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स्मृति शेष- राहत इंदौरी : अब ना मैं हूँ ना बाक़ी हैं ज़माने मेरे, फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे!!!

            हितेन्द्र सिंह भदौरिया        

राहत सर ये क्या बात रही, आप राहत के बजाय दर्द बांट कर चल दिए। आपसे ऐसी उम्मीद तो कतई न थी। शायद आपको अपना ये शेर याद आ गया होगा…” मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ, यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे..! ” और इसे गुनगुनाकर हम सबके बीच से रुखसत हो लिए। राहत सर सुन रहे हो ! इस उम्दा अशआर से मुझ जैसे आपके बहुत कम प्रशंसक इत्तेफाक रखते हैं। आपने यह सोच कैसे लिया कि “यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे..” । मेरे महबूब शायर आप तो अदबी हिंदुस्तान की रग-रग में समाए हो। हमें तो आपका वही अंदाज भाता रहा है ” सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है..” । हिंदुस्तानी तहजीब के अनमोल रतन आपने यह शेर क्या इसी दिन के लिए लिखा था ? …. “मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया , इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए ” सो हम सबकी आंखों में सारे समुंदरों का पानी उड़ेलकर और अदबी महफिलों को ऑंसू बहाने के लिए छोड़कर चल दिए जनाब।
आपको ये भी नहीं पता आसमां की जानिब मुँह कर जब आप अशआर पेश करते थे तो हमारी श्वांसे तब तक थमी रहतीं, जब तक शेर मुकम्मल नहीं हो जाता। मुशायरे में देर से आने वाले अदब पसंद लोगों को तालियों की घनघोर गड़गड़ाहट से ही अंदाजा लग जाता कि राहत साहिब की प्रस्तुति चल रही है। तनिक तो रहम किया होता अपने इन सामईनों पर। जिसने भी आपको सुना है वह आपको भुलाए भी तो कैसे…हम सबकी इन भावनाओं को समझकर ही आपने यह अशआर रचा होगा …. “इक मुलाक़ात का जादू कि उतरता ही नहीं,
तिरी ख़ुशबू मिरी चादर से नहीं जाती है ….”
आप तो चले गए साथ में मुशायरों व अदबी महफिलों की रौनक भी ले गए। मेलों में सजने वाले मुशायरों से लेकर बेनल अफ़गामी अदबी महफिलों के मंच पर हर आँख आपको तलास करेगी।
आप हम सबके दिलों में महफूज हैं , जिंदा हैं।
अलविदा राहत सर….आपको आपके ही एक शेर से सादर श्रद्धांजलि..
अब ना मैं हूँ ना बाक़ी हैं ज़माने मेरे,
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे!!!

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