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दतिया उपचुनाव: स्थानीय उत्साह फीका, बाहरी नेताओं का डेरा… क्या भाजपा के लिए खतरे की घंटी?

प्रवीण दुबे 

दतिया 25 जुलाई 2026/दतिया विधानसभा उपचुनाव अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। मतदान में महज पांच दिन शेष हैं, लेकिन चुनावी माहौल को देखकर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर भाजपा को स्थानीय कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बजाय बाहरी नेताओं के सहारे चुनाव क्यों लड़ना पड़ रहा है?

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह लगातार दतिया में डेरा डाले हुए हैं। ग्वालियर से जिला कार्यकारिणी, मंडल पदाधिकारियों और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को प्रतिदिन दतिया भेजा जा रहा है।

पार्टी स्तर पर पूरी ताकत झोंककर चुनावी घेराबंदी की जा रही है। सवाल यह है कि यदि स्थानीय संगठन पूरी तरह सक्रिय और उत्साहित है तो इतनी बड़ी संख्या में बाहरी नेताओं और कार्यकर्ताओं की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं और आम दतियावासियों में चुनाव को लेकर पहले जैसा उत्साह दिखाई नहीं दे रहा।

कई स्थानों पर चुनावी गतिविधियां अपेक्षित ऊर्जा से दूर नजर आ रही हैं। स्थानीय स्तर पर जो जोश भाजपा की पहचान माना जाता था, वह इस बार फीका दिखाई दे रहा है।

स्थिति तब और चर्चा में आ गई जब ज्योतिरादित्य सिंधिया दतिया पहुंचे। उनके साथ भी ग्वालियर के नेताओं और समर्थकों का बड़ा जमावड़ा दिखाई दिया। लेकिन चुनावी मंच पर दतिया के सबसे बड़े जनाधार वाले नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा और उपचुनाव के प्रभारी तथा ग्वालियर सांसद भारत सिंह कुशवाह  की अनुपस्थिति ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया।

उधर कांग्रेस इस पूरे मुद्दे को आक्रामक तरीके से जनता के बीच उठा रही है। कांग्रेस लगातार प्रचार कर रही है कि भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी दतिया की राजनीति का नया और अपरिचित चेहरा हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भी सार्वजनिक सभा में भाजपा प्रत्याशी को मंच पर बुलाकर उनके दतिया के लिए नए होने पर व्यंग्य कर चुके हैं। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ।कांग्रेस का यह प्रचार भाजपा के लिए चुनौती बनता दिखाई दे रहा है।

अब जबकि मतदान में केवल पांच दिन शेष हैं, ऐसे समय स्थानीय कार्यकर्ताओं की कथित उदासीनता, बाहरी नेताओं का अभूतपूर्व जमावड़ा, बड़े स्थानीय नेताओं की मंच से दूरी और विपक्ष के लगातार हमलों ने उपचुनाव को बेहद रोचक बना दिया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा अंतिम पांचदिनों में स्थानीय कार्यकर्ताओं और मतदाताओं का भरोसा पूरी तरह अपने पक्ष में कर पाएगी, या फिर यह चुनाव संगठन की ताकत से ज्यादा राजनीतिक समीकरणों की परीक्षा बनकर रह जाएगा?

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