सुदेश गौड़
कोलकाता में 21 दिसंबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ शताब्दी समारोह श्रृंखला के तहत अपने व्याख्यान में कहा कि संघ के बारे में कुछ लोगों द्वारा निराधार, गलत और भ्रामक कथाएँ/ नैरेटिव फैलाए जा रहे हैं। वे इसे इसलिए बता रहे हैं क्योंकि संघ के विस्तार से कुछ समूहों के “निजी स्वार्थ” प्रभावित हो सकते हैं, जिससे वे विरोध में प्रचार करते हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को संघ के बारे में राय बनाते समय सतही स्रोतों या अफवाहों पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि तथ्य पर आधारित जानकारी लेनी चाहिए। ऐसे ही एक नैरेटिव पिछले काफी वर्षों से सार्वजनिक विमर्श में बार-बार उछाला जाता कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने नागपुर स्थित मुख्यालय पर “50 वर्षों तक तिरंगा नहीं फहराया।” यह कथन पहली नज़र में भावनात्मक प्रतीत होता है, किंतु जब इसे ऐतिहासिक और कानूनी परिप्रेक्ष्य में देखा जाता है तो यह एक अधूरा, भ्रामक और राजनीतिक उद्देश्य से गढ़ा गया नैरेटिव साबित होता है।भारत की स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक तिरंगे के प्रयोग को लेकर कड़े कानूनी नियम लागू थे। तत्कालीन भारतीय ध्वज संहिता (फ्लैग कोड आफ इंडिया) के अनुसार तिरंगा केवल सरकारी भवनों, सरकारी संस्थानों तथा कुछ विशेष सरकारी अवसरों पर ही फहराया जा सकता था। निजी भवनों, निजी संस्थाओं और संगठनों को तिरंगा फहराने की अनुमति नहीं थी। यह प्रतिबंध सार्वभौमिक था। यह नियम न किसी एक संगठन के लिए बना था और न ही किसी एक विचारधारा के खिलाफ।

नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय कोई सरकारी भवन नहीं, बल्कि एक निजी संगठन का निजी परिसर है। ऐसे में वहां तिरंगा न फहराया जाना न कानून का उल्लंघन था, न संविधान का अपमान और न ही राष्ट्र भावना की कमी। जो कार्य कानूनन प्रतिबंधित हो, उसका न किया जाना देशविरोध नहीं कहा जा सकता।
तिरंगे को लेकर 2002 में आया निर्णायक मोड़
23 जनवरी 2002 को उद्योगपति नवीन जिंदल द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय दिया कि तिरंगा फहराना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। इसके बाद ध्वज संहिता में संशोधन हुआ और निजी भवनों और संस्थानों को भी तिरंगा फहराने की अनुमति मिली। कानून बदलते ही नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय सहित अनेक निजी संस्थाओं ने अपने परिसरों में तिरंगा फहराना शुरू किया। आज नागपुर मुख्यालय में तिरंगा नियमित रूप से फहराया जाता है।
तो फिर यह भ्रम फैला कैसे
यह भ्रम
मुख्यतः तीन वर्गों द्वारा फैलाया गया- 1. कुछ राजनीतिक दल और उनके नेता जिनकी राजनीति लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विरोध पर आधारित रही है। उनके लिए यह कथन राष्ट्रवाद के प्रश्न पर प्रतिद्वंद्वी को कठघरे में खड़ा करने का आसान हथियार था और बिना कानूनी सच्चाई बताए भावनात्मक आरोप गढ़ने का माध्यम भी। इसके पीछे उनका एक ही निहित स्वार्थ था राजनीतिक लाभ, वैचारिक टकराव और चुनावी ध्रुवीकरण करना। 2. वामपंथी विचारधारा से जुड़े लेखकों और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग लगातार यह सिद्ध करने का प्रयास करता रहा है कि राष्ट्रवाद केवल उनके वैचारिक फ्रेम में ही वैध है। अन्य राष्ट्रवादी संगठनों को “संदिग्ध” दिखाया जाए ताकि बौद्धिक वर्चस्व बनाए रखना और वैचारिक विरोधियों को नैतिक रूप से कमजोर करना आसान हो जाए। 3. सोशल मीडिया एक्टिविस्ट और आधी-अधूरी जानकारी फैलाने वाले समूह सोशल मीडिया पर कानून का संदर्भ हटाकर समय की परिस्थितियों को नजरअंदाज कर एक पंक्ति में आरोप गढ़ दिए गए ताकि लाइक्स, शेयर, ट्रेंड और डिजिटल प्रभाव प्राप्त किया जा सके।
लोकतंत्र की मजबूती सच के सम्मान में
23 जनवरी 2002 से पहले निजी भवनों पर तिरंगा फहराना कानूनन संभव नहीं था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय एक निजी परिसर है। कानून बदलते ही वहां तिरंगा फहराया गया। इसलिए “50 साल तक तिरंगा नहीं फहराया”कहना इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना है।तिरंगा केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि संविधान, कानून और राष्ट्रीय चेतना का संयुक्त प्रतीक है। देशभक्ति का मूल्यांकन कानून के पालन और राष्ट्रहित में किए गए कार्यों से होता है, न कि संदर्भहीन नारों और राजनीतिक आरोपों से। समाज का दायित्व है कि वह भावनाओं से नहीं, तथ्यों से संचालित विमर्श को स्वीकार करे क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती सच के सम्मान में ही निहित है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं