प्रवीण दुबे
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देशवासियों से आर्थिक सुधार के लिए की गई अपील के बाद इस देश के विपक्ष, कुछ कथित बुद्धिजीवी और अर्बन नेक्सलाइट वर्ग ने विरोध का मोर्चा खोल दिया है और इस अपील की आड़ में प्रधानमंत्री मोदी को ही निशाने पर ले लिया है, राष्ट्रहित में किसी प्रधानमंत्री द्वारा जनता जनार्दन से की गई अपील के प्रति ऐसा राजनैतिक विद्वेष पूरी दुनिया में शायद ही कहीं देखने को मिला है।
भारत की ही बात करें तो राहुल गांधी से अखिलेश यादव तक की राजनीतिक परम्परा से जुड़े तमाम नेता समय समय पर देशवासियो से राष्ट्रहित में आत्मसंयम से जुड़े ऐसे आव्हान करते रहे हैं और पूरे देश ने कभी इसमें राजनीतिक द्वेष नहीं देखा।
भारतीय इतिहास बताता है कि जब भी देश संकट में आया जनता ने सामूहिक अनुशासन दिखाया,त्याग और सहयोग किया, और नेतृत्व पर विश्वास करके बड़े बदलाव संभव किए।
1964–65 में भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था। उस समय देश में गेहूं और अनाज की भारी कमी थी। लगातार सूखा पड़ा था और अमेरिका से PL-480 योजना के तहत गेहूं आयात करना पड़ रहा था।
इसी बीच Indo-Pakistani War of 1965 का दौर भी आया, जिससे देश पर आर्थिक दबाव और बढ़ गया।
उस समय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों से रेडियो संदेश के माध्यम से अपील की कि—
“यदि देश का हर नागरिक सप्ताह में एक समय भोजन छोड़ दे या एक दिन उपवास रखे, तो हम अनाज की कमी से लड़ सकते हैं।”
“जय जवान, जय किसान” का नारा भी इसी समय शास्त्री जी ने दिया था
इसका अर्थ था कि देश की सुरक्षा करने वाला जवान और देश का पेट भरने वाला किसान — दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
यह नारा बाद में भारत की पहचान बन गया और किसानों को अधिक उत्पादन के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर इसी सोच ने भारत में हरित क्रांति (Green Revolution) का मार्ग मजबूत किया।
उस समय लोगों ने शास्त्री जी की अपील को बहुत गंभीरता से लिया।
कई घरों में सोमवार या किसी निश्चित दिन उपवास रखा जाने लगा।
होटल और रेस्तरां भी कुछ समय के लिए बंद रखे जाते थे।
लोग भोजन बचाने को राष्ट्रसेवा मानते थे। यह भारतीय समाज में सामूहिक जिम्मेदारी और अनुशासन का उदाहरण बन गया।
महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेज़ी वस्त्रों के बहिष्कार और खादी अपनाने,नमक सत्याग्रह,“अंग्रेजों भारत छोड़ो”और जनता से
“करो या मरो” का आव्हान किया पूरे देश में लाखों लोग इन आंदोलनों से जुड़ गए उन्होंने इसमें राजनीति नहीं देखी गई।
विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन के अंतर्गत ज़मींदारों से स्वेच्छा से भूमि दान करने की अपील की थी परिणाम स्वरुप हजारों एकड़ भूमि गरीबों के लिए दान में मिली यह अहिंसक सामाजिक सुधार से जुड़ा अव्हान था जिसको पूरे देश से समर्थन मिला था ।
जयप्रकाश नारायण का “संपूर्ण क्रांति” आंदोलन भी इसका बड़ा उदाहरण कहा जा सकता है 1974 में भ्रष्टाचार और तानाशाही के विरोध में आंदोलन शुरू हुआ। जयप्रकाश नारायण ने
युवाओं और छात्रों से शांतिपूर्ण परिवर्तन के लिए आगे आने को कहा
परिणाम देशव्यापी जनआंदोलन बना।
बाद में आपातकाल विरोधी राजनीति की बड़ी नींव बनी। देश ने कभी इसमें राजनीति नहीं देखी और राष्ट्रहित को ही सर्वोपरी माना।
पोखरण द्वीतिय के बाद जब भारत ने मई 1998 में परमाणु परीक्षण किए, तब अमेरिका सहित कई पश्चिमी देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। उस समय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने देशवासियों से आत्मविश्वास, स्वाभिमान और स्वदेशी भावना के साथ खड़े रहने का आह्वान किया था। क्या हुआ था?
अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए,
कुछ विदेशी सहायता और तकनीकी सहयोग रोक दिए गए, विश्व बैंक और अन्य संस्थाओं पर भी दबाव बनाया गया। लेकिन अटलजी ने स्पष्ट कहा कि भारत अपनी सुरक्षा और स्वाभिमान से समझौता नहीं करेगा।
अटलजी ने देशवासियों से आह्वान किया “भारत एक महान राष्ट्र है। हम कठिनाइयों का सामना अपने बल पर करेंगे।”उन्होंने जनता से स्वदेशीअपनाने,आत्मनिर्भर बनने,
देशी उद्योगों का समर्थन करने,
और धैर्य बनाए रखने की अपील की।
उन्होंने यह संदेश दिया कि आर्थिक दबावों से घबराने की आवश्यकता नहीं है।प्रसिद्ध भावना और संदेश
उस समय अटल जी का यह भाव बहुत चर्चित हुआ “हम भूखे रह लेंगे, लेकिन देश की सुरक्षा और सम्मान से समझौता नहीं करेंगे।”
यह भावना उनके कई भाषणों और जनसभाओं में व्यक्त हुई देशवासियो ने इसका पुरजोर समर्थन किया था विपक्ष ने भी इसका साथ दिया
देश में राष्ट्रगौरव की भावना बढ़ी।
लोगों ने प्रतिबंधों को भारत की शक्ति की परीक्षा माना।भारतीय वैज्ञानिकों और सेना के प्रति सम्मान बढ़ा।
स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर नई चर्चा शुरू हुई।उस समय भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षा से अधिक मजबूत निकली और कुछ वर्षों में प्रतिबंधों का प्रभाव काफी कम हो गया।
साफ है जब-जब देश कठिन दौर से गुजरा, तब-तब भारतीय नेतृत्व ने उस संकट से निपटने जनता से राष्ट्रहित में सहभागिता का आह्वान किया।
आज जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खाड़ी युद्ध के मद्देनजर देशवासियों से आत्मसंयम के द्वारा कुछ प्रतिबंधों की अपील की है तो कुछ राजनैतिक दल और उनके नेता प्रधानमंत्री मोदी पर ही हमलावर हैं जो बहुत ही निंदनीय है ये भूल रहे हैं की प्रधानमंत्री मोदी ने जो आव्हान किया है उसकी जड़ें भारतीय इतिहास की उसी परंपरा में दिखाई देती हैं, जिसे कभी महात्मा गाँधी , लाल बहादुर शास्त्री, जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कई नेताओं ने अंगीकार किया था और देश ने कभी भी इसमें राजनीति नहीं देखी।
Praveen dubey @ shabd shakti news.in