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सी आई ए के खुफिया दस्तावेज से सनसनीखेज  खुलासा ,पंजाब कश्मीर को देश से तोड़ने के पुराने एजेंडे पर भारत के कम्युनिस्ट 

प्रवीण दुबे

क्या वर्तमान में जारी किसान आंदोलन की आढ़ में लहराए जाने वाले खलिस्तान व कम्युनिस्ट पार्टी के लाल झंडे तथा 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय दिवस पर तिरंगे के अपमान और हिंसाचार के पीछे देश को टुकड़े टुकड़े करने की वामपंथी साजिश ही जिम्मेदार है ? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसको भली प्रकार जानते समझते हैं इसी कारण से इस आंदोलन को ज्यादा महत्व नहीं दे रहे हैं । यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब मिलता है प्रसिद्ध लेखक संदीप देव की पुस्तक “कहानी कम्युनिस्टों की ” में हाल ही में इस पुस्तक का नवीन संस्करण का प्रकाशन हुआ है और इसकी प्रस्तावना लिखी है प्रसिद्ध पत्रकार विचारक रामबहादुर राय ने।

इस पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक  182 पर हाल ही में अमरीकी खुफिया एजेंसी सी आई ए द्वारा जारी एक दस्तावेज प्रस्तुत किया गया है। इसका शीर्षक है पोलिटिकल कम्युनिस्ट एक्टिविटीज
यूं तो यह दस्तावेज आजादी के बाद का है लेकिन इससे जो कुछ खुलासा होता है उससे वर्तमान के किसान आंदोलन की आड़ में में देश तोड़ने के पुराने वामपंथी षड्यंत्र का पर्दाफाश होता है।
इस दस्तावेज में सोवियत संघ के इशारे पर भारतीय  कम्युनिस्टों द्वारा कश्मीर को भारत से तोड़ने के लिए शेख़ अब्दुल्ला को सहायता पहुंचाने की बात कही गई है।
इसके अलावा हथियार के बल पर पंजाब को तोड़कर अलग सिखिस्तान और बंगाल को तोड़कर अलग दार्जलिंग बनाने की साजिशों का खुलासा हुआ है।
अपनी पुस्तक “कहानी कम्युनिस्टों की” के नवीन संस्करण में संदीप देव लिखते हैं की सी आई ए का दस्तावेज 1952 में भारत कश्मीर चीन और सोवियत संघ हमारे देश को टुकड़ों में बांटने की साजिश का खुलासा करता है।
लेखक लिखते हैं की कश्मीर का भारतीय गणराज्य में विलय के खिलाफ काम कर रहे शेख अब्दुल्ला को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केवल इसलिए मदद कर रही थी ताकि भविष्य में स्वतंत्र कश्मीर सोवियत संघ का हिस्सा हो जाए।
इस रिपोर्ट में कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भारतीय सेना के अंदर विद्रोह पैदा करने और असन्तुष्ट सैनिकों को ( ठीक उसी प्रकार जैसे की वर्तमान में असन्तुष्ट किसान) की मदद से भारत को तोड़ने की साजिश का भी पता चलता है।
लेखक ने पाकिस्तान के पेशावर से प्रकाशित उर्दू दैनिक शाहबाज का ज़िक्र करते हुए लिखा है की इसके 4 अगस्त से 25 सितंबर 1952 के बीच प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था की के कम्युनिस्ट सस्त्र क्रांति के जरिए  भारतीय राज्यों को तोड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं। इस सशस्त्र क्रान्ति के लक्ष्य में भारतीय सेना को भी कमनिस्टों ने शामिल करने का प्रयास किया था  रिपोर्ट बताती है की भारतीय सेना में शामिल  कम्युनिस्ट और सिक्खों का एक समूह विद्रोह करने के लिए तैयार बैठा था। इसका लक्ष्य पूर्वी पंजाब को तोड़कर अलग सिखिस्तान देश का निर्माण करना था।
यह सम्पूर्ण दस्तावेज आज के भारतीय परिपेक्ष्य में खासकर किसान आंदोलन की आड़ में दिल्ली से लेकर कनाडा और अमेरिका तक लहराए जा रहे खलिस्तान के झंडे व 26 जनवरी के राष्ट्रीय दिवस पर तिरंगे का अपमान व इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में लाल झंडाछाप राजनीतिक दलों व उनसे सम्बंधित कथित एनजीओ की सक्रियता को देखते हुए बड़ी भूमिका है। यह दस्तावेज इस बात को इंगित कर रहा है की भारत को तोड़ने का विदेशी षडयंत्र और उसमें कमनिस्टों की सहभागिता अभी भी जारी है। देश में एक राष्ट्रवादी देशभक्त सरकार को मजबूती से कायम होते देख यह अपने पुराने एजेंडे को जीवित करने की पुरजोर कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। मोदी सरकार इनकी यह काली करतूत समझ चुकी है यही वजह है की वह नाराज किसानों को तो गले लगाने तैयार है लेकिन किसानों के बीच घुसपैठ करने वाली देशतोड़ू ताक़तों से वह सख्ती से निपटने की रणनीति पर काम कर रही है और यह एक अच्छी बात है।
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