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संघ का शताब्दी वर्ष : तमाम उतार चढाव के बाद भी अनवरत जारी है संघ यात्रा

–रमेश शर्मा

भारत राष्ट्र के परम वैभव की पुनर्प्रतिष्ठा का संकल्प लेकर अस्तित्व में आये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर लिया है । विजयदशमी पर आयोजित अपने स्थापना दिवस समागम में सरसंघचालक डा मोहन जी भागवत ने देशवासियों का ध्यान उन सभी विन्दुओं पर आकर्षित किया जो राष्ट्र की संप्रभुता और परमवैभव के लिये आवश्यक हैं। इसमें व्यक्ति, परिवार और समाज की सुदृढता के साथ प्रकृति और पर्यावरण से समन्वय के आधार भूत विन्दु भी शामिल हैं ।
वर्ष 1925 की विजय दशमीं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नागपुर से अपनी यात्रा आरंभ की थी । प्रतिवर्ष इसी दिनअपने स्थापना दिवस पर संघ गरिमामय आयोजन करता है । जिसमें आगामी वर्ष की संकल्पना होती है । अपनी शताब्दी जीवन यात्रा में संघ ने बहुत उतार-चढ़ाव झेले हैं फिर भी यात्रा अनवरत रही । संघ का स्वरूप अब वैश्विक है । यह संसार का सबसे विशाल संगठन है । अपनी इतनी लंबी जीवन यात्रा के बाद भी संघ के अपने मूल सिद्धांत में कोई अंतर नहीं आया। सामाजिक साँस्कृतिक मूल्यों का पुनर्जागरण और भारत राष्ट्र के परम वैभव की  ही संघ का मुख्य ध्येय है । संघ के शताब्दी वर्ष प्रवेश के स्थापना दिवस पर सरसंघचालक डा मोहन जी भागवत का उद्बोधन में भी इसी संकल्पना का आव्हान है । उन्होंने अपने संबोधन में कुल चौबीस विन्दुओं को छुआ। इनमें भारत राष्ट्र की आधारभूत मान्यता क्या है कौन सी विभूतियाँ जीवन का आदर्श हो सकती हैं, व्यक्ति निर्माण केलिये प्राथमिकता क्या है, कौन राष्ट्र मित्र हो सकते हैं और कौन राष्ट्र शत्रु । इनका विवेचन करके सरसंघचालक जी ने स्वगौरव का स्मरण रखने, नागरिक अधिकार और कर्तव्य के प्रति जागरुकता, सामाजिक समरसता, समाज की सामूहिक शक्ति और सुदृढता के साथ पर्यावरणसे समन्वय बनाकर जीवन शैली विकसित करने का आव्हान किया ।
किसी भी राष्ट्र की समद्धि और संपन्नता के केन्द्र में समाज, समाज के केन्द्र में परिवार और परिवार के केन्द्र में व्यक्ति होता है । यदि श्रेष्ठतम व्यक्तियों से संपन्न परिवार और समाज बनेंगे तो ही राष्ट्र की यात्रा श्रेष्ठतम होती है । श्रेष्ठतम व्यक्तित्व निर्माण केलिये शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कार के साथ कुछ आदर्श विभूतियाँ भी होते हैं जिनकी जीवन यात्रा व्यक्ति और समाज को सदैव प्रेरणा देती है । व्यक्ति का नियंत्रण परिस्थतियों पर नहीं होता । लेकिन उन परिस्थियों कोई व्यक्ति अपना कर्म कर्तव्य क्या निर्धारित करता है, इस पर सफलता निर्भर करती है । सरसंघचालक जी ने अपना संबोधन उन आदर्श चरित्रों से आरंभ किया जो कालजयी हैं और हर परिस्थिति में प्रेरणादायी । उन्होंने तीन आदर्श नाम गिनाये । इनमें सबसे पहले लोकमाता अहिल्याबाई का। पुण्यश्लोक देवि अहिल्याबाई