प्रवीण दुबे
मध्यप्रदेश की राजनीति में शुक्रवार का दिन बेहद महत्वपूर्ण होने वाला विधानसभा में वोटों का जो गणित है उसे देखकर साफतौर पर यह अंदाजा लगाया जा सकता है की प्रदेश में कमलनाथ की विदाई और कमल खिलने का वक्त आ गया है। यदि ऐसा होता है तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा की मध्यप्रदेश की सत्ता में मुख्यमंत्री का ताज आखिर किस नेता के सिर बंधने वाला है ? इसबारे में निःसंदेह दो नाम सबसे प्रमुखता से लिये जा सकते हैं पहला शिवराज सिंह और दूसरा नरेंद्र सिंह तोमर कुछ राजनीतिक विश्लेषक थावरचंद गहलोत और वीडी शर्मा के नाम भी इस दौड़ में शामिल मानकर चल रहे हैं। इसके पीछे उनके अपने तमाम तर्क हैं जैसे की जातिगत समीकरण व संघ से नजदीकियां व युवा चेहरे को प्राथमिकता दिया जाना आदि आदि । लेकिन हमारा मानना है की मुख्यमंत्री की दौड़ में शिवराज और नरेंद्र तोमर के अलावा कोई दूसरा चेहरा आगे दिखाई नहीं दे रहा है। इन दो नामों का अलग अलग विश्लेषण किया जाए तो मुख्यमंत्री पद के लिए केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर की वजनदारी शिवराज पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। इसके एक नहीं कई कारण स्पष्ट रूप से नजर आ रहे हैं पहला कारण जो शिवराज की दावेदारी को कमजोर करता दिख रहा है वह है उनके नेतृत्व में भाजपा का पिछला विधानसभा चुनाव हार जाना। सर्वविदित है की इस हार के पीछे शिवराज के ही आरक्षण सम्बन्धी बयान की बड़ी भूमिका थी। संगठन यह भली प्रकार समझता है की प्रदेशवासी अभी पूरी तरह उसे भूले नहीं हैं, यदि यह विषय फिर उखड़ता है तो भाजपा के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। इतना ही नहीं व्यापम घोटाला और शिवराज की मुख्यमंत्री रहते काम करने की शैली का भी भाजपा के भीतर ही एक वर्ग विरोध करता रहा है।जहां तक नरेन्द्र तोमर का सवाल है मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी वजनदारी एक नहीं कई उपलब्धियों के कारण अहम हो जाती है। नरेंद्र सिंह की सबसे बड़ी खूबी यह है की वह एक नहीं कई बार भाजपा के लिए संकट मोचक की सफल भूमिका का निर्वहन करके पार्टी हाईकमान के मन पर अपनी राजनीतिक योग्यता की गहरी छाप छोड़ चुके हैं। वे दो बार मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रहने के साथ उत्तरप्रदेश जैसे राज्य की संगठनात्मक कमान संभाल चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी हों या फिर अमितशाह नरेन्द्र तोमर को खासा पसन्द करते है यही कारण हैं नरेंद्र सिंह मोदी के दोनों कार्यकालों में कई महत्वपूर्ण विभागों के केंद्रीय मंत्री के साथ साथ कई राज्यों के चुनाव प्रभारी भी रहे हैं। इन प्रशासनिक खूबियों के अलावा नरेन्द्र सिंह का धीर गम्भीर व्यक्तित्व व निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओ ं पर गहरी पकड़ व संगठनात्मक समझ उन्हें संगठन में अलग पहचान देती है। पार्टी नेतृत्व यदि इन दो बड़े नामों से अलग हटकर यदि कुछ विचार करने की सोचेगा तो निश्चित ही प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा का नाम भी मुख्यमंत्री के रूप में उभर कर सामने आ सकता है। जहां तक थावरचंद गहलोत का सवाल है यदि पार्टी कोई जातिगत संदेश देने का मन बनाती है तो इन परिस्थितियों में गहलोत से बेहतर कोई नाम नहीं है। देखना दिलचस्प होगा की इन नेताओं में कौन बाजी मारता है।