Homeश्रद्धाजंलिबहुमुखी प्रतिभा के धनी कर्मयोगी पत्रकार माणिकचन्द्र वाजपेयी मामाजी

बहुमुखी प्रतिभा के धनी कर्मयोगी पत्रकार माणिकचन्द्र वाजपेयी मामाजी

मध्यप्रदेश की पत्रकारिता के गौरव पुरुष और राष्ट्रभाव की पत्रकारिता के ध्वजवाहक श्री माणिकचंद वाजपेयी मामाजी निस्पृह जीवन की ऐसी मिसाल थे जो अंतिम सांस तक समाजसेवा के यज्ञ में आहुतियां देते रहे । यह वर्ष मामाजी के जन्मशताब्दी वर्ष के रूप में मनाया गया इसी तारतम्य में बुधवार 7 अक्टूबर को विख्यात पत्रकार मामाजी माणिकचन्द्र वाजपेयी जी के जन्मशताब्दी वर्ष का समापन कार्यक्रम इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है. इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माननीय सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत जी व भारत सरकार में केन्द्रीय मंत्री माननीय प्रकाश जी जावड़ेकर उपस्थित रहेंगे । इस अवसर पर shabd shakti news की ओर से श्रद्धाजंलि स्वरूप मूर्धन्य पत्रकार मामाजी के व्यक्तित्व कृतित्व को इंगित करता लेख “बहुमुखी प्रतिभा के धनी कर्मयोगी पत्रकार माणिकचन्द्र वाजपेयी मामाजी”

  प्रवीण दुबे

 

मामा माणिकचंद वाजपेयी मामाजी अर्थात बहुमुखी प्रतिभा से ओतप्रोत ऐसा व्यक्तित्व जिससे जितना भी सीखा जाए कम है। जीवन के हर पहलू को मामाजी का व्यक्तित्व प्रभावित करता है। वे एक ऐसे कर्मयोगी थे जिन्होंने भगवान कृष्ण के गीता में दिए “कर्मण्येवाधिकारस्ते” के उपदेश को अपने जीवन से चरितार्थ किया। संगठन ने उन्हें जो भी कार्य सौंपा मामाजी फल की चिंता किये बगैर उसे पूर्ण निष्ठा के साथ करते रहे । कार्य के प्रति उनकी मेहनत ,पूर्ण समर्पण, निष्ठा का ही यह परिणाम था की मामाजी ने अपने व्यक्तित्व से सबको प्रभावित किया।

मेधावी शिक्षार्थी व प्रेरक शिक्षक

जीवन के शुरुआत से विचार किया जाए तो मामाजी का जन्म बटेश्वर में श्रेष्ठ कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ बटेश्वर को तीर्थों का भांजा कहा जाता है । मामाजी पर अपने कर्मकांडी परिवार के संस्कारों की गहरी छाप पड़ी और इन्ही संस्कारों को साथ लेकर वह विद्या अध्ययन के लिए अपनी बहन के यहां ग्वालियर आए। यहीं वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा से जुड़े । पढ़ाई के साथ शाखा जाना किताबों में गहरी रुचि रखना उनका नित्य कार्य था। शाखा पर वह अपने बहन के लड़के को भी साथ ले जाते थे वह उन्हें मामा कहकर बुलाता था इस तरह मानिकचन्द वाजपेयी को मामाजी सम्बोधन मिला। पढ़ाई में उन्होंने अपनी मेधाविता का किस कदर लोहा मनवाया की हायर सेकेंडरी परीक्षा में स्वर्ण पदक प्राप्त कर आगे कानून की डिग्री भी सर्वोच्च अंकों के साथ प्राप्त की। शिक्षा से उनके लगाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की उन्होंने कानून की डिग्री प्राप्त करने के बावजूद वकील की जगह शिक्षक बनने में रुचि दिखाई। कई वर्षों तक मामा जी ने भिंड फिर ग्वालियर में एक शिक्षक के रुप में अपने व्यक्तित्व से सभी को प्रभावित किया। अनेक विद्यार्थियों के जीवन को गढ़ने में मामाजी की भूमिका रही। उन्हीं के प्रयासों से अडोखर भिंड में महाविद्यालय की स्थापना हुई।

 

 

