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श्रद्धाजंलि : नहीं रहे वरिष्ठ पत्रकार साबिर अली

– देव श्रीमाली

ग्वालियर शहर के लगभग सबसे वयोवृद्ध पत्रकारों में से एक साबिर अली भी नही नही रहे। तीन दिन पहले तक मित्र पत्रकारों से मोबाइल के जरिये खैर खबर लेते रहे साबिर भाई की तबीयत परसो शाम ज्यादा नाशाद हुई । कल शाम उन्हें जेएएच के न्यूरो विभाग में दाखिल कराया गया लेकिन उनकी हालत नही सुधरी और आज सुबह आठ बजे वे फानी दुनिया से विदाई लेकर रूहानी दुनियां की तरफ कूंच कर गए।
साबिर अली मूलतः अलीगढ़ उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे । हालाँकि वे बचपन मे ही ग्वालियर आ गए थे क्योंकि उनके भाई सरकारी नौकरी में थे । लेकिन उन्हें अभी भी अपने गांव से बेहद लगाव था और वे अपने गांव जाते रहते थे और यहां आकर वहां के किस्से भी खूब सुनाते थे लेकिन वे थे खलिश ग्वालियरी । वे इसे ही अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि मानते थे ।

उन्होंने उच्च शिक्षा पाई और एडवोकेट भी बने । उन्होंने कुछ समय बकालत भी की लेकिन वह उन्हें रास नही आई । बजह बहुत छोटी थी । उसमें मुबक्कील से पैसे लेने के लिए झूठ बोलना पड़ता था। यह उन्हें अच्छा नही लगता था। सो उन्होंने कोर्ट से किनारा कर लिया । इसके बाद वे पत्रकारिता में रम गए। वे तब के दिग्गज पत्रकार बाबू शम्भूनाथ सक्सेना के संपर्क में आये तो ताउम्र उनके प्रति श्रद्धावान मानते थे । वे उनके अखबार निरंजन में काम करने लगे और बाबू जी से उनके पितृवत रिश्ते रहे । इसे वे अभी तक निभाते रहे । उनकी पुण्यतिथि पर वे हर वर्ष एक आयोजन भी करते थे जिसमें सब पत्रकारों को बुलाते थे।

साबिर अली संतोषी और सहज व्यक्ति थे । वे अपनी आर्थिक विपन्नता को हथियार नही बनाते थे बल्कि उसे सादगी की चादर में ढंके रहते थे । उन्होंने जीवन भर उसूलों की पत्रकारिता की । वे स्व माधव राव सिंधिया के भी नज़दीक रहे । उन्होंने ही हिंदुस्तान अखबार में उन्हें संवाददाता बनाने में मदद की हालांकि उसके संपादक चंदूलाल चंद्राकर से अली साहब के निजी संपर्क भी थे । बस इससे मिलने वाले कुछ पैसे ही उनकी गृहस्थी की गाड़ी खींचने का साधन थे । उन्होंने पदयात्री के रूप में ही अपनी पत्रकारिता की । यहां तक कि उन्होंने पूरा जीवन किराए के घर मे गुजारा लेकिन न तो वे कभी दुखी दिखे न आत्मग्लानि में । वे सदैव जोश से भरे रहते थे ।
साबिर अली साम्प्रदायिक सद्भाव में भरोसा रखते थे । राजमाता सिंधिया से उन्हें विशेष स्नेह मिलता था । हर धर्म और जाति के लोगो से उनके संपर्क थे । कट्टरता उनके आसपास भी नही फटकती थी । एक बार जब उनको ताजिया कमेटी की जिम्मेदारी दी गई तोउन्होने इसे मुस्लिमो की जगह लोक उत्सव बनाने पर जोर दिया तो कट्टरपंथियों ने उनका सिर फोड़ दिया । आखिरकार उन्होंने इस समिति से अपने को अलग कर लिया।

स्व माधवराव सिंधिया की मृत्यु के बाद हिंदुस्तान अखबार ने भी उन्हें पैसे भेजना बन्द कर दिए तो उनकी जिंदगी और कठिन हो गई । इस बीच शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने पत्रकारों के लिए पांच हजार रुपये की सम्मान निधि देने की घोषणा की तो मैंने उनका आवेदन भरा । लेकिन उसके लिए आयु की तस्दीक के लिए हायर सेकेंडरी की मार्कशीट की दरकार थी लेकिन किराए के मकानों के बदलने के फेर में उनके सभी डॉक्यूमेंट खो गए थे । मैंने जीवाजी विवि से रिकॉर्ड निकलवाकर उनसे प्रमाणपत्र लिया कि उन्होंने किस सन में किस कॉलेज से विधि स्नातक की परीक्षा पास की ।
इससे उनकी उम्र और योग्यता के खाने की पूर्ति हुई । और भी दिक्कतें थी लेकिन जनसम्पर्क विभाग में तब ग्वालियर में पदस्थ अपर संचालक डॉ एच एल चौधरी ने निजी तौर पर पत्र लिखकर अपनी गारंटी और संतुति भी की और वे पहले लॉट में सम्मान निधि पाने वाले पत्रकार बने । इससे वे बहुत खुश हो गए । ये उनके लिए संजीवनी जैसी थी ।
वे बीते दो वर्ष से बीमार रहने लगे थे । पहले उन्हें प्रोस्टेड की समस्या हुई फिर चक्कर आने की । एक बार वे गिर गए तो फिर आवाजाही कम कर दी । लेकिन वे लॉक डाउन में भी मोबाइल के जरिये सब मित्र पत्रकारों से संपर्क करके कुशल क्षेम पूछते और बचाव करने को भी कहते । बीते पखवाड़े ऐसा ही एक रूटीन काल आया था । वे राजेन्द्र श्रीवास्तव जी के निधन से दुखी थे लेकिन नही पता था कि उनके मुंह से – साबिर अली बोल रहा हूँ….कैसे हो देवश्री जी (वे मुझे प्रेम से इसी नाम से बुलाते थे)इसके बाद जल्दी जल्दी में डेढ़ दो मिनिट का संवाद होता था ) बस आखिरी बार सुनाई देगा।

साबिर अली पत्रकारिता के प्रति समर्पित व्यक्ति थे । वह मानते थे कि पत्रकार खुद भी उन बातों का निर्बहन करे जो सलाह खबरो के जरिये समाज को देता है । अब जब पत्रकारिता प्रोफेशन बन गया है और मीडिया उद्योग तब ऐसी पत्रकारिता संभव नही है लेकिन इसको लेकर साबिर अली ने अपनी पूरी उम्र काटी यह पूरी पत्रकार बिरादरी के लिए गर्व की बात भी है और अनुकरणीय भी ।
विनम्र श्रद्धांजलि

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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