मयंक चतुर्वेदी
एशिया कप 2025 के छठे मुकाबले में भारत और पाकिस्तान के बीच आज यानी 14 सितंबर (रविवार) को महामुकाबला होने वाला है। इस मैच की शुरुआत आज रात 8 बजे से होगी, जो दुबई के दुबई इंटरनेशनल स्टेडियम में खेला जाएगा। किंतु भारत में अधिकांश जन भावनाएं इस मैच के विरोध में हैं । क्योंकि भारत में क्रिकेट केवल खेल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और सामूहिक चेतना का प्रतीक है।
यही कारण है कि जब किसी विवादित परिस्थिति में भारत-पाकिस्तान मैच आयोजित किया जाता है, तो यह महज़ मनोरंजन का आयोजन नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक प्रश्नों का केंद्र बन जाता है। इसीलिए ही आज देश के अधिकांश नगरों में इस मैच को लेकर विरोध हो रहा है, आम जनमानस बीसीसीआई को कोस रहा है और यह मांग कर रहा है कि भारतीय क्रिकेट टीम बहिष्कार कर जनता के साथ खड़ी हो। इस परिस्थिति को गहराई से समझने के लिए हमें सामाजिक, ऐतिहासिक और वर्तमान संदर्भों को जोड़कर देखना होगा।
क्रिकेट भारतीय जनमानस में भावनाओं का प्रतीक है। समाजशास्त्री पियरे बोरड्यू के अनुसार, खेल “सामाजिक पूंजी” का निर्माण करते हैं, अर्थात वे सामूहिक मूल्यों और पहचान को गढ़ते हैं। यही कारण है कि भारत-पाक मैच अक्सर महज़ खेल न रहकर राजनीतिक संबंधों और राष्ट्रीय भावनाओं का आईना बन जाता है। जनता जब किसी मैच का विरोध करती है, तो यह संकेत है कि यह आयोजन उन्हें उनके राष्ट्रीय स्वाभिमान के विपरीत प्रतीत हो रहा है।
बीसीसीआई की भूमिका यहाँ सबसे अधिक आलोचना के घेरे में है। Journal of Sport & Social Issues (2018) में यह कहा गया है कि “खेल संस्थाएँ तभी वैधता बनाए रख पाती हैं, जब वे जनभावनाओं और राष्ट्रीय परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित करती हैं।” केवल आर्थिक हित और प्रसारण अधिकारों पर आधारित निर्णय लेना, और जनता की असहमति की अनदेखी करना, बीसीसीआई की सामाजिक वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
हाल की घटनाएँ इस आलोचना को और सशक्त बनाती हैं। 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकवादी हमले में 26 निर्दोष नागरिक मारे गए, जिनमें उत्तर प्रदेश के शभम द्विवेदी भी शामिल थे। उनकी पत्नी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि भारत-पाकिस्तान मैच खेलना उन बलिदानों का अपमान है। इसी हमले के जवाब में भारत ने ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ चलाकर सैन्य कार्रवाई की, किंतु इसके बावजूद पाकिस्तान से क्रिकेट खेलना आम जनता को असंवेदनशील निर्णय लगता है। महाराष्ट्र में शिवसेना (UBT) ने ‘सिंदूर रक्षा आंदोलन’ की घोषणा की, जिसमें महिलाओं से कहा गया कि वे प्रधानमंत्री को सिंदूर भेजें, ताकि उन्हें याद दिलाया जा सके कि पहलगाम हमले में कितनी महिलाओं का सिंदूर मिट गया।
दिल्ली में आप ने केंद्र सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया और चेतावनी दी कि क्लबों, बार और रेस्तरांओं में इस मैच का प्रसारण रोका जाएगा। यहां तक कि आईपीएल टीम पंजाब किंग्स ने भी सोशल मीडिया पर पाकिस्तान का नाम लिए बिना ही पोस्ट किया, जो सांकेतिक विरोध का उदाहरण है।
एतिहासिक नजरिए से भी देखें तो खेलों का बहिष्कार राष्ट्रीय संदेश देने का प्रभावी माध्यम रहा है। 1964 टोक्यो ओलंपिक में दक्षिण अफ्रीका को रंगभेद की नीति के कारण निष्कासित किया गया। 1980 मॉस्को ओलंपिक में अमेरिका और सहयोगी देशों ने सोवियत संघ के अफगानिस्तान आक्रमण का विरोध करते हुए भाग नहीं लिया। 1996 वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज ने श्रीलंका में आतंकी घटनाओं के चलते अपने मैच खेलने से इनकार किया। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि खेल कभी भी शून्य-राजनीतिक नहीं होते, बल्कि अक्सर नैतिक-राजनीतिक हस्तक्षेप के मंच बनते हैं।
आज की स्थिति में बहिष्कार के संभावित परिणामों को भी ध्यान में रखना होगा। आर्थिक दृष्टि से बीसीसीआई और प्रसारकों को हानि होगी, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है, और कूटनीतिक तनाव भी बढ़ सकता है। परंतु दूसरी ओर, जनता की भावनाओं के साथ खड़ा होना खिलाड़ियों की नैतिक प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान को और ऊँचाई देता, जो उन्होंने अवसर रहने और समय होने के बाद भी नहीं किया । महात्मा गांधी के “असहयोग” सिद्धांत के अनुरूप, जब व्यवस्था अन्यायपूर्ण या असंवेदनशील प्रतीत हो, तो असहयोग स्वयं में एक नैतिक संघर्ष का रूप ले लेता है।
वास्तव में यह बहस केवल एक मैच तक सीमित नहीं है। विचार करें, राजनीतिक स्थितियों में ये मैच यदि कांग्रेस के शासन के दौरान होता, तब क्या भाजपा जो सत्ता में है, उसकी यही प्रतिक्रिया होती जो अभी है? या उसकी राजनीतिक इच्छा शक्ति कुछ ओर कहती ?
यहां प्रश्न इस बात का भी है कि क्या भारत में खेल संस्थाएँ और खिलाड़ी जनता की भावनाओं तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हैं, या आर्थिक व राजनीतिक दबावों को। जब देशभर में विरोध की आवाज़ें गूंज रही हों, पीड़ित परिवार अपनी पीड़ा को सार्वजनिक रूप से व्यक्त कर रहे हों, और राजनीतिक दल सड़कों पर आंदोलन कर रहे हों, तब तो कम से कम बीसीसीआई को समझना चाहिए, सिर्फ उसे ही क्यों प्रत्येक भारतीय क्रिकेट टीम के सदस्य को यह बात समझनी चाहिए थी कि बहिष्कार केवल खेल का त्याग नहीं, राष्ट्र के जनमानस के साथ खड़े होने की यह हमारी निर्णायक भूमिका है ।
वस्तुत: यह कदम न केवल भारत के खेल इतिहास में एक नया अध्याय लिखता, बल्कि यह संदेश भी देता कि जब खेल और राष्ट्रहित आमने-सामने हों, तो राष्ट्रहित ही सर्वोच्च होता है और यही आगे भी होना चाहिए! किंतु दुख वह अवसर हमने खो दिया !!!