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चंद्रयान 2 के चांद पर उतरने में कुछ घण्टे बाकी, बनेगा इतिहास, देशभर में बेसब्री से हो रहा इंतजार

Chandrayaan-2 Landing: हिन्दुस्तान चांद की धरती पर इतिहास रचने की दहलीज पर खड़ा है. आज देर रात 1 बजकर 55 मिनट पर चंद्रयान 2 चांद की धरती पर लैंड करेगा. इसी के साथ भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला पहला देश बन जाएगा. इस बेहद खास क्षण के गवाह बनने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसरो सेंटर में मौजूद रहेंगे.पहली बार चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला भारत का चंद्रयान भी हीलियम 3 की तलाश करेगा. अगर भारत इस कोशिश में कामयाब रहा तो ये एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी. एक अनुमान के मुताबिक हीलियम 3 से करीब 500 साल तक ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है. अनुमान है कि चांद पर 10 लाख टन हीलियम 3 मौजूद है, एक टन हीलियम 3 की कीमत 5 अरब डॉलर आंकी जाती है. यानी हीलियम 3 न सिर्फ भारत की ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करेगा बल्कि आर्थिक तौर पर भारत को मजबूत बनाएगा.

चांद की धरती पर लैंडिंग के बाद लैंडर से बाहर रोबार प्रज्ञान निकलेगा, जो चांद की सतह पर घूमेगा. प्रज्ञान संस्कृत के ‘ज्ञान’ शब्द से बना है. 25 किलो का रोवर प्रज्ञान 6 पहिया रिमोट कार जैसा है. लैंडर विक्रम की सॉफ्ट लैंडिंग के बाद प्रज्ञान अलग होगा. लैंडर से निकलकर प्रज्ञान चांद पर 15 दिन रहेगा और चांद की सतह पर 500 मीटर तक चलेगा. प्रज्ञान के पहिये अशोक चक्र और इसरो के निशान छोड़ेंगे. रोवर प्रज्ञान 500 मीटर चांद की सतह पर चलेगा. इसकी की रफ्तार 1 सेमी./सेकेंड होगी.

प्रज्ञान ड्रिल करके चांद की मिट्टी भी निकालेगा और मिट्टी का विश्लेषण करके डाटा जमा करेगा. रोवर प्रज्ञान एक रोबोट है जिसका वजन 27 किलो है और यही है पूरे मिशन की जान है. इसमें 2 पेलोड हैं. रोवर प्रज्ञान उस जानकारियों को विक्रम लैंडर को भेजेगा. लैंडर उस डाटा को ऑर्बिटर पर भेजेगा और फिर ऑर्बिटर उसे इसरो सेंटर भेजेगा. 15 मिनट बाद डाटा इसरो सेंटर आने लगेगा.

इसरो प्रमुख के. सिवन ने बताया है कि इसके कामयाब होने की गुंजाइश सिर्फ 37 फीसदी है, क्योंकि चांद के जिस दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-2 को उतरना है. वो बेहद खतरनाक है. दरअसल लैंडिंग की संभावित सतह पर ढेरों गड्ढें, पत्थर और धूल है. लैंडिंग के वक्त प्रोपल्शन सिस्टम ऑन होन से धूल उड़ेगी. डर से सोलर पैनल पर धूल जमा हुई तो पावर सप्लाई पर असर पड़ेगा. धूल से ऑनबोर्ड कंप्यूटर सेंसर्स पर असर पड़ सकता है. लैंडिंग के वक्त मौसम भी बड़ी मुसीबत बन सकता है. चांद के दूसरे हिस्सों के मुकाबले यहां ज्यादा अंधेरा रहता है. इसलिए भी कोई देश यहां अपना मिशन नहीं भेजता.

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