सोमवार की शाम भाजपा द्वारा जब यह खबर जारी की गई की पार्टी। के कद्दावर नेता अनूप मिश्रा चुनाव प्रचार के लिए मेहगांव जाएंगे और केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र तोमर ग्वालियर में ब्राह्मण समाज के सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होंगे ,तो राजनीति में थोड़ी सी भी रुचि रखने वालों को बड़ा अटपटा सा महसूस हुआ। ऐसा इसलिए की अनूप मिश्रा को एक बड़ा ब्राह्मण नेता माना जाता है दूसरी ओर नरेन्द्र तोमर को ठाकुर नेता होने का ओहदा प्राप्त है। इस स्थिति में देखा जाए तो जब ग्वालियर में चुनाव को लेकर ब्राह्मण सम्मेलन होने जा रहा था तो उसमें एक बड़े ब्राह्मण नेता के नाते अनूप मिश्रा का नाम अवश्य होना चाहिए था। यदि वे चुनाव प्रचार में नहीं होते अथवा कहीं व्यस्त होते तो यह बात उतनी अटपटी नहीं लगती। सूत्रों का कहना है की ब्राह्मण समाज के बीच भी इस बात का गलत मेसेज गया है । समाज के लोग यह समझ नहीं पा रहे की जब ग्वालियर में ब्राह्मण सम्मेलन था तो अनूप का कार्यक्रम मेहगांव क्यों रखा गया ? एक सवाल यह भी उठ रहा है की मिश्रा को मेहगांव भेजने और ग्वालियर में ब्राह्मण सम्मेलन का कार्यक्रम किसने तय किया ? क्या इसकी अनुमति प्रदेश अध्यक्ष ने दी थी ? हालांकि अभी। इसकी जानकारी नहीं है। लेकिन चुनाव के समय राजनीति के वशीभूत होकर इस तरह के कार्यक्रम तय करने से पार्टी को लाभ कम नुकशान ज्यादा उठाना पड़ता है। हुआ भी वही अनूप मिश्रा ने मेहगांव कार्यक्रम से भी दूरी बना ली। हालांकि श्री मिश्रा के कार्यालय से यह बताया गया की उनकी तबियत खराब होने की वजह से वे मेहगांव नहीं गए। इसमें कितनी सत्यता है यह तो बाद में पता लगेगा लेकिन इस घटनाक्रम के बाद लोग यह मान रहे हैं की अनूप मिश्रा ने उनके साथ की जा रही राजनीति को भांप लिया और इसी वजह से आज के अपने निर्धारित मेहगांव दौरे पर नहीं गए। उधर सूत्रों का कहना है की अनूप मिश्रा के चुनाव प्रचार में न जाने की बात जब ज्योतिरादित्य सिंधिया को पता लगी तो उन्होंने तुरंत श्री मिश्रा को फोन लगाया फोन पर उनकी अनूप से क्या बात हुई इसका पता नहीं चल सका है। फिलहाल ग्वालियर में ब्राह्मण सम्मेलन का आयोजन करना और उससे अनूप मिश्रा जैसे वजनदार ब्राह्मण नेता को दूर रखने की रणनीति से भाजपा के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है।
क्या अपने साथ हो रही राजनीति को भांप गए अनूप इस कारण मेहगांव से बनाई दूरी
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