
सबसे बड़ा सवाल मध्यप्रदेश में संगठनात्मक रूप से मृत पड़ी कांग्रेस में जान डाल पाएगा यह परिवर्तन
प्रवीण दुबे
इसबार मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस हाईकमान अपने सारे मोर्चे मजबूत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहा। जो लम्बे समय से नहीं हुआ वो किया जा रहा है। अभी प्रदेश अध्यक्ष और चुनाव संचालन समिति में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य को कमान सौंपे एक माह का भी समय नहीं गुजरा कि आज 20 जिलाध्यक्षों को बदलने की लिस्ट जारी कर दी गई इतना ही नहीं मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति में गुटबाजी के सूत्रधार दिग्विजयसिंह और ब्राह्मण छत्रप सुरेश पचौरी की भी चुनावी भूमिकाओं को कांग्रेस ने तय कर करके भले ही संतुलन कायम करने की कोशिश की है लेकिन यह कोशिश कितनी कारगर होगी यह आने वाला समय ही बताएगा। वैसे मध्यप्रदेश कांग्रेस का जो चाल चरित्र चेहरा रहा है उसे देखकर सन्तुलन का कारगर रहना बेमानी सा लगता है। ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है कि पार्टी ने भले ही ज्योतिरादित्य कमलनाथ दिग्विजयसिंह पचौरी जैसे नेताओं को साधने की कोशिश की है लेकिन अरुण यादव, अजयसिंह जैसे कई नाम ऐसे हैं जिन्हें तवज्जो नहीं मिलने से बगावत के स्वर सुनाई देने लगे हैं।
पार्टी ने आज जो 20 जिलाध्यक्ष बदले हैं उनमें भी बहुत कुछ नया करने की कोशिश की गई है। लगातार 15 वर्षों से सत्ता से बाहर चल रही कांग्रेस का मध्यप्रदेश में जिलास्तरीय संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है। कार्यकर्ता व नेता न केवल निरुत्साहित हैं बल्कि उनमें विपक्ष जैसी संघर्षशीलता कतई नजर नहीं आती ।
किसी भी राजनीतिक दल की संगठनात्मक मजबूती में अहम भूमिका निभाने वाले युवा और महिलाओं जैसे कारक कांग्रेस से कहीं दूर छिटक से गये हैं। यही वजह है कि एक समय कांग्रेस की सबसे मजबूत कड़ी माने जाने वाले महिला कांग्रेस युवक कांग्रेस NSUI जैसे संगठन पूरी तरह मृतप्राय नजर आते हैं। नए जिलाध्यक्ष इसमें कितनी जान डाल पाएंगे फ़िलहाल इसको लेकर सन्देह है।
देवेंद्र के नाम ने सबको किया आश्चर्यचकित
आज कांग्रेस द्वारा प्रदेश के 20 जिलों में बदले गए जिलाध्यक्षों में एक नाम ऐसा भी है जो खासा चर्चा में है यह नाम है कांग्रेस चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के गृह जिले ग्वालियर के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष देवेंद्र शर्मा का इस नाम का अचानक जिलाध्यक्ष पद पर आना पूरी कांग्रेस को आश्चर्यचकित कर गया। ऐसा इसलिए कतई नहीं कि देवेंद्र शर्मा में राजनीतिक कौशल की कोई कमी है वे छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़े रहे हैं हां इतना जरूर है कि उनमें उस राजनीतिक आक्रामकता की कमी अवश्य है जिसकी कि आज कांग्रेस को जरूरत है श्री शर्मा सहज सरल स्वभाव के लिए जाने जाते हैं।
यह नाम इस कारण आश्चर्यचकित कर गया क्यों कि जब रमेश अग्रवाल जैसा महल समर्पित व ज्योतिरादित्य से अति निकटता रखने वाला नेता सामने था फिर देवेंद्र का नाम जिलाध्यक्ष पड़ पर कैसे तय हो गया।
इस घटनाक्रम का साफ तौर पर यह संकेत है कि कांग्रेस ने यह निर्णय पूज्य शंकराचार्य स्वामी स्वरूपा नन्द के दवाब में लिया है। यहां बताना उपयुक्त होगा कि श्री शर्मा पूज्य शंकराचार्य के न केवल शिष्य हैं बल्कि वे लम्बे समय से ग्वालियर में उन्ही के निवास पर रुकते भी रहे हैं। इस घटनाक्रम ने इस बात के भी संकेत दे दिए हैं कि कर्नाटक और अन्य राज्यों की तरह मध्यप्रदेश में भी हिंदू वोटों को रिझाने के लिए कांग्रेस बड़े साधू सन्तों का को कैसे इस्तेमाल किया जाए इसकी रणनीति तैयार कर रही है। गौरतलब है कि दिग्विजयसिंह भी शंकराचार्य के शिष्य हैं हो सकता है सिंधिया खेमें में सेंधमारी करने के लिए देवेंद्र शर्मा का नाम शकराचार्य जी के माध्यम से उन्हीं के द्वारा आगे किया हो जिसमें ज्योतिरादित्य न चाहते हुए भी कुछ नहीं बोल सके।