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आरएसएस बैठक को लेकर गलाकाट स्पर्धा ने मीडिया को बनाया हंसी का पात्र

प्रवीण दुबे

चित्रकूट में आयोजित आरएसएस की बैठक को लेकर तमाम विरोधाभासी घबरों से अख़बार उनसे जुड़ी मीडिया वेबसाइट और सोशल मीडिया भरा पड़ा है। एक समय वह भी था जब संघ को अछूत संगठन मानकर तमाम मीडिया हाउस उसे अपने समाचार पत्रों में या तो स्थान ही नहीं देते थे या देते भी थे तो नकारात्मक छवि को प्रस्तुत किया जाता था। आज हालात ठीक विपरीत हैं आरएसएस की खबरों को प्राथमिकता से प्रकाशित करने को लेकर

देश के विविध प्रकार के मीडिया में गला काट प्रतिस्पर्धा देखी जा सकती है। इस स्पर्धा की दौड़ में यह भी ख्याल नहीं रखा जा रहा है कि आखिर आरएसएस जैसे संगठन की अपनी कुछ संगठनात्मक रीतियां नीतियां व सिद्धांत भी हैं। जो खबर प्रकाशित की जा रही है वो इस कसौटी पर खरा उतरती भी है या नही ?  चित्रकूट की ही बात करें तो जारी संघ बैठक देश विदेश के मीडिया में छाई हुई है लेकिन जो कुछ भी इस बैठक को लेकर लिखा या कहा जा रहा है उसे कम से कम संघ की कार्यशैली कहना कतई  सही नहीं कहा जा सकता । सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है की आरएसएस की इस प्रकार की अखिल भारतीय बैठकों का पहले से तय पूर्ण एजेंडा होता है जिसमें संगठन को कैसे  मजबूत व कल्याणकारी बनाया जाए इसपर केंद्रित चर्चा प्राथमिकता से होती है। चूंकि बैठक पूर्णतः संगठनात्मक बिंदुओं पर केंद्रित होने की वजह से इसमें  मीडिया के प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती। मीडिया तक जो बात पहुंचाना होती है संघ द्वारा उसके लिए विधिवत संवाददाता सम्मेलन आमंत्रित किया जाता है।  जैसा की हमने शुरुआत में लिखा है कि संघ गतिविधियों को हाइलाइट करने की अंधी दौड़ के कारण मीडिया संघ द्वारा विधिवत जारी प्रेसनोट की जगह मनगढ़ंत समाचार का प्रकाशन शुरू कर देता है। जैसा की अभी चित्रकूट बैठक को लेकर किया जा रहा है। इन खबरों में सच्चाई कम और सूत्रों के नाम पर कयास ज्यादा होता है। यह सही है कि इस वक्त देेेश में सत्तासीन राजनीतिक दल भाजपा का संघ से सीधा सम्बन्ध है साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने शुरुआती जीवन में संघ के पूर्णकालिक अर्थात प्रचारक रहे हैं। लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही सच है कि संघ अपनी स्थापना के समय से आज तक एक गैर राजनीतिक संगठन के रूप में कार्य करता रहा है। उसका भाजपा की संगठनात्मक अथवा सत्ता से जुड़ी गतिविधियों अथवा योजनाओं मेंं सीधा कोई दखल नहीं होता। चूंकि संघ राष्ट्रहित के मुद्दों को प्रथमिकता देता है अतः इन मुद्दों पर मंथन के साथ ही सुझावात्मक प्रस्ताव पास करके सत्तासीन राजनीतिक दलों का ध्यानाकर्षित करना उसकी संगठनात्मक गतिविधियों का ही भाग है। अब जो लोग संघ को केवल बाहर से ही जानते समझते हैं जिसमें कि मीडिया का भी एक बहुत बड़ा वर्ग शामिल है इस  गतिविधि को राजनीतिक मंथन से जोड़कर भाजपा को दिशा निर्देश देने वाला मानकर मनगढंत खबरों का प्रकाशन प्रारंभ

कर देते हैं, जैसा कि वर्तमान में भी उत्तरप्रदेश चुनाव ,धर्मांतरण ,चंपतराय आदि को लेकर लिखा व कहा जा रहा है यह न केवल हास्यास्पद है बल्कि मीडिया की दृष्टि से भी ठीक नहीं है। अब चित्रकूट बैठक को लेकर सूत्रों के हवाले से  चंपतराय को डांट फटकार व संघ भाजपा समन्वय के कार्य  को देख रहे व्यक्ति को हटाने व दूसरे की नियुक्ति की बात मीडिया में जोर शोर से जारी है। जो लोग संघ को जानते व समझते हैं उन्हें भली प्रकार पता है कि संघ में न तो किसी को सार्वजनिक बैठक में   डांटने फटकारने की पध्दति है न वहां किसी को हटाने बनाने की परंपरा वहां तो देश काल परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्था परिवर्तन होता है। जहां तक चंपतराय को डांट फटकार का प्रश्न है तो संघ व विहिप के लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया पूरा जीवन बेदाग तपस्वी जैसा त्याग करने वाले चंपतराय संघ के देवदुर्लभ कार्यकर्ताओं के वरिष्ठतम सदस्यों में से एक हैं। संगठन उनपर नाराज होगा,डांट लगाएगा या फिर उनपर सन्देह करेगा ऐसा कदापि सम्भव नहीं हां सम्बंधित विषय पर चर्चा अवश्य हो सकती है उसे सूत्रों के हवाले से कुछ भी लिख देना मीडिया की छवि को बिगाड़ने जैसा महापाप कहा जा सकता है। ऐसा लगता है कि गलाकाट स्पर्धा और अध्ययन की कमी ने आजकल की पत्रकारिता को बेहद नुकसान पहुंचाया है।   संघ हो या फिर कोई अन्य संगठन अथवा राजनीतिक दल पत्रकारों को पहले उसकी रीतियों नीतियों को भली प्रकार समझने के लिए जहां उसके अध्ययन की जरूरत है वहीं यथार्थ में उसे देखने के लिए उसके नजदीक जाने की भी आवश्यकता है बड़े दुख की बात है कि आजकल खाली समय में न तो अध्ययन है न निकट जाने की लालसा, गूगल आधारित ज्ञान और सूत्रों के हवाले से कुछ भी लिखने की कला ने मीडिया को सच से कोसों दूर कर दिया है।
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