प्रदीप भटनागर
भोपाल। कहते हैं कि सियासत वह खेल है, जहां न तो स्थाई दोस्त होते हैं और न ही स्थाई दुश्मनी होती है। अर्थात सियासत के बाजीगर भी अपनी शतरंज की चालों को मौसम के मिजाज देखकर चलते हैं। मध्य प्रदेश की सियासत में भी इन दिनों कुछ इसी तरह की बयार चल रही है। अलबत्ता एक महीने के भीतर मध्य प्रदेश की सियासत के दो बड़े क्षत्रपों की 3 मुलाकातें परवान चढ़ना किसी बड़े सियासी उलटफेर के संकेत दे रही हैं। इससे अब हर किसी के मन में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। चर्चा इसलिए भी है, क्योंकि दोनों नेता अलग-अलग पार्टी से ताल्लुक रखते हैं। ये दो नेता हैं प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह। बुधवार को एक बार फिर जब नरोत्तम मिश्रा और अजय सिंह की बंद कमरे में मुलाकात हुई, तो इसके कई सियासी मायने निकाले जाना भी स्वाभाविक सी बात है।
गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से मिले अजय सिंह
अजय सिंह एक बार फिर गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से मिलने उनके निवास पर पहुंचे। दोनों नेताओं के बीच बंद कमरे में बातचीत हुई। इस मुलाकात के बाद फिर से चर्चा का बाजार गर्म हो गया है कि अजय सिंह बीजेपी में आ सकते हैं। हालांकि कुछ समय पहले अजय सिंह अपनी मुलाकात पर सफाई दे चुके थे कि वे कांग्रेस में थे और कांग्रेस में ही रहेंगे।
दो बार पहले भी हो चुकी है मुलाकात
इससे पहले दो बार दोनों नेताओं की मुलाकात हुई थी। सबसे पहले अजय सिंह प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से मिलने उनके घर पहुंचे थे। उस दौरान अजय सिंह ने कहा था कि वे क्षेत्र की समस्याओं को लेकर गृह मंत्री से मिले थे। दूसरी बार नरोत्तम मिश्रा अजय सिंह के जन्मदिन पर उनसे मिलने पहुंचे थे। अब कुछ ही दिनों में दोनों के बीच यह तीसरी मुलाकात हुई है।
हाशिए पर हैं अजय सिंह
तीन दशक पुरानी मध्यप्रदेश कांग्रेस की राजनीति की तरफ रुख करते हैं, यह वो वक्त था, जब राजनीति के चाणक्य यानी प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह अपने राजनीतिक दांव पेंच के गुर सिखाकर अपना एक पट्ठा तैयार कर रहे थे, जिसका नाम था दिग्विजय सिंह। अर्जुन सिंह की राजनीतिक शिक्षा की पाठशाला का दिग्विजय सिंह ने सफलतम उपयोग भी किया, और सालों तक प्रदेश की राजनीति में अविजय ही रहे, फिर बात चाहे कांग्रेस के बाहर की करें या फिर भीतर की। बाद में स्थिति यह भी बनी, कि दिग्विजय सिंह ने अपनी लकीर इतनी बड़ी कर ली, कि अर्जुन सिंह उनके सामने बौने नजर आने लगे। शायद यही कारण है, कि 10 साल के दिग्विजय शासकाल बीत जाने के बाद भी दिग्विजय ही कांग्रेस के एक मजबूत धड़े के तौर पर पहचाने जाते रहे है, और 15 महीने की कमलनाथ सरकार भी उनके नक्शे कदम से इधर उधर नहीं चल सकी। जाहिर है कोई माने या न माने लेकिन कांग्रेस के भीतर तो यह दिग्विजय काल ही है।
इन दोनों तस्वीरों को आपके सामने रखने का एक खास उद्देश्य था, दरअसल जिस स्थिति में दिग्विजय सिंह ने अपने राजनीतिक गुरु अर्जुन सिंह से राजनीति का ककहरा सीखा था, आज अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह भी कमोवेश उससे नाजुक स्थिति में अपना समय व्यतीत कर रहे हैं। बिना जनाधार के दर्जनों नेताओं को ढोने वाली कांग्रेस ने तीन चुनाव हारने के बाद एक बेहतरीन राजनीतिक विरासत के मालिक अजय सिंह से किनारा कर लिया। पार्टी में अपनी इस उपेक्षा के बाद जब सिंह को जनता की अदालत में भी हार नसीब हुई, तो चुप्पी उनकी मजबूरी बन गई, और उन्होंने खुद को अपने बंगले की चार दीवारी तक ही समेट लिया। लेकिन अब जबकि अजय सिंह अपनी ही पार्टी में हाशिए पर चल रहे हैं। ऐसे में उनकी राज्य के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से एक के बाद एक तीन मुलाकातों के बाद यह कहना कि यह अनौपचारिक मुलाकातें थी। आसानी से हजम होने वाली बात नहीं है।
कांग्रेस में उपेक्षित?
फिलहाल पार्टी ने उन्हें कोई खास जिम्मेदारी भी नहीं दी है। कई नेता भी उनकी पार्टी में कम होती सक्रियता पर सवाल खड़े कर चुके है। इससे पहले अजय सिंह भी सार्वजनिक रूप से अपनी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ की कार्यप्रणाली को लेकर भी बयानबाजी कर चुके हैं।
इरादों का इजहार
मध्यप्रदेश कांग्रेस एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है, ऐसे में अजय सिंह ने पार्टी की नीतियों पर सवाल उठाते हुए अपने इरादे तो जाहिर कर दिए हैं, लेकिन अभी भी वह किसी नेता का विरोध करने से बच रहे हैं, शायद उनके भीतर का एक अनुशासित नेता उन्हें यह सब करने से रोक रहा है, लेकिन इस बीच सवाल यह उठता है, कि क्या किसी नेता विशेष के प्रति उनके दिल में नाराजगी की भावना होगी, और अगर हां तो वह नेता कौन होगा ? इस विषय मे अगर गौर करें, तो आपसी खींचातानी में माहिर कांग्रेस के भीतर अजय सिंह का सूरज अस्त करवाने की कोशिश करने वाले नेताओं की शायद ही कोई कमी हो, लेकिन टांग खींचने वाले नेताओं के साथ उस शख्स को भी राहुल भैया की राजनीतिक का खलनायक मानना स्वभाविक है, जो इस स्थिति में सुधार करने की क्षमता रखते हुए, यह सारा घटनाक्रम दूर से ही देख रहा है, और वह नाम किसी और का नहीं, बल्कि अजय सिंह के पिता अर्जुन सिंह के चेले दिग्विजय सिंह का ही है। राजनीतिक जानकार भी इस बात का दावा करने से नहीं चूकते, कि पिछले एक अर्से में दिग्विजय सिंह ने सतही तौर पर अजय सिंह के पुनर्वास के लिए कई कोशिशें की हैं, फिर बात चाहे संगठन में अहम जिम्मेदारी की करें, या फिर राज्यसभा सीट के लिए गुणा गणित की। लेकिन वह कोशिशें सिर्फ दिखावे तक ही सीमित रहीं, क्योंकि अगर उनमें कुछ आधार होता, कमलनाथ के आंख और कान रहे दिग्विजय सिंह के लिए अजय सिंह को राजनीति की मुख्यधारा से जोड़ना कोई बड़ी बात नहीं थी।