Homeश्रद्धाजंलिस्मृति शेष : यारों के यार थे प्रोफेसर मिश्रा

स्मृति शेष : यारों के यार थे प्रोफेसर मिश्रा

स्मृति शेष

शिक्षाविद और छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व जनसंघ विचारधारा के प्रबल हस्ताक्षर रहे प्रफेसर योगेन्द्र मिश्र का शनिवार की देर रात्रि निधन हो गया । वे अब हमारे बीच नहीं रहे। वरिष्ठ पत्रकार ग्वालियर में लंबे समय तक उनके पड़ोसी रहे राकेश अचल ने अपने ही अंदाज में प्रोफेसर मिश्रा के जीवन से जुड़े प्रसंगों व उनके अलमस्त व्यक्तित्व कृतित्व पर लेख लिखकर उन्हें अपनी श्रध्दांजलि अर्पित की । शब्दशक्तिन्यूस उपरोक्त आलेख को बिना  किसी काट छांट के शब्दशः प्रकाशित कर रहा है। साथ ही प्रोफेसर मिश्र को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रहै है।

राकेश अचल
प्रोफेसर योगेंद्र मिश्रा नहीं रहे,उनके साथ ही एक सौम्य मुस्कान और एक अलमस्त व्यक्तित्व शून्य में विलीन हो गया .प्रो मिश्रा जन्में यूपी में थे लेकिन उनका कार्यक्षेत्र ग्वालियर ही रहा .वे यहीं पढ़े और यहीं उन्होंने सैकड़ों छात्रों को न सिर्फ पढ़ाया बल्कि उन्हें बाकायदा गढ़ा. उनके गधे छात्रों में से आज अनेक विधायक,मंत्री,और शीर्ष अधिकारी हैं. एक शिक्षक की ये सबसे बड़ी पूंजी होती है .
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करने वाले योगेंद्र जी अटल बिहारी वाजपेयी संस्कृति के जुझारू कार्यकार्ता थे और शायद इसीलिए उन्होंने अपना घर नहीं बसाया लेकिन उनके अपने घर में उनका पूरा कुनवा पाला-बढ़ा.प्रो मिश्रा राजनीति में आते तो शायद वे भी विधायक,मंत्री बन जाते लेकिन उन्होंने अध्यापन को अपने लिए चुना.सरकारी नौकरी की और संघ तथा भाजपा से जुड़ाव के कारण नौकरी गंवाना भी पड़ी.उनकी नौकरी अदालती संघर्ष के बाद वापस आयी .इस उठापटक ने भी प्रो ममिश्र की जीवन शैली को बदला नहीं .
एक जमाना था जब प्रो मिश्र का स्थायी अड्डा फूलबाग गुरुद्वारा के पास स्थित क्वालिटी रेस्टोरेंट होता था .रेस्टोरेंट के बाहर मिश्र जी का ऑटो हमेशा खड़ा मिलता था.लोग मिश्र जी के ऑटो को देखकर ही रेस्टॉरेंट में घुस जाते थे उनसे मिलने .मिश्र जी के पास उन्हें बौद्धिक खुराक के साथ पेटपूजा करने का अवसर भी मिल जाता था .मिश्र जी का आधा वेतन आटो और रिक्शे में ही उड़ जाता था ,लेकिन उन्होंने कभी इसकी फ़िक्र ही नहीं की .वे या तो पैदल चले या ऑटो पर .कार तो उन्होंने पिछले दशक में घर वालों के आग्रह पर खरीदी .
मिश्र जी से मेरा रिश्ता एक छात्र और शिक्षक का नहीं बल्कि एक पत्रकार और विचारक का था. वे अक्सर ग्वालियर की राजनीति से जुड़े मसलों पर हम सबका मार्गदार्शन करते थे. कभी-कभी तो वे अपने स्वभाव के परतिकूल जाकर भी अपने ही लोगों के बारे में बोल जाते थे. उन्होंने सीधे कभी किसी से टकराव मोल नहीं लिया लेकिन जिसके पीछे पड़े उसे उखाड़कर ही माने .उन्होंने अपनी लड़ाइयां खुद लड़ीं राजनीति ने उनका साथ कम ही दिया. वे मांगते नहीं थे और हरजाई राजनीति उन्हें अपने आप कुछ देती नहीं थी .वरना उन्होंने तो डॉ नरोत्तम मिश्रा जैसे छात्र भी तैयार किये ही थे .
सत्ता में आने के बाद वे भाजपा के तमाम युवा तुर्कों के बदले स्वरों से हैरान ही नहीं बल्कि खिन्न भी थे .फिर चाहे वो प्रभात झा हों या और कोई .अनेक नाम हैं इन्होने उन्हें निराश किया .लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से कभी किसी की निंदा नहीं की .वे अध्येता थे और खूब पढ़ते-लिखते थे मै 8 साल उनका निकट पड़ौसी रहा ,उस दौर में मैंने उन्हें निकट से जाना,समझा .मिश्रा जी ने भले विवाह नहीं किया लेकिन उनके संरक्षण में उनके कुनवे के न जाने कितने बच्चों,रिश्तेदारों ने अपना जीवन संवारा .वे जन्मजात प्रेमी थे,उनका प्रेम आवारा कुत्तों से भी उतना ही था जितना की हम जैसे लोगों से .वे अपने घर में पलने वाले आवारा कुत्तों को लेकर अनेक बार अपने पड़ौसियों तक से भिड़ जाते थे .
प्रो मिश्र ‘होम सिकनेस’ का सबसे बड़ा उदहारण थे. उनकेलिए अपना गांव और घर ही दुनिया थी. वे न देश घूमे और न दुनिया लेकिन उनके पास सूचनाओं का अकूत भण्डार था.उन्हें पहनने-ओढ़ने का बी बहुत ज्यादा शौक न था ,जो मिला सो पहन ली,जो मिला सो कह लिया .,मै अक्सर इससे लाभान्वित होता रहता था. आग्रह के कच्चे मिश्र जी हर सार्वजनिक और निजी कार्यक्रम की शोभा आते थे .उनमें अहंकार नाममात्र को नहीं था लेकिन ठसक भी पूरी थी,जिससे रूठे उससे रूठे और जिस पर फ़िदा हुए उसे कभी रूठने नहीं दिया .अक्सर लोग अपनी राजनीतिक विचारधारा और सम्पर्कों से फलीभूत हो जाते हैं किन्तु प्रो मिश्रा इसका अपवाद थे .वे न कहीं कुलपति बने और न कुल सचिव ,उन्होंने सेवानिवृत होने के बजाय कुछ दिनों तक एक स्थानी शैक्षणिक संस्थान में नौकरी भी की लेकिन वहां भी वे ज्यादा दिन ठीके नहीं क्योंकि उनके स्वभाव में जो फक्क़ड़पन था वो उनके आड़े आता रहा . प्रो मिश्रा जिस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे उसमें भी उन जैसे लोग गिनती के ही थे. उन्होंने विपरीत राजनितिक विचारधारा के लोगों के साथ सत्सांग करने में कभी कोई परहेज नहीं किया .वे निर्व्यसनी थे ,उनका एक ही व्यसन था वो था गप्पबाजी .अब शहर के लोग इससे वंचित रहेंगे .मिश्रा जी का स्थान अब कोई दूसरा फक्क्ड़ गपबाज नहीं ले सकेगा .विनम्र श्रृद्धांजलि .

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments