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स्वभाव को अनुकूल करने के लिए मां की साधना जरूरी : कनकेश्वर देवी

*कथा के दूसरे दिन यह भी कहा 
*अंतर्मन को स्वच्छ कर देती है देवी भागवत*
*सत्संग से शिवत्व जाग्रत होता है.*

ग्वालियर/ श्रीमद् देवी भागवत कथा मनुष्य के अंतर्मन को भीतर से पवित्र कर देती है। हमारे जीवन में शिवत्व एवं शक्ति का आभाव न हो, इसके लिए हमें देवी भागवत कथा का श्रवण करना चाहिए। शक्ति को प्राप्त करने के लिए मां की साधना करना जरूरी है। यह विचार मां कनकेश्वरी देवी ने रामलीला मैदान मुरार में आयोजित हो रही श्रीमद् देवी भागवत कथा के द्वितीय दिवस आज मंगलवार को व्यक्त किए। व्यासपीठ का पूजन विधानसभा अध्यक्ष एवं कथा परीक्षत नरेंद्र सिंह तोमर, उनकी धर्मपत्नी किरण सिंह एवं कथा के समन्वयक देवेंद्र प्रताप सिंह तोमर “रामू” आदि ने किया।

मां कनकेश्वरी ने श्रीमद्देवी भागवत कथा का अमृतपान कराते हुए कहा कि गुरू की आज्ञा लेकर यदि साधना की जाए, तो वह लक्ष्य को साध देती है। सद्गुरू के बल से की गई साधना निश्चिततौर पर फलदायी होती है। सद्गुरू का बल जब काम करता है तो शक्ति प्रकट होती है। साधना के लिए शिवतत्व अहम है और जिसने सत्संग नहीं किया, वो शिव तत्व को प्राप्त नहीं कर सकता है।
*वक्ता के लिए शास्त्र के साथ तत्व ज्ञान जरूरी*
व्यासपीठ की वक्ताओं को योग्यता को लेकर उन्होंने कहा कि वक्ता वही श्रेष्ठ होता है, जिसे शास्त्र के साथ तत्व ज्ञान होता है। बिना तत्व ज्ञान के वक्ता शास्त्र के ज्ञान की अभिव्यक्ति नहीं कर सकता है और बिना शास्त्र के तत्व ज्ञान भी पूर्ण नहीं है। अर्थात शास्त्र और तत्व दोनों से मिलकर एक अच्छा वक्ता बनता है।
उन्होंने बताया कि सत्संग का अधिकार उसी को है जो सेवाभावी और परोपरकारी हो।तन, मन, धन से सेवा करने वाला ही सत्संग का अधिकारी होता है। जब मनुष्य सत्संग में बैठता है तो उसका शिवतत्व जाग्रत हो जाता है।
*इंद्रीय नियंत्रण से जप सफल*
उन्होंने बताया कि यदि हम अपनी दश दिशाओं को नियंत्रित कर लेते हैं तो 5 माला की साधना भी पर्याप्त है। साधना करोगो तो एक-एक जप से आपकी आध्यात्मिक उन्नति होती चली जाएगी। साधना वही कर पाता है जो स्वयं पर नियंत्रण कर लेता है, जिसमें आहार-बिहार, श्रवण, वाणी, दर्शन सभी अहम है। जप से जीवन मेें पवित्रता आती है, लेकिन यदि जीवन में इंद्रीय नियंत्रण नहीं हैं तो माला जपने से भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है।
*यज्ञ कामधेनु के समान हैं*
उन्होंने कहा कि परमार्थ करना अच्छी बात है,लेकिन यज्ञ करना बड़ी बात है। यज्ञ कामधेनु हैं, जिससे सब कुछ हासिल हो सकता है। कुछ यज्ञ ऐसे हैं, जिनमेें कर्म से ज्यादा भाव की प्रधानता होती है। भक्ति यज्ञ में तो हम यदि गलती भी कर दें, ईश्वर हमें क्षमा कर देगा,लेकिन जब हम विधान करते हैं तो गलती की गुंजाइश नहीं होती। जैसे डॉक्टर यदि गलती कर दे तो मरीज की जान जा सकती है।
*सीताराम नाम की महिमा*
सीताराम के जप की महिमा का बखान करते हुए उन्होंने कहा कि जब हम सीताराम-सीताराम जपते हैं तो श्रीराम प्रसन्न होते हैं। वे इसलिए अधिक प्रसन्न होते हैं कि सीताराम के मध्य अपनी अराध्य देवी तारामाई का नाम आता है। श्री तारा राम जिसे सुन श्रीराम अत्यंत प्रसन्नता से भर जाते हैं। तारामाई दस महाविद्याओं मेें से एक है।
उन्होंने बताया कि स्वभाव को अनुकूलित करने के लिए मां की साधना की जाती है। परम शक्ति की कृपा जितनी शिव पर हुई, उतना ही उन्होंने मां को जाना। उन्होंने बताया कि स्वभाव को अनुकूल करने के लिए मां की साधना करें।
*पिता की संपत्ति पर किसका अधिकार*
उन्होंने बताया कि पिता की संपत्ति पर कानूनी रूप से बेटा-बेटी सबका अधिकार होता है, लेकिन सही मायने में माता-पिता की संपत्ति पर उसी का अधिकार होता है, जो उनकी सेवा करता है इसलिए अपने मां-बाप के कृपा पात्र बनने के लिए उनकी सेवा करें, तो आप परमात्मा के भी कृपापात्र हो जाएंगे। उन्होंने बताया कि जब हम श्रीमद्भागवत एवं देवी भागवत दोनों को समझ लेते हैं तभी सही अर्थों में भागवत के मर्म को समझ पाते हैं।
*इन्होंने आरती व कथा श्रवण की*
कैबिनेट मंत्री राकेश शुक्ला, पूर्व मंत्रीद्धय अनूप मिश्रा, रामपाल सिंह, पूर्व विधायक जौरा सूबेदार सिंह, अंबिका प्रसाद पचौरी, अशोक जैन, अतिरिक्त महाधिवक्ता पूरन कुलश्रेष्ठ, कांग्रेस अध्यक्ष देवेन्द्र शर्मा, इंद्रजीत चौहान, अविनाश यादव, देवेश शर्मा, रामबाबू कटारे, राजेन्द्र सेठ, केशव गुर्जर, दीपक तोमर, कोकसिंह नरवरिया (मेहगांव),सोनू बिरथरे (शिवपुरी)आदि सहित सैकड़ों लोगों ने कथा श्रवण की।

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