केवल शासक नहीं हैं। उनका व्यक्तित्व विन्दु से विराट बना था । उनका व्यक्तित्व और कृतित्व भारत राष्ट्र की उस महान परंपरा का प्रतिबिंब हैं जिसमें नारी को प्रथम वंदनीय माना, शिक्षा शक्ति और संस्कार का आधार माना। उसी अनुरूप सरसंघचालक डा मोहन जी ने सबसे पहला नाम एक ऐसी आदर्श नारी स्वरूप का लिया जिन्होंने परिवार प्रकृति और समाज से समन्वय बनाकर भारत भर के मान विन्दुओं और साँस्कृतिक केन्द्रों को पुनर्प्रतिठित करने केलिये अपना जीवन समर्पित किया । सरसंघचालक जी ने दूसरा नाम स्वत्व और साँस्कृतिक गौरव की रक्षा केलिये सशस्त्र संघर्ष का उद्घोष करने वाले वनवासी नायक बिरसा मुण्डा का लिया और तीसरा नाम पूरे भारत में स्वाभिमान चेतना केलिये प्रवचन और सत्संग का अभियान चलाने वाले स्वामी अनुकूलानंद जी का लिया । इसके साथ विषमताओं के बीच सांस्कृतिक गौरव को प्रतिष्ठित करने केलिये आर्य समाज का उल्लेख किया । ऐसी असंख्य विभूतियाँ हुई हैं भारत में । सरसंघचालक जी ने प्रतीक रूप में तीन नाम लेकर उन सभी का स्मरण कराया है ताकि समाज यह समझ सके कि उन्हें किनको अपना आदर्श मानना है । यदि समाज के बीच अपात्र चेहरों का महिमामंडन होगा तो समाज और राष्ट्र की वैभव यात्रा प्रभावित होगी । भारत राष्ट्र के परम गौरव का संकल्प पूरा करने केलिये आवश्यक है कि भारत राष्ट्र के लिये समर्पित विभूतियाँ ही आदर्श बनें।
सरसंघचालक जी ने अपने संबोधन में जहाँ समाज सै सुदृढ होने का आव्हान किया वहीं राष्ट्र शत्रुओं से भी सचेत किया। किसी भी राष्ट्र और समाज को तीन प्रकार के लोग हानि पहुंचाते हैं। एक तो स्वार्थी लोग । जो अपने निजी हित या लालच केलिये किसी भी सीमा तक गिर सकते हैं। स्वार्थी लोग जब वे अपना हित साधन कर रहे होते हैं तब वे विचार ही नहीं करते हैं कि उनके स्वार्थ भाव से समाज और राष्ट्र का क्या अहित होगा । दूसरे वे दुर्जन प्रवृत्ति के लोग होते हैं जिनका सोच सदैव नकारात्मक और ईर्ष्यालु होता है । इनसे भी समाज और राष्ट्र का अहित होता है । और तीसरे वे राष्ट्रशत्रु होते हैं योजना और षड्यंत्र से राष्ट्र को संकट पैदा करते हैं । वे समाज में भ्रातियाँ उत्पन्न करते है । समाज के स्वार्थी और दुर्जनों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और राष्ट्र का अहित करते हैं। सरसंघचालक जी ने शाताब्दी यात्रा के अपने इस संबोधन में इन तीनों प्रकार की मनोवृत्तियों का स्पष्ट उल्लेख किया । उन्होंने दुर्जनों और स्वार्थी तत्वों से जहाँ सावधान रहने का आव्हान किया वहीं उन्होंने समाज से सुदृढ होकर उन तत्वों से सामना करने का आव्हान किया जो योजना पूर्वक राष्ट्रचिति के विरुद्ध काम कर रहे हैं। उन्होंने अपने संबोधन में इन्हें “डीप स्टेट” “बोकिल्स” और “कल्चरल मार्क्सिस्ट” कहकर संकेत किया । सरसंघचालक जी ने इनकी मनोवृत्ति को भी स्पष्ट किया और कहा कि ये तत्व अपने कुतर्कों से भारतीय समाज को उसकी जड़ों से काटने केलिये मान्य परंपराओं के प्रति उच्चाटन उत्पन्न करने का कुचक्र करते हैं। उन्होने सज्जन व्यक्तियों से आत्मीय व्यवहार करने का भी आव्हान किया और अपनी जड़ो से जुड़े रहने का आव्हान किया ।
