खेलों के क्षेत्र में अपनी चौधराहट हासिल करने का सपना देख स्वप्न देख रहे चीन को अमेरिका ने झटका दिया है। अमेरिकाने टोक्यो ओलंपिक में सर्वाधिक मेडल जीते हैं और वह 100 से अधिक मेडल जीतने वाला इकलौता देश रहा । ओलंपिक खेलों के अंतिम दिन सर्वाधिक गोल्ड मेडल जीतने की दौड़ में चीन और अमेरिका के बीच नज़दीकी मुक़ाबला रहा.ये दौड़ चीन के लिए ख़ास तौर पर अहम है क्योंकि चीन ने 1984 में ओलंपिक में फिर से शामिल होने के बाद से अपने देश के युवाओं को ओलंपिक में श्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया है.
रविवार को टोक्यो में ओलंपिक का आख़िरी दिन शुरू होने से पहले चीन 38 गोल्ड मेडल जीत चुका था जबकि अमेरिका के पास 36 गोल्ड मेडल थे.
लेकिन रविवार दोपहर जब कुछ इवेंट ही बाक़ी रह गए थे, अमेरिका ने 39 गोल्ड मेडल हासिल कर लिए.
अमेरिका ने महिला बॉस्केटबॉल और महिला वॉलिबॉल के गोल्ड मेडल जीत लिए. साथ ही अमेरिकी एथलीट जेनिफ़र वेलेंते ने ट्रैक साइक्लिंग का गोल्ड जीत लिया. इस तरह अमेरिका एक गोल्ड मेडल से आगे हो गया.0

आख़िरी दिन चीन के पास भी दो गोल्ड मेडल जीतने के मौक़े थे लेकिन चीन की रिदिम जिमनास्टिक टीम चौथे नंबर पर रही जबकि महिलाओं के मध्यवर्ग वज़न मुक़ाबले में चीन की ख़िलाड़ी रजत पदक ही जीत सकी.
अमेरिका ने 39 स्वर्ण, 41 रजत और 33 कांस्य पदक जीते हैं. इस तरह अमेरिका को टोक्यो ओलंपिक में कुल 113 मेडल मिले. वहीं चीन को 38 स्वर्ण, 32 रजत और 18 कांस्य पदक मिले हैं. टोक्यो ओलंपिक में चीन को कुल 88 पदक मिले और इसके साथ ही वो दूसरे स्थान पर है. तीसरे नंबर पर रूसी ओलंपिक समिति और चौथे नंबर पर ब्रिटेन है. रूस को कुल 71 पदक मिले हैं और ब्रिटेन को 65. मेज़बान जापान स्वर्ण पदक के मामले में तीसरे नंबर पर है और कुल पदक के मामले में पाँचवे नंबर पर.
अमेरिका के रिचर्ड टोरेज़ जूनियर सुपर हैवीवेट फ़ाइनल में गोल्ड नहीं जीत सके. लेकिन उनके मुक़ाबले से पहले ही अमेरिका ने सर्वाधिक गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिए थे.
टोरेज़ ने इस मुक़ाबले में रजत पदक जीता. उन्होंने इस बार चार मेडल जीतने का प्रयास किया जो 2000 सिडनी ओलंपिक के बाद बॉक्सिंग में अमेरिका का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था.
चीन ने अपने आप को स्पोर्ट्स सुपर पावर बनाने के लिए अधिकारिक कार्यक्रम शुरू किया था जिसे गोल्ड मेडल स्ट्रैटिजी या स्वर्ण जीतने की रणनीति कहा जाता है. इसके तहत चीन में हज़ारों स्पोर्ट्स स्कूल खोले गए हैं.
चीन में कोच शहरों और गाँवों में प्रतिभाओं की तलाश करते हैं और फिर चयनित खिलाड़ियों की प्रतिभा को निखारते हैं.

टेबल टेनिस और बैडमिंटन जैसे खेलों में चीन पारंपरिक तौर पर मज़बूत है ही. इसके अलावा चीनी कोच उन खेलों में खिलाड़ियों पर ख़ासतौर पर ध्यान देते हैं, जिनमें पश्चिमी देश पिछड़ रहे हैं या जिन पर पश्चिमी देशों में ख़ास ध्यान नहीं दिया जाता है.
उदाहरण के तौर पर महिला खेलों या ऐसे खेल जो बहुत हाई प्रोफ़ाइल नहीं है लेकिन जिनमें अधिक मेडल दांव पर लगे होते हैं, चीन उनमें अपने खिलाड़ी उतारता है और उन्हें इसके लिए ख़ास तौर पर तैयार करता है.
ऐसे इवेंट जिनमें कई वज़न वर्ग होते हैं, उनमें भी चीन खिलाड़ी उतारता है.
चीन के लिए ये बहुत मायने नहीं रखता है कि इन खेलों की कोई वास्तविक लोकप्रियता देश में है या नहीं.
चीन के खेल स्कूलों में महिलाओं के भारोत्तोलन, ताईक्वांडो और नौकायन जैसे खेलों के लिए प्रतिभा तलाशने के लिए ख़ास कार्यक्रम शुरू किए गए. इन स्कूलों से पहले इन खेलों के प्रति कोई रुचि नहीं थी.
2008 बीजिंग ओलंपिक में अपने देश में खेल रहे चीन के खिलाड़ियों ने सर्वाधिक गोल्ड मेडल जीत कर चीन को नंबर एक पर पहुँचा दिया था. लेकिन लंदन 2012 और रियो 2016 ओलंपिक खेलों में चीन अपना पहला स्थान बरकरार नहीं रख सका. चीन में खेलों की व्यवस्था परचीन के स्पोर्ट्स स्कूलों के चुनिंदा बच्चे ही शीर्ष तक पहुंच जाते हैं और जीत हासिल करते भी हैं, उनके लिए भी नौकरी की गारंटी नहीं होती है.
चीन के अधिकारियों और खेल जगत से जुड़े लोगों ने इस बात पर ज़ोर दिया कि वो देश में लोगों के स्वास्थ्य को सुधारने के लिए खेल संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं. बावजूद इसके ओलंपिक में सोना जीतने की भूख़ बरक़रार रही.
टोक्यो में इसका नतीजा भी देखने को मिला है. चीन ने उन खेलों में गोल्ड मेडल जीते हैं जिनमें उसका पहले भी दबदबा रहा है. जैसे कि भारोत्तोलन, गोताखोरी, जिमनास्टिक और टेबल टेनिस. इसके अलावा चीन ने नौकायन, साइक्लिंग, एथलेटिक्स आदि में भी जीत हासिल की है. चीन ने अधिकतर गोल्ड मेडल महिला वर्ग में या फिर मिश्रित टीम इवेंट्स में जीते हैं.