श्रेष्ठ स्वयंसेवक

मामाजी विद्यार्थी जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रभावित रहे और शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे संघकार्य में बतौर प्रचारक पूर्णकालिक रूप से समर्पित हो गए। इस दौरान कान्यकुब्ज ब्राम्हण परिवार के तमाम संस्कारों को मामाजी ने संघकार्य के दौरान भी जीवंत रखने का कार्य करके अनूठेपन की मिसाल प्रस्तुत की। नहा धोकर चौका लगाना ,अपनी अलग रसोई तैयार करना आदि आदि,लेकिन अन्ततः मामाजी ने संघ के सहभोज और समरसता के भाव को पूर्णतः अंगीकार करके श्रेष्ठ स्वयंसेवक होने का प्रमाण दिया और संघकार्य में रम गए।

संगठन सर्वोपरि

मामाजी ने अपने जीवन के माध्यम से संगठन सर्वोपरि के बोधवाक्य को कर्मरूप में चरितार्थ करके बेहद प्रेरणादायक सन्देश दिया। मामाजी को संघ ने जब जैसा कहा उन्होंने बिना क्या क्यों कैसे स्वीकार किया उन्होंने कभी भी सफलता असफलता का गणित नहीं लगाया। आजादी के बाद जनसंघ की स्थापना हुई और मामाजी को राजमाता विजयाराजे सिंधिया के खिलाफ चुनाव लड़ाने का निर्णय संगठन ने लिया। यह जानते हुए भी की राजमाता जी एक बेहद सशक्त उम्मीदवार हैं और उनके आगे हार सुनिश्चित है बावजूद मामाजी ने संगठन के आदेश को सर माथे रखते हुए चुनाव लड़ना स्वीकार किया। उन्होंने लंबे समय तक जनसंघ के संगठनमंत्री के दायित्व का भी निर्वहन किया। यह वह समय था जब राजनीति में कांग्रेस हिंदू महासभा जैसे राजनीतिक दलों का एकाधिकार था,मामाजी ने इस संघर्षकाल में बिना सुख सुविधाओं के जनसंघ को मजबूती प्रदान करने का काम किया,यह सब मामाजी ने संघ के आदेश पर किया।

ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता

मामाजी ने एक शिक्षक के रूप में व्यक्ति निर्माण का कार्य किया तो दूसरी ओर उनकी प्रखर लेखनी और प्रबल राष्ट्रचिन्तन ने भी समाज को दिशा दी। इसी के चलते वे भिंड में ही पत्रकारिता से जुड़े ओर सर्वप्रथम देशमित्र नामक पत्र के सम्पादक बने। इसके बाद मामाजी ने 1966 में इंदौर से प्रारंभ हुए स्वदेश समाचार पत्र के सम्पादन का कार्य किया बाद में वे ग्वालियर भोपाल जबलपुर गुना सतना आदि स्थानो से प्रकाशित स्वदेश के प्रधान व सलाहकार सम्पादक रहे। मामाजी की पत्रकारिता किसी पद से सुशोभित नहीं थी बल्कि मामाजी की लेखनी और उनके व्यक्तित्व कृतित्व ने पत्रकारिता जगत को ऐसी महानता प्रदान की थी की उन्हें आज तक मध्यप्रदेश की पत्रकारिता का पितृ पुरुष होने का दर्जा प्राप्त है। उनके सम्मान में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पुरुस्कार प्रदान किया जाता है। मामाजी केवल एक सम्पादक अथवा पत्रकार नहीं थे बल्कि ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के लिए उन्होंने पूरा जीवन समर्पित कर दिया , परिस्थिति चाहे अनकूल हो या प्रतिकूल मामाजी की लेखनी अपने मार्ग से कभी विचलित नहीं हुई। यही वजह है की घोर विरोध के बावजूद मामाजी का स्तम्भ “केरल में

मार्क्स नहीं महेश” रुका नहीं ओर ,इसी प्रकार “समय की शिला” और “संघ अपने विधान के आईने में ” के माध्यम से मामाजी ने समसामयिक आधार पर अपने राष्ट्रचिन्तन को प्रखरता के साथ प्रस्तुत किया। मामाजी को एक पत्रकार के साथ संघ के इतिहास लेखक के रूप में भी श्रेष्ठता हासिल रही है। उन्होंने “आपातकालीन संघर्षगाथा” “संघ की प्रथम अग्निपरीक्षा” ,”मध्यभारत की संघगाथा” , “ज्योति जला निज प्राण की” “भारतीय नारी स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में” और “कश्मीर का कड़वा सच” आदि ग्रन्थों का सृजन किया जो आज भी संघ को समझने वालों के लिए सन्दर्भ ग्रन्थ कहे जा सकते हैं।