निसंदेह वही वृक्ष अपनी आकाशी अंगड़ाईयाँ लेकर से इठलाता है । जो अपनी जड़ों को गहरा करता है । जड़ों से दूर होने पर वृक्ष धराशाही हो जाता है और लोग मनमाना व्यवहार करते हैं। कोई आग में जलाता है तो कोई आरे चलाकर फर्नीचर बनाता है । ठीक इसी प्रकार जो समाज अपने स्वत्व से दूर हो जाता है वह भी दुर्गति को प्राप्त होता है । दासानुदास बनने केलिये विवश हो जाता है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पूरी यात्रा भारतीय समाज को उसकी अपनी परंपराओं से जोड़ने की रही है । स्वत्व को जाग्रत करके और राष्ट्रत्व को प्रतिष्ठित करने की रही है । सरसंघचालक जी का पूरा संबोधन भविष्य की इसी राष्ट्र यात्रा के प्रति ध्यानाकर्षण रहा । उन्होंने उन तत्वों के प्रति भी सचेत किया जो भारत के साँस्कृतिक आधार को कमजोर करने में लगे हैं। सरसंघचालक जी ने इससे सतर्क करते हुये कुतर्कों के आधार पर भ्रांत धारणाओं के प्रचार से बचने का आव्हान भी किया ।
सरसंघचालक जी ने इन तत्वों को भारत राष्ट्र की साँस्कृतिक परंपराओं का घोषित शत्रु बताया और इनके कुचक्रों से समाज को जाग्रत करने का आव्हान किया । सरसंघचालक जी ने कट्टरपंथ की उस मनोवृत्ति के प्रति भी समाज को सचेत किया जो शोभायात्राओं पर पथराव करती है । यह कट्टरपंथ की वही धारा है जो बंगलादेश में अल्पसंख्यक हिन्दु समाज का जीवन दूभर कर रहा है लेकिन अब समाज संगठित होकर उसका सामना कर रहा है ।
एक ओर भारत यदि विश्व में अपना स्थान बनाने के लिये आगे बढ़ रहा है । सूदृढ़ अर्थ व्यवस्था का उदाहरण बन रहा है तो कुछ तत्व भारत के भीतर कट्टरपंथियों को भ्रमित कर अशांति उत्पन्न कर रहे है । इनसे सावधान रहना केलिये समाज का संगठित और सुदृढ रहना आवश्यक है । यह दोनों प्रकार से होना चाहिए। वैचारिक स्तर पर भी और मानवीय स्तर भी । मानवीय स्तर पर संपूर्ण समाज को समरस रहना चाहिए। एक मानव में दूसरे मानव से कोई भेद नहीं है । यह सामाजिक समरसता ही भारतीय संस्कृति का मूल है जिसमें सबके मन समान होने और सबका एकसा सोचने का आव्हान किया गया है । और दूसरा वैचारिक समत्व । यदि किसी विशेष स्थान या परंपरा का पालन करने वाले समाज की रीति नीति अलग है तो उसका सम्मान उसी रूप में करना चाहिए जैसा हम अपनी परंपराओं का सम्मान करते हैं। सरसंघचालक जी नै शोभा यात्राओं पर पथराव का उदाहरण देकर समाज से जागरुक रहने, सुदृढ रहने और अपने ही बीच कट्टरपंथी तत्वों से सावधानी का आव्हान किया ।
