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रिसर्च :यदि आप हैं कोरोना संक्रमित तो ताजी खुली हवा में करिये चहल कदमी

समुद्र किनारे या हरियाली भरे बागीचे व खुले मैदान में बहने वाली ताजा ठंडी हवा कोरोना से गंभीर रूप से संक्रमित मरीजों की हालत में सुधार लाने में मददगार साबित हो सकती है? स्पेन के बार्सिलोना स्थित हॉस्पिटल डे मार के स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसी सवाल का चिकित्सकीय प्रमाण खोजने की कोशिशों में जुट गए हैं। उन्होंने जब आईसीयू में भर्ती एक मरीज को समुद्री तट पर ले जाकर दस मिनट तक खुली हवा में सांस दिलवाई तो उसके फेफड़ों की कार्यक्षमता तो सुधरी ही, साथ में सांस लेने में तकलीफ की शिकायत में भी थोड़ी कमी आई।

60 वर्षीय फ्रांसिस्को एस्पा जुलाई में कोरोना की जद में आने के बाद ‘हॉस्पिटल ऑफ द सीज’ के नाम से मशहूर हॉस्पिटल डे मार में भर्ती हुए थे। लगभग दो महीने तक आईसीयू में रखे जाने के बावजूद जब उनकी हालत में कोई खास सुधार नहीं आया तो डॉक्टरों ने उन्हें प्रोमेनेड तट पर ले जाने का फैसला किया।

दरअसल, हॉस्पिटल डे मार के विशेषज्ञ ‘प्रकृति’ को बेहतरीन आरोग्यदायक के रूप में देखते हैं। वे कोरोना संक्रमण की दस्तक से दो साल पहले से ही गंभीर रूप से बीमार मरीजों पर ‘नेचर थेरेपी’ आजमाते आए हैं। हालांकि, महामारी के मद्देनजर उन्होंने मार्च से इस पद्धति पर रोक लगा दी थी।

चार सितंबर की सुबह एक डॉक्टर और चार नर्सों की टीम हॉस्पिटल बेड पर लेटे एस्पा को प्रोमेनेड तट पर लेकर पहुंची। 52 दिन बाद जब एस्पा ने खुली हवा में सांस ली तो उनके चेहरे की खुशी देखते ही बनती थी। उन्होंने दस मिनट तक आंख मूंदकर धूप सेंकी और शुद्ध-ठंडी हवा फेफड़ों में भरी।

चिकित्सकीय टीम इस दौरान एस्पा के शरीर का तापमान, हृदयगति, श्वास गति सहित सभी अहम पैमाने रिकॉर्ड कर रही थी। उन्होंने देखा कि एस्पा के फेफड़े अस्पताल के मुकाबले थोड़ा बेहतर काम करने लगे थे। स्ट्रेस हार्मोन ‘कॉर्टिसोल’ के स्त्राव में कमी आने से उनकी हृदयगति और रक्तचाप में भी सुधार हुआ था। लिहाजा डॉक्टर इस बात की संभावना तलाशने की कोशिशों में जुट गए हैं कि क्या ‘नेचर थेरेपी’ आजमाकर आईसीयू में मरीजों की ओर से गुजारने वाले समय में कमी लाई जा सकती है।

‘फील गुड’ कराने की कवायद-
-हॉस्पिटल डे मार के प्रमुख डॉक्टर ज्यूडिथ मरीन कहते हैं, कोविड-19 से जूझ रहे मरीजों के सफल इलाज के लिए उनके भावनात्मक स्वास्थ्य का ख्याल रखना भी बेहद जरूरी है। जब समुद्री तट पर ले जाने से एस्पा की हालत में मामूली सुधार देखने को मिला तो हमने उसे फुटबॉल मैच भी दिखाया। इससे उसमें जीने की नई चाह और ऊर्जा का संचार हुआ, जो कि एक सकारात्मक संकेत है। अब हम अन्य संक्रमितों पर भी इलाज की ऐसी पद्धतियां आजमाने की तैयारी कर रहे हैं।

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