राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि भारत को तोड़ने की कोशिशें सफल नहीं होंगी। उन्होंने कहा कि कुछ नेता इन कोशिशों में शामिल हो रहे हैं, लेकिन सत्ता परिवर्तन नहीं होगा। उनकी यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के उस बयान के कुछ दिनों बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि चुनावी रोल की SIR (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ दिल्ली में हो रहे विरोध-प्रदर्शन, “वास्तव में regime change की लड़ाई” बन गए हैं।कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त शामिल हुए।
महाराष्ट्र के नागपुर में रेशिमबाग मैदान पर आयोजित आरएसएस के विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए, भागवत ने कहा कि संगठन के निरंतर सांस्कृतिक और संगठनात्मक प्रयासों ने हिंदू धर्म को बचाए रखने में मदद की है, खासकर इस्लामी आक्रमणों के बाद के दौर में। भागवत ने कहा कि भाजपा की सफलता का काफी श्रेय संघ के अनुशासन और संगठनात्मक ताकत को जाता है। हिंदू धर्म को जीवित और मजबूत बनाए रखने में भी संघ ने अहम भूमिका निभाई है। अगर यह निरंतर सांस्कृतिक और संगठनात्मक प्रयास न होता, तो हिंदू धर्म को कहीं अधिक नुकसान झेलना पड़ता—शायद सदियों के दौरान इसका अस्तित्व ही मिट जाता—खासकर इस्लामी आक्रमणों के बाद।
भागवत ने बताया कि पिछले एक साल में शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए, और विजयादशमी का आयोजन इन कार्यक्रमों के समापन का प्रतीक है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि यह वर्ष संत रविदास जी महाराज की 650वीं जयंती का वर्ष है। फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल में चल रही अशांति की ओर इशारा करते हुए, आरएसएस प्रमुख ने कहा कि पश्चिम से एक ऐसा तूफान उठा है जो हर तरह की व्यवस्था, शालीनता, भलाई, और सांस्कृतिक व मानवीय मूल्यों को नष्ट करना चाहता है। उन्होंने कहा कि कहा जाता है कि ‘सत्ता परिवर्तन’ से हालात बदल जाएंगे, लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ और न ही आज हो रहा है।
भागवत ने आरोप लगाया कि दुनिया भर में इस तरह के अभियान चलाए जाते हैं, ताकि अपने निजी स्वार्थ साधने वाले लोग और उनके “मोहरे” अपना दबदबा बनाए रखें। उन्होंने कहा कि भारत की तरक्की इन कोशिशों के रास्ते में एक रुकावट है, इसलिए भारत उनका “मुख्य लक्ष्य” बन गया है। उन्होंने कहा कि भारत में भी ऐसी कोशिशें चल रही हैं। उन्होंने आगे जोड़ा कि हाल के दशकों में देश की सख्त नीतियों और इसे आगे ले जाने वाले मजबूत नेतृत्व का असर देखने को मिला है
भागवत ने कहा कि दुनिया में भारत को लेकर एक नई जिज्ञासा बढ़ रही है। दुनिया भारत पर ध्यान दे रही है। देश का कद बढ़ रहा है और यह आगे बढ़ रहा है। इसलिए, भारत को लेकर जिज्ञासा भी बढ़ रही है। उनका जीवन भौतिकवाद, व्यक्तिवाद और बेलगाम उपभोग पर आधारित है। भौतिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद, उनके जीवन में जो समस्याएं पैदा हुई हैं, वे उन्हें परेशान कर रही हैं। उन्हें नहीं पता कि दुनिया की विविधताओं को कैसे संभालें, विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कैसे बनाए रखें, और जो हमसे अलग हैं, उनके साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार कैसे करें… यही कारण है कि हम देख सकते हैं कि सब कुछ ठीक-ठाक लगने के बावजूद, भू-राजनीतिक तनाव बढ़ रहे हैं। आर्थिक अनिश्चितता, पर्यावरणीय संकट और वर्चस्व की लड़ाई विनाश की ओर ले जा रही है। दुनिया जानती है कि इन समस्याओं के जवाब भारत के पास हैं।
उन्होंने कहा कि चाहे आप मंदिरों, मठों या गुरुद्वारों में जाएं, आपको एक जैसा ज्ञान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन ही मिलेगा। भारतीय विचारधारा के दायरे में आप कहीं भी जाएं, आपको यही समझ मिलेगी — हर तरह की विविधता का सम्मान करें, उसे स्वीकार करें और सभी को सुरक्षा प्रदान करें। पीढ़ियों से यही हमारा स्वभाव रहा है। इसी समझ से एक और महत्वपूर्ण सिद्धांत निकलता है: विविधता परिवर्तनशील होती है। इसलिए, जीवन में जो कुछ भी बदलने योग्य है, उसे बदलते समय के साथ बदल जाना चाहिए, जबकि शाश्वत सत्य हमेशा अडिग रहने चाहिए। यह लचीलापन हमारे सनातन दृष्टिकोण का ही परिणाम है।
वंदे मातरम स्वाभिमान गाने में कोई संकोच या विरोध नहीं होना चाहिए
सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा, वंग भंग के विभाजनकारी षड्यंत्र को परास्त करने वाला वंदे मातरम् आज भी वह प्रेरणा देने के लिए सशक्त है एकता की। वो अपना राष्ट्रगीत है। और उसे स्वाभिमान से उच्च कंठ से और संपूर्ण गाने में कोई संकोच या विरोध होना नहीं चाहिए। भारत की मातृभूमि के नाते वह भक्ति है।