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जिस शहर में अटल राजमाता जैसे तमाम नेताओं ने दिया त्याग का सन्देश वहां प्रत्याशी चयन में छूट रहे हैं पसीने

प्रवीण दुबे

जनसंघ  के निर्माण के समय से भारतीय जनता पार्टी बनने तक और वर्तमान में भाजपा के स्वर्णिम काल के सफर तक मध्यप्रदेश के शहर ग्वालियर का विशेष योगदान रहा हैं। अटलजी राजमाताजी जैसी तमाम विभूतियों ने इसी शहर से पार्टी को न केवल नई ऊंचाइयां प्रदान की बल्कि यह भी संदेश दिया की संगठन के सामने व्यक्तिगत महत्वाकांछा को कोई स्थान नहीं होता।  लेकिन इसे विडम्बना ही कहा जाएगा की आज उसी ग्वालियर में भाजपा नेताओं का व्यक्तिगत।  स्वार्थ इतना सर चढ़कर बोलता दिखाई दे रहा है कि पार्टी हाईकमान को प्रत्याशी चयन करने में पसीने  छूटते नजर आ रहे हैं।

मध्यप्रदेश में नवंबर में होने वाले विधानसभा  चुनाव को लेकर  ग्वालियर जिले में सत्ताधारी दल भाजपा के  सामने प्रत्याशियों का  चयन सिरदर्द  बनता दिखाई दे रहा है। जिले की विधानसभा सीटों पर एक तरफ नेतापुत्रों की आहट है तो दूसरी ओर एक एक सीट पर ताल ठोंकते कई दिग्गज  पार्टी हाईकमान के लिए परेशानी का सबब बन गए हैं।

उल्लेखनीय है कि ग्वालियर में विधानसभा की कुल 6 सीटें हैं । इन सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है। भले ही कांग्रेस भाजपा को टक्कर देती रही है लेकिन इस शहर में हमेशा भाजपा का ही दबदबा रहा है। यहां से तमाम ऐसे नेता निकले जिन्होंने प्रदेश ही नहीं देश में अपनी पहचान बनाई। है।

शायद यही वजह है कि अब इस शहर में जहां पुरानी पीढ़ी के भाजपा नेताओं की बड़ी संख्या सामने दिखाई देती है तो दूसरी ओर युवा नेताओं की एक नई पीढ़ी भी सामने आ चुकी है। इनमें पुराने नेताओं के पुत्र भी बड़ी संख्या में मुस्कराते दिखाई दे रहे हैं।

यही वह वजह है कि भाजपा का गढ़ कहे जाने वाले इस शहर में विधानसभा चुनाव के लिये प्रत्याशी चयन एक बड़ी समस्या बनता दिखाई दे रहा है। लगभग सभी  छह की छह विधानसभा में एक से अधिक दावेदार टिकट की दौड़ में हैं। इतना ही नहीं जो वातावरण बनाया जा रहा है उसे देखकर यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि जिसे टिकट नहीं मिला वही नाराज होकर पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है। कम से कम तीन विधनसभा में तो बागी प्रत्याशी की आहट को साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है।

आज अकेले ग्वालियर की विधानसभा सीटों पर नजर दौड़ाई जाए तो रोंगटे खड़े कर देने वाली तस्वीर उभरकर सामने आती है। आखिर किसे टिकट दिया जाए और किसका टिकट काटा जाए इस कार्य को अंजाम देना पार्टी नेतृत्व के लिए बहुत मुश्किल लगता है। अलग अलग विधानसभा पर नजर दौड़ाने पर पता चलता है कि सब कुछ उतना आसान नहीं कि केवल रायशुमारी या एक दो दिन के प्रवास  अथवा टिकट काटने मात्र से हल हो जाएगा।
ग्वालियर पूर्व विधानसभा
ग्वालियर पूर्व विधानसभा की बात करें तो यहां सिटिंग एमएलए मायासिंह के अलावा  आधा दर्जन के लगभग नेता टिकिट के लिए ताल ठोंकते दिख रहे हैं। वर्तमान एमएलए मायासिंह की बात की जाय तो कार्यकर्ताओं के बीच वह पूरी तरह सर्वमान्य नहीं कही जा सकती पिछले चुनाव का रिकार्ड देखें तो वह मात्र 1147 मतों से ही जीत सकीं थीं। गौर करने वाली बात यह है कि 2112 मत नोटा के सामने आए थे यदि यह वोट कांग्रेस को मिल जाते तो परिणाम उसके पक्ष में होता।
सिटिंग एमएलए की अलोकप्रियता के अलावा पार्टी के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है टिकिट मांगने वालों की भीड़। सबसे बड़ी समस्या तो पार्टी के एक युवा नेता सतीश सिंह सिकरवार ने खड़ी कर दी है। जिस तरह की जानकारी सामने आई है उसके मुताबिक श्री सिकरवार ने साफ तौर पर यह संकेत दिए हैं कि पार्टी टिकट देती है तो ठीक नहीं तो वह निर्दलीय अथवा किसी अन्य दल (बसपा) से चुनाव में उतर सकते हैं। इसके अलावा यहां से मुरैना सांसद अनूप मिश्रा, पूर्व साडा अध्यक्ष जयसिंह कुशवाह जैसे दमदार पार्टी नेता भी टिकट की लाइन में हैं ।
ग्वालियर दक्षिण विधानसभा
 इस विधानसभा की बात की जाए तो सामाजिक वजनदारी के आधार पर वर्तमान विधायक नारायण सिंह टिकट की दौड़ में हैं लेकिन बीते पांच वर्षों में कोई भी ऐसी उपलब्धि उनके नाम नहीं है जिसको आधार बनाकर वे जनता से वोट मांग सकें । इस विधानसभा में भी टिकिट की चाह रखने वालों में कई बड़े नाम पार्टी के लिए समस्या बने हुए हैं जिनमें पूर्व महापौर समीक्षा गुप्ता, जी डी ए अध्यक्ष अभय चौधरी वर्तमान महापौर विवेक शेजवलकर, रविंद्र राजपूत आदि शामिल है।
मुरार विधानसभा
मुरार विधानसभा से सिटिंग विधायक भारत सिंह में पुनः चुनाव जीतने का दमखम दिखाई नहीं देता बड़ा इलाका किसान बाहुल्य होने से भी पार्टी को समस्या आएगी सबसे बड़ी समस्या तो यहां से पार्टी के पुराने किसान नेता महेंद्र यादव ने खड़ी कर दी है वे मुखर होकर टिकट की मांग कर रहे हैं। वे लम्बे समय से अपनी अनदेखी से नाराज हैं पार्टी नेतृत्व को उन्हें समझाना एक बड़ी समस्या कही जा सकती है। इनके अलावा एक दो नाम ओर भी हैं जो टिकट मांग रहे हैं।
उपनगर ग्वालियर विधानसभा
यहां से पार्टी के दिग्गज नेता जयभान सिंह विधायक हैं। वे वर्तमान में प्रदेश सरकार में केबिनेट मंत्री का ओहदा सम्भाल रहे हैं क्षेत्र में लोकप्रियता और काम दोनों ही दृष्टि से टिकट की दावेदारी उनके पक्ष में है बावजूद इसके गुटबाजी और नरेंद्र सिंह तोमर से रिश्तों की खटास उनके  व पार्टी नेतृत्व दोनों के लिए ही परेशानी बन गई है। इस विधानसभा से भी टिकट के दावेदार कम नहीं है यहां से वेदप्रकाश शर्मा , सुनीता शिवहरे, राकेश जादौन, वेदप्रकाश शिवहरे जैसे नेता टिकट की दौड़ मैं कहे जा सकते हैं।
भितरवार विधानसभा
विशुद्ध ग्रामीण इलाकों में शुमार यह विधानसभा पार्टी के लिए खासा सिरदर्द कही जा सकती है। पिछले चुनाव  में भाजपा के ही एक बागी प्रत्याशी बृजेंद्र तिवारी के कारण भाजपा के दिग्गज नेता अनूप मिश्रा को यहां से हार का मुंह देखना पड़ा था और कांग्रेस जीत गई थी। इस बार भी भाजपा के लिए यहां की राह इस कारण आसान नहीं क्योंकि वोटों का गणित बिगाड़ने मैं माहिर बृजेन्द्र तिवारी को पार्टी मना नहीं सकी है। वे इसबार भी चुनाव में कूदने का मन बनाते दिख रहे हैं। जो भाजपा के लिए घातक है। दूसरी और यहां से टिकिट की चाह रखने वालों में कई बड़े नाम हैं जिनमें बालेंदु शुक्ल, अनूप मिश्रा,लोकेंद्र पाराशर, अशोक पटसारिया  आदि शामिल है। यहां बसपा का भी वोटबैंक मौजूद होने से मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है यह बात भाजपा नेतृत्व को ध्यान रखना होगी।
डबरा विधानसभा
ग्वालियर से दूर होने और अधिकांश इलाका ग्रामीण होने के कारण इस विधानसभा का नेचर ग्वालियर से अलग है रिजर्व सीट का भी इसपर ब्यापक असर रहता है। भाजपा के लिए यहां बसपा सबसे बड़ी मुसीबत कही जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होना चाहिए यहाँ दमदार प्रत्याशी की खोज भाजपा नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द होगा।
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