Homeप्रमुख खबरेंविश्वास नहीं होता प्रभातजी अब कभी नहीं आएंगे

विश्वास नहीं होता प्रभातजी अब कभी नहीं आएंगे

प्रवीण दुबे

भाजपा को कार्यकर्ता आधारित राजनीतिक दल कहा जाता है सामान्य सा कार्यकर्ता कैसे अपनी निष्ठा, कार्य कुशलता ,समर्पण के बूते सफलता की सीढियां चढ़ते हुए राष्ट्रीय चेहरा बन जाता है प्रभात जी उसका बड़ा उदाहरण कहे जा सकते हैं।
बिहार में जन्मे प्रभात झा ने ग्वालियर को अपनी कर्मभूमि बनाया था और यहीं के पीजीवी कॉलेज से शिक्षा पूर्ण करने के दौरान ही उनके व्यक्तित्व की खूबियों को कुशल संगठनकर्ताओं जिनके कि वे संपर्क में आए उन्होंने परखा और उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के लगातार निकट रहे प्रभात जी की रुचि  और स्वभाव को परखते हुए उन्हें पत्रकारिता की ओर प्रेरित किया गया। श्री झा ने सामाजिक जीवन में पत्रकारिता के माध्यम से अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि उनका चेहरा जनता की जन कल्याणकारी आवाज बनकर उभरा।
इसी के साथ प्रभातजी ने राजनीतिक क्षेत्र में कदम आगे बढ़ाया ,वो ऐसा समय था जब पार्टी के सामने अनेक वैचारिक दुश्वारियों के साथ संसाधनों की बेहद कमी थी।
प्रभात झा ने कभी भी तमाम परेशानियों के सामने घुटने नहीं टेके और संगठन के बताए कार्यों में जुटे रहे। न खाने की चिंता न नाश्ते की कार्यकर्ताओं के बीच ही पूरा दिन गुजार देना प्रभात जी की दिनचर्या में शुमार था।
उन्हें जो काम दिया जाता वे अपना सर्वस्व समर्पित करके उसे पूरा करने में जुटे दिखाई देते थे,
कौन भूल सकता है 1992 के उस प्रसंग को जब अयोध्या में रामभक्त कारसेवकों ने विवादित ढांचे को ढहा दिया था,एक वैचारिक समाचार पत्र के पत्रकार के रूप में प्रभात झा कवरेज करने अयोध्या में ही थे,
जैसे ही ढांचा गिरा देश में तनावपूर्ण वातावरण बन गया लेकिन प्रभातजी को अपने समाचारपत्र में कवरेज की चिंता थी कड़कड़ाती सर्दी के बावजूद श्री झा 400 किलोमीटर दूर से मोटरसाइकिल पर ही ग्वालियर के लिए निकल दिए और  तमाम परेशानियों के बावजूद देर रात्रि ग्वालियर पहुंचकर खबर लिखी और एक्सक्लूसिव फोटो लगाए,
सुबह उनका समाचारपत्र कवरेज में सबसे आगे था और सभी पत्रकारों के साथ संघ,भाजपा के बीच प्रभात झा के अद्वितीय कवरेज को सराहा गया।
श्री झा कुशल संगठनकर्ता भी थे और उनकी इसी कार्यकुशलता को देखते हुए उन्हें पहले भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष फिर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया,
उनकी राजनीतिक प्रतिभा को पहचानते हुए पार्टी ने उन्हें दो बार राज्यसभा सांसद बनने का मौका दिया राजनीति में आने के बावजूद उनकी वैचारिक पत्रकारिता सदा जीवंत बनी रही यही वजह रही कि राजनीतिक व्यस्तताओं के बावजूद उन्होंने दर्जनों पुस्तकों का लेखन किया वे लंबे समय तक भाजपा की वैचारिक मासिक पत्रिका कमल संदेश के संपादक रहे।
उनका संपूर्ण जीवन पार्टी और विचार के लिए इस कदर समर्पित था कि उन्होंने कभी भी अपनी व्यवस्थित दिनचर्या का ख्याल नहीं किया यही वजह रही कि उनके शरीर को असमय ही बीमारियों ने घेर लिया ,
मधुमेह की गंभीर स्थिति के बावजूद वे अंतिम समय तक संगठन के कार्यों में लगे रहे,हाल ही में हुए चुनाव के समय भी पार्टी कार्यकर्ताओं का उन्होंने मार्गदर्शन किया।मधुमेह के कारण अंगूठे में हुए घाव पर पट्टी बांधकर , पीढ़ा सहते हुए प्रभातजी ने संगठन के प्रति सतत कियाशील रहने का बड़ा संदेश दिया है उन्हे शब्दशक्ति न्यूज की ओर से सादर श्रद्धांजलि। ॐ शांतिः।
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