कांग्रेस पार्टी और उनके वरिष्ठ सांसद व लोकसभा विपक्ष के नेता राहुल गांधी की तरफ से कई महीनों से लगाए जा रहे सभी आरोपों का चुनाव आयोग ने जवाब दिया है। करीब एक घंटे 25 मिनट लंबे प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने चुनाव में धांधली, भाजपा से मिलीभगत से लेकर फर्जी मतदाता और वोट चोरी तक के सभी आरोपों का तथ्यों और तर्कों के साथ जवाब दिया। कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों की तरफ से चुनाव आयोग पर तब से निशाना बनाया जा रहा है, जब से आयोग ने बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा की। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लेकर लगाए जा रहे तमाम आरोपों पर चुनाव आयोग ने कहा – पिछले 20 वर्षों में एसआईआर प्रक्रिया नहीं की गई थी। देश में 10 से ज्यादा बार एसआईआर प्रक्रिया अपनाई जा चुकी है। एसआईआर का मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची का शुद्धिकरण करना है। इसके लिए चुनाव आयोग ने बिहार से एक विशेष गहन पुनरीक्षण की शुरुआत की है।
कुमार ने कहा- यदि शिकायतकर्ता उस निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता नहीं हैं, तो आपके पास कानून में केवल एक ही विकल्प है। वह है निर्वाचक पंजीकरण नियम, नियम संख्या 20, उप-खंड (3), उप-खंड (B)। यह कहता है कि यदि आप उस निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता नहीं हैं, तो आप गवाह के रूप में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं और आपको निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को शपथ देनी होगी। वह शपथ उस व्यक्ति के सामने दिलानी होगी जिसके खिलाफ आपने शिकायत की है।
राहुल गांधी का आरोप- चुनाव आयोग इलेक्ट्रॉनिक डेटा क्यों नहीं देता। जानबूझकर ऐसी मतदाता सूची देता है, जिसे मशीन से नहीं पढ़ा जा सकता?
चुनाव आयोग का जवाब- कांग्रेस नेता के इस आरोप पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा कि जहां तक मशीन-पठनीय मतदाता सूची का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट 2019 में ही कह चुका है कि यह मतदाता की निजता का उल्लंघन हो सकता है। हमें मशीन-पठनीय मतदाता सूची और खोज योग्य मतदाता सूची के बीच के अंतर को समझना होगा। आप चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध मतदाता सूची को EPIC नंबर डालकर खोज सकते हैं। इसे डाउनलोड भी कर सकते हैं। इसे मशीन-पठनीय नहीं कहा जाता। मशीन-पठनीय के संबंध में 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय का गहन अध्ययन किया और पाया कि मशीन-पठनीय मतदाता सूची देने से मतदाता की निजता का उल्लंघन हो सकता है। मशीन-पठनीय मतदाता सूची प्रतिबंधित है। चुनाव आयोग का यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद और 2019 का है।
राहुल गांधी का आरोप- कई मतदाताओं के नाम के आगे उनका पता ‘जीरो’ लिखा गया।
चुनाव आयोग का जवाब- चुनाव आयोग ने कहा कि मकान नंबर ‘जीरो’ होने का मतलब फर्जी मतदाता नहीं है। आयोग ने कहा कि देश में ऐसे करोड़ों वोटर्स हैं, जिनके पते में जीरो नंबर है। उन्होंने कहा कि हर पंचायत में मकान नंबर नहीं होता है। उन्होंने कहा कि वोटर बनने के लिए मकान होना जरूरी नहीं होता। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा कि तमाम वोटर्स हैं जो सड़कों पर सोते हैं। इन सभी के पते में मकान नंबर जीरो ही हैं।
राहुल गांधी का आरोप- चुनाव आयोग सीसीटीवी फुटेज नहीं देता, ताकि कोई सबूत न बचे।
चुनाव आयोग का जवाब- इस आरोप पर सीईसी ज्ञानेश कुमार ने कहा, ‘रिटर्निंग ऑफिसर की ओर से नतीजे घोषित करने के बाद भी कानून में यह प्रावधान है कि 45 दिनों की अवधि के भीतर राजनीतिक दल कोर्ट जाकर चुनाव को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका दायर कर सकते हैं। इस 45 दिनों की अवधि के बाद इस तरह के बेबुनियाद आरोप लगाना, चाहे वह केरल हो, कर्नाटक हो या बिहार। जब चुनाव के बाद की वह 45 दिन की अवधि समाप्त हो जाती है और उस अवधि के दौरान किसी भी उम्मीदवार या राजनीतिक दल को कोई अनियमितता नहीं मिलती है, तो आज इतने दिनों के बाद देश के मतदाता और जनता ऐसे बेबुनियाद आरोप लगाने के पीछे की मंशा समझ रहे हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, ‘हमने कुछ दिन पहले देखा कि कई मतदाताओं की तस्वीरें बिना उनकी अनुमति के मीडिया के सामने पेश की गईं। उन पर आरोप लगाए गए, उनका इस्तेमाल किया गया। क्या चुनाव आयोग को किसी भी मतदाता, चाहे वह उनकी मां हो, बहू हो, बेटी हो, के सीसीटीवी वीडियो साझा करने चाहिए? जिनके नाम मतदाता सूची में हैं, वे ही अपने उम्मीदवार को चुनने के लिए वोट डालते हैं।
राहुल गांधी का आरोप- एक ही आदमी कई जगह मतदान कर रहा है। ‘वोट चोरी’ की यह मिलीभगत चुनाव आयोग और भाजपा के बीच है।
चुनाव आयोग का जवाब- मुख्य चुनाव आयुक्त ने दोहरे मतदान और ‘वोट चोरी’ के आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया। भारत के संविधान के अनुसार, केवल भारतीय नागरिक ही सांसद और विधायक के चुनाव में मतदान कर सकते हैं। अन्य देशों के लोगों को यह अधिकार नहीं है। दो एपिक वाले मतदाता कार्ड पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, ‘डुप्लिकेट EPIC दो तरह से हो सकते हैं। एक तो ये कि एक व्यक्ति जो पश्चिम बंगाल में है, जो अलग व्यक्ति है, उसके पास एक EPIC नंबर है और दूसरा व्यक्ति जो हरियाणा में है, उसके पास वही EPIC नंबर है। मार्च 2025 के आसपास जब ये सवाल आया तो हमने इस पर चर्चा की और हमने देशभर में इसका समाधान किया। लगभग तीन लाख ऐसे लोग मिले, जिनके EPIC नंबर एक जैसे थे, इसलिए उनके EPIC नंबर बदल दिए गए। दूसरे तरह का डुप्लिकेशन तब आता है, जब एक ही व्यक्ति का नाम एक से ज्यादा जगहों पर वोटर लिस्ट में होता है और उसका EPIC नंबर अलग-अलग होता है।
चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के शुरुआत में कहा- कानून के अनुरूप, हर राजनीतिक दल का जन्म चुनाव आयोग में पंजीकरण से ही होता है। तो चुनाव आयोग उन राजनीतिक दलों के बीच भेदभाव कैसे कर सकता है। चुनाव आयोग के लिए, कोई पक्ष या विपक्ष नहीं है, सभी समकक्ष हैं। चाहे किसी भी राजनीतिक दल का कोई भी हो चुनाव आयोग अपने संवैधानिक कर्तव्य से पीछे नहीं हटेगा।