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टिकट वितरण को लेकर अपने ही निर्णयों को बदलने मजबूर होता मध्यप्रदेश भाजपा नेतृत्व

 

मध्यप्रदेश भाजपा में थमने का नाम नहीं ले रहा घमासान

अपने अनुशासन और संगठनात्मक निर्णयों पर अडिग रहने वाली भारतीय जनता पार्टी क्या अब इन विषयों को लेकर सिद्धान्तों से समझौता करने को तैयार है। क्या इसी के चलते हाल ही में मध्यप्रदेश में घोषित प्रत्याशियों में से कुछ के नाम व चुनाव क्षेत्र बदले जा सकते हैं ? यह सवाल अब भाजपा के तमाम कार्यकर्ताओं, शुभ चिंतकों के जहन में रह रहकर कौंध रहे हैं।

 

उल्लेखनीय है कि भाजपा द्वारा मध्यप्रदेश में अब तक घोषित किये गए लोकसभा प्रत्याशियों में से जहां तमाम को लेकर घमासान और बगावत के सुर सुनाई दे रहे हैं वहीं दूसरी और शीर्ष नेतृत्व भी इन बगावती तेवरों के आगे  टिकट बदलने, चुनाव क्षेत्र  परिवर्तित करने और  जीतने वाला प्रत्याशी का नाम सामने होने के बावजूद दूसरे पक्ष के दबाव व लामबंदी के कारण घोषित न करने की स्थिति में दिखाई दे रहा है। 

 

इसका जीता जागता उदाहरण ग्वालियर शहडोल भोपाल मुरैना आदि स्थानों पर देखने को मिल रहा है। शहडोल की बात करें तो यहां से पार्टी ने पहले जल्दबाजी में स्थानीय नेता ज्ञान सिंह की जगह हाल ही में कांग्रेस से भाजपा में आईं हिमाद्रि सिंह को प्रत्याशी घोषित कर दिया। अब जबकि ज्ञानसिंह व तमाम स्थानीय नेता बगावत पर उतर आए तो पार्टी हाई कमान के हाथ पैर फूले हुए हैं। डेमेज कंट्रोल के नाम पर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह को शहडोल भेज गया तो उनके द्वारा इस बात के संकेत दिए गए कि पार्टी यहां से एक दो दिन में कोई निर्णय लेने जा रही है साफ है हिमाद्रि सिंह का टिकट वापस लिया जा सकता है। पहले प्रत्याशी घोषित करने में जल्दबाजी करने की गलती और अब दबाव में टिकट वापस लेने की दूसरी गलती करने की तैयारी।

 

कमोबेश यही स्थिति ग्वालियर अंचल की तीन लोकसभा सीटों को लेकर पार्टी नीतिनिर्धारकों ने निर्मित कर रखी है। यहां पार्टी के वजनदार केंद्रीय मंत्री ने पहले अपना लोकसभा क्षेत बदलने की बड़ी गलती की और फिर इसकी घोषणा भी पार्टी ने बिना सोचे समझे जल्दबाजी में कर डाली। अब इसको लेकर बवाल उठ खड़ा हुआ है। इसी के चलते

ग्वालियर अंचल की तीन लोकसभा सीटों पर भाजपा जहां प्रत्याशी घोषित नहीं कर सकी है वहीं पार्टी के भीतर से जिस प्रकार की खबरें छनकर बाहर आ रही हैं उसे देखकर इस बात की आशंका बढ़ गई है कि पार्टी मुरैना से घोषित प्रत्याशी नरेंद्र तोमर का लोकसभा क्षेत्र भी बदल सकती है। यदि ऐसा होता है तो अंचल की सभी लोकसभा सीटों पर असमंजस के हालात पैदा हो जाएंगे।

 

ग्वालियर लोकसभा सीट की बात करें तो पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भली प्रकार यह जानता है कि यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों के लिए महल एक बहुत बड़ा फेक्टर , दोनों ही दलों में से जो भी  उम्मीदवार घोषित करने की पहल करता है उसकी जीत पक्की हो जाती है। ऐसा इसलिए क्यों कि महल का सदैव यह सिद्धांत रहा है कि वहां से कभी भी दो प्रत्याशी आमने सामने नहीं आते। 

भाजपा की तरफ से यशोधरा राजे हैं तो कांग्रेस से ज्योतिरादित्य और प्रियदर्शिनी राजे जैसे नाम सम्भावित हैं। आश्चर्यजनक यह है कि भाजपा पार्टी के भीतर से ही ग्वालियर के महापौर विवेक शेजवलकर को प्रत्याशी बनाए जाने के लिए एक वर्ग विशेष द्धारा की जा रही लॉबिंग का शिकार होना पड़ रहा है। यदि कांग्रेस ने पहल करते हुए महल से प्रियदर्शिनी या ज्योतिरादित्य का नाम घोषित कर दिया तो भाजपा के लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है। 

 

उधर भिंड में भी असमंजस के हालात हैं यहां से घनश्याम पिरोनिया, अशोक अर्गल जैसे नेताओं के नाम किनारे कर सन्ध्या राय को मैदान में उतारना भी अब भाजपा के लिए परेशानी का कारण बनता दिख रहा है यहां पार्टी के सामने चौतरफा भीतरघात का खतरा मंडरा गया है।

 

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