्रित करते हुए कहा कि देश आजाद होने से पहले धर्म और संप्रदाय के आधार पर बनी टीमों के कारण क्रिकेट में जो तनाव आया उसे देखते हुए कभी गांधी जी ने इस खेल में टीम का नामकरण विभिन्न प्रांतों के आधार पर करने के लिए कहा होगा, लेकिन गांधी जी कभी किसी खेल के विरोधी नहीं थे। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने खेल के कई क्लब बनाये थे।
सन्दीप जोशी ने कहा क्रिकेट स्वच्छता भी सिखाता है और तहजीब भी। आज क्रिकेट में बाजार का प्रवेश हुआ है, सट्टा भी चल रहा है, लेकिन तीन सौ साल पुराना यह खेल अपने बुनियादी स्वरूप में संस्कृति और मैत्री का ही खेल है। जौन आर्लट, सर नेविल कार्ड्स सहित अनेक क्रिकेट प्रेमी लेखक व उद्घोषकों ने क्रिकेट को एक उत्कृष्ट साहित्य का दर्जा दिया है। उनके लेखन को पढ़कर ही इस खेल की संस्कृति को समझा जा सकता है। संदीप जोशी ने कहा भारत में एक समय राजे रजवाड़ों ने अंग्रेज शासकों से निकटता बढ़ाने के लिए इस खेल को बढ़ावा दिया था लेकिन अब यह खेल अभूतपूर्व ढंग से विकसित हुआ है और यह विकास अभी जारी है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर के सम- कुलाधिपति डॉ दौलत सिंह चौहान ने दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के खेल संबंधी प्रयोगों का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधीजी सामूहिक रूप से खेले जाने वाले खेलों के पक्षधर थे जिनसे अधिक से अधिक लोग एक दूसरे के निकट आ सकें। इन खेलों के माध्यम से वे सकारात्मक प्रतिरोध गढ़ना चाहते थे।क्रिकेट भी उनमें से एक है। श्री चौहान ने श्री दोशी की प्रशंसा में क्रिकेटर मुश्ताक अली के वक्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि मुश्ताक अली कहते थे उनके समय में इन्दौर की पहचान संगीत में लता मंगेशकर से , क्रिकेट में खुद उनसे और कमेंट्री में सुशील दोशी से है। खेल के वर्णन व प्रस्तुति में वस्तुनिष्ठता को महत्वपूर्ण बताते हुए डॉ चौहान ने कहा प्रभाष जोशी जी व सुशील दोशी जी जैसे संचारकों ने क्रिकेट को न केवल भारत के गांव गांव तक पहुंचाया है। अब छोटे कस्बों और गांवों से प्रतिभाएं क्रिकेट में आ रही हैं।
केन्द्रीय पुस्तकालय के ग्रंथपाल विवेक सोनी ने पुस्तकालय का इतिहास बताते हुए कहा कि रियासत के दौर में स्थापित यह पुस्तकालय मध्यप्रदेश के सम्भागीय पुस्तकालयों में सबसे ज्यादा आधुनिक व डिजिटल है। स्मार्ट सिटी परियोजना में इसका कायाकल्प हुआ है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए चर्चामंडल के संयोजक जयन्त सिंह तोमर ने कहा कि गत पंद्रह वर्ष से सक्रिय चर्चामंडल विद्वानों व श्रोताओं को एक साथ जोड़ने का काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि क्रिकेट की अपनी एक शास्त्रीयता है, इस पर संस्मरण आधारित श्रेष्ठ साहित्य रचा गया है।‌ खेलप्रेमियों को इस साहित्य से भी परिचित होना जरूरी है।
कार्यक्रम में अतिथियों व सुधी श्रोताओं का आभार प्रदर्शन डॉ मनोज भटेले ने किया।

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