विचारों के लिए जेलयात्रा

मामाजी कभी भी विचारों के लिए न तो झुके और न रुके यही कारण रहा की जब वे स्वदेश के सम्पादक थे देश में आपातकाल थोपी गई स्वदेश सहित देश के तमाम पत्र पत्रिकाओं के दफ्तरों पर सरकारी प्रतिबंध लगा दिया गया बावजूद इसके स्वदेश ने लोकतंत्र की हत्या के इस काले अध्याय को प्रखरता के साथ प्रकाशित करना जारी रखा। मामाजी को गिरफ्तार कर लिया गया वे झुके नहीं 19 महीनों तक जेल की सजा सही । जेल में भी मामाजी राष्ट्रीय विचारों के साथ जनजागरण करते रहे।

 

सादगी की प्रतिमूर्ति

मामाजी सही मायनों में सादा जीवन उच्च विचार को कृतिरुप में चरितार्थ करते थे। वे वरिष्ठ पत्रकार लेखक सम्पादक कुशल संगठक होने के साथ साथ जनमानस में बेहद लोकप्रिय होने के बावजूद सादगी सरलता उनमें कूट कूटकर भरी थी साधारण धोती कुर्ता चेहरे पर बड़ी बड़ी मूंछें व बातचीत में झलकता प्रेम व अपनापन ,ऐसा प्रतीत ही नहीं होता था की वे इतने बड़े व्यक्ति हैं। स्वदेश में सलाहकार सम्पादक रहते वे इतनी सरलता और सादगी से आते थे की नई पीढ़ी के पत्रकारों को समझ ही नहीं आता था की उनके सामने सबसे बड़े पद पर आसीन व्यक्ति खड़ा है। मामाजी के प्रति अटलजी की विशेष श्रद्धा सदैव बनी रही। अटलजी लखनऊ स्वदेश के संपादक रहे थे। उस समय अटलजी पर ‘पांचजन्य’ और ‘राष्ट्रधर्म’ जैसे प्रकाशनों का भी दायित्व था।
अटलजी जब प्रधानमंत्री बने तब उनके निवास 7 रेसकोर्स पर मामाजी के सम्मान का कार्यक्रम हुआ। इस समारोह में अटलजी ने मामाजी के चरणस्पर्श कर आशीष लिया था।

उनकी विराटता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की प्रधानमंत्री रहते अटलजी उनसे सादर मुलाकात करते थे बावजूद इसके मामाजी को इसका किंचित मात्र दम्भ नहीं था । वास्तव में मामाजी मानव रूप में सहजता व सज्जनता की प्रतिमूर्ति थे। मामाजी पत्रकारिता में शुचिता के हामी रहे। वह एक विचारधारा से जुड़े रहे परंतु कभी भी अपने विचार को पत्रकारिता पर हावी नहीं होने दिया। सत्ता जब लोकहित के पथ से हटी, तो उनकी कलम ने राह दिखाने का कार्य किया, चाहे सरकार किसी की भी रही हो। मामाजी की पत्रकारिता के मूल्य नवागत पत्रकारों को अपनाने चाहिए। वे पत्रकारिता के आदर्श प्रतिनिधि हैं।
राष्ट्र और अपनी मातृभूमि ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के केंद्र में होते हैं। जीवनमूल्यों की स्थापना के प्रयास ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता करती है। धन के माध्यम से पत्रकारिता अलग बात है और धन को ध्येय बनाकर पत्रकारिता करना अलग बात है। आज अनेक समाचार संस्थानों का ध्येय धन हो गया है। इसलिए आज धन को ध्येय बनाकर पत्रकारिता की जा रही है। मामाजी की पत्रकारिता मूल्यों की पत्रकारिता रही। उन्होंने स्वतंत्रता, संस्कृति और जीवनमूल्यों के लिए पत्रकारिता की। वह सदैव याद किए जाते रहेंगे

प्रवीण दुबे
9425187667
dubeypraveen8152@gmail.com

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