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संघ प्रमुख की तरह मोदी क्यों दूर नहीं करते उम्र और पद के संशय को ?

प्रवीण दुबे

भारतीय जनता पार्टी के जन्मदाता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ मोहन भागवत द्वारा पिछले एक वर्ष के दौरान कम से कम पांच मौकों पर 75 की उम्र पूरी होने अथवा इसी तारतम्य में  दायित्व छोड़ने की बात अब खासा चर्चा का विषय बन गया है।

जुलाई 2025 में उन्होंने कहा था, ‘जब आपको 75 साल पूरे होने पर शॉल ओढ़ाई जाती है, तो समझिए कि दूसरों को मौका देने का समय आ गया है। आपको किनारे होना चाहिए।’ इस बार रविवार को मुंबई में उन्होंने कहा कि संघ ने उनसे उनकी उम्र के बावजूद काम जारी रखने को कहा है, लेकिन पद छोड़ने को कहा जाएगा तो वह तुरंत छोड़ देंगे।
अब सवाल यही है कि मोहन भागवत बार-बार रिटायरमेंट की बात क्यों कर रहे हैं? क्या यह प्रधानमंत्री की ओर एक वैचारिक संकेत है कि अब रिटायरमेंट पर गंभीरता से सोचने का वक्त आ गया है?
सीधे तौर पर इसे प्रधानमंत्री पर निशाना कहना ठीक नहीं लगता और अपने परिवार संगठनों पर  इस तरह से सार्वजनिक मंचों से कोई बात कहना संघ की परम्परा भी नहीं है।  दूसरा यह कि खुद डॉ मोहन भागवत 75 के हो चुके हैं अतः पद छोड़ने या रिटायरमेंट की बात उनपर भी लागू होती है।
सवाल वही कि आखिर संघ प्रमुख क्यों 75 की बात बार बार कह रहे हैं?  साफ है कि संघ प्रमुख एक तरफ भारतीय परम्परा को बताना चाहते हैं तो दूसरी ओर संगठन सर्वोपरि है उससे बड़ा कुछ नहीं यह भी समझाना चाहते हैं।
 
पहली बात अर्थात भारतीय परम्परा की स्थापना को केंद्र में रखते हुए देखें तो जुलाई 2025 में उन्होंने कहा था, ‘जब आपको 75 साल पूरे होने पर शॉल ओढ़ाई जाती है, तो समझिए कि दूसरों को मौका देने का समय आ गया है। आपको किनारे होना चाहिए।’
दूसरी बात अर्थात संगठन सर्वोपरि को केंद्र में रखते हुए देखें तो इस बार रविवार को मुंबई में उन्होंने खुद की उम्र और पद को लेकर कहा कि संघ ने उनसे उनकी उम्र के बावजूद काम जारी रखने को कहा है, लेकिन पद छोड़ने को कहा जाएगा तो वह तुरंत छोड़ देंगे।
साफ है यहां उन्होंने.75 की उम्र पूर्ण करने के बावजूद संगठन की इच्छा पर खुद के सरसंघचालक पद पर बने रहने के असमंजस को साफ किया।
 
इस दृष्टि से प्रधानमंत्री मोदी की उम्र 75 होने के बावजूद उनके पद छोड़ने अथवा रिटायरमेंट की बात की जाए तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या मोदी संगठन की इच्छा से पद पर हैं ?
 इस सवाल का जवाब तो अब सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत की तरह से प्रधानमंत्री मोदी को भी देश की जनता को बताना चाहिए।भले रिटायरमेंट का कोई औपचारिक बंधन न हो, लेकिन भारतीय परम्पराओं के अनुसार वैचारिक अपेक्षा तो मौजूद है ही। देश जानना चाहता है प्रधानमंत्री मोदी ने जो निर्णय आडवाणी, जोशी जैसे नेताओं को लेकर लिए उनके प्रति वे खुद अपने लिए  कितनी साफगोई रखते हैं।इस बारे में जितना जल्दी वे संशय दूर करेंगे उतना ही भाजपा के लिए बेहतर होगा।
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