सरसंघचालक जी ने जहाँ व्यक्ति, परिवार, समाज के सशक्तीकरण, सुदृढ़ीकरण और समरस रहनै का आव्हान किया वहीं प्रकृति और पर्यावरण से भी समन्वय बनाने का आव्हान किया । संसार के स्थायित्व के लिये प्रकृति और पर्यावरण से समन्वय आवश्यक है । भोजन या पीने का पानी ही नहीं जीवन के लिये प्रतिपल आवश्यक श्वाँस भी प्रकृति से मिलती है । यदि हमने पर्यावरण प्रदूषित कर लिया तब कैसै जीवन चलेगा और कैसे प्रगति स्थाई हो सकेगी । सरसंघचालक जी ने अपने संबोधन में पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर दिया और आव्हान किया धरती, जल, आकाश और वायु शुद्ध रहनी चाहिए । प्रत्येक मनुष्य न केवल प्रकृति से समन्वय बनाकर अपने जीवन की यात्रा आरंभ करनी चाहिए अपितु पर्यावरण का संरक्षण भी करना चाहिए। उन्होने प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकार के साथ कर्त्तव्य पालन केलिये भी सचेत रहने का आव्हान किया । अधिकार और कर्तव्य के बीच समन्वय ही मानवीय मर्यादा कहलाती है । एक मनुष्य के अधिकारों की सीमा वहीं तक है जहाँ दूसरे के अधिकार आरंभ होते हैं। प्रत्येक नागरिक को यह सम्मान करना चाहिए। सरसंघचालक जी ने अपने संबोधन में कर्त्तव्य पालन के साथ अपने संबोधन में स्वगौरव का स्मरण कराया । निसंदेह भारत राष्ट्र के परम वैभव को पुनर्प्रतिठित करने केलिये प्रत्येक नागरिक में स्वगौरव का भान होना आवश्यक है । “स्व” का “गौरव” तभी संभव है जब नागरिक का स्वाभिमान जाग्रत हो और जीवन शैली आत्मनिर्भर हो । भारत ने एक लंबा दासत्व का अंधकार देखा है । यदि अब स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय नागरिकों के मन के किसी कोने में दासत्व का वोध शेष है, नागरिकों दासत्व के समय की परंपराओं के अनुगमन अथवा विदेशी परंपराओं के अनुगमन करने का भाव उठता है तो कैसे राष्ट्र गौरव प्रतिष्ठित होगा । इसीलिए सरसंघचालक जी ने समाज से स्वदेशी की महत्ता समझने का आव्हान किया और कहा कि आत्मनिर्भरता केलिये स्वगौरव और स्वदेशी की महत्ता समझना आवश्यक है । इसके साथ उन्होंने समाज से अपनी सामूहिक शक्ति के महत्व को समझने का आव्हान किया । निसंदेह व्यक्ति एक इकाई है । लेकिन व्यक्तियों की सामूहिकता से परिवार और समाज का निर्माण होता है । और समाज की सामूहिकता से राष्ट्र का निर्माण । यह ठीक उसी प्रकार है जैसे एक व्यक्ति की सफलता उसकी अपनी समस्त इन्द्रियों की सामूहिक सक्रियता और एकत्व पर निर्भर करती है । यदि शरीर का कोई एक अंग किसी क्रिया में सहभागी नहीं होगा तो कर्मफल प्रभावित होता है । उसी प्रकार राष्ट्र की सर्वोत्कृष्टता केलिये प्रत्येक व्यक्ति और समाज की सामूहिकता आवश्यक है । सरसंघचालक जी ने अपने संबोधन में इसी के महत्व की ओर समाज का ध्यान आकृष्ट किया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना और शताब्दी यात्रा के आरंभ दिवस पर आयोजित समागम में सरसंघचालक डा मोहन जी भागवत ने उन समस्त विन्दुओं का उल्लेख अपने संबोधन में किया जो भारत राष्ट्र को परम वैभव पर प्रतिष्ठित करने का आधार है । संघ ने यही ध्येय के साथ अपनी यात्रा आरंभ की थी और यही संकल्प आज के संबोधन में सरसंघचालक जी का रहा